कौन हैं IAS दीप्ति गौर मुखर्जी, उच्च शिक्षा सचिव के साथ मिला UGC चेयरमैन का जिम्मा
IAS ऑफिसर दीप्ति गौर मुखर्जी ने हायर एजुकेशन सेक्रेटरी के तौर पर अपॉइंटमेंट के बाद UGC चेयरमैन का एडिशनल चार्ज संभाला है। यह बदलाव नरेश पाल गंगवार के अपॉइंटमेंट के विवाद की वजह से रुकने के बाद हुआ है।

देश के शिक्षा महकमे में इन दिनों कई अहम और बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। एक तरफ जहां नई नियुक्तियों का दौर जारी है, वहीं दूसरी तरफ कुछ विवादों के चलते रातों-रात बड़े फैसले भी लेने पड़ रहे हैं। इसी कड़ी में अब एक बेहद अहम कदम उठाते हुए सरकार ने उच्च शिक्षा सचिव की जिम्मेदारी संभाल रहीं वरिष्ठ आईएएस अधिकारी दीप्ति गौर मुखर्जी को अब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के चेयरमैन पद का अतिरिक्त प्रभार भी सौंप दिया है। यह फैसला ऐसे वक्त में आया है जब महज कुछ ही दिन पहले उन्हें उच्च शिक्षा विभाग के सचिव पद की कुर्सी सौंपी गई थी।
नए आदेश तक संभालेंगी कार्यभार
शिक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी किए गए एक आधिकारिक नोटिस में इस बात पर पूरी तरह से मुहर लगाई गई है। नोटिस के मुताबिक, "शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग की सचिव और यूजीसी की सदस्य सुश्री दीप्ति गौर मुखर्जी को अब तत्काल प्रभाव से यूजीसी के अध्यक्ष पद का अतिरिक्त प्रभार सौंपा जा रहा है।" यह आदेश 12 अगस्त से लागू हो चुका है। नियम के मुताबिक, जब तक यूजीसी के किसी नियमित यानी रेगुलर चेयरमैन की नियुक्ति नहीं हो जाती, या फिर जब तक कोई नया सरकारी आदेश नहीं आ जाता, तब तक दीप्ति गौर मुखर्जी ही इस पद की अहम जिम्मेदारी संभालती रहेंगी।
दीप्ति गौर मुखर्जी का तजुर्बा
दीप्ति गौर मुखर्जी नौकरशाही का एक बेहद जाना-माना नाम हैं। वह मध्य प्रदेश कैडर की 1993 बैच की एक तेज-तर्रार और अनुभवी आईएएस अधिकारी हैं। उनके पास प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने का सालों का तजुर्बा है। 11 अगस्त को ही कैबिनेट की नियुक्ति समिति (ACC) ने एक बड़े स्तर के नौकरशाही फेरबदल को अपनी मंजूरी दी थी, जिसके तहत उन्हें शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग का सचिव बनाया गया था। उन्होंने इस पद पर विनीत जोशी (आईएएस) की जगह ली है, जिन्हें अब पंचायती राज मंत्रालय में सचिव के पद पर भेज दिया गया है।
नरेश पाल गंगवार का वह विवाद जिसने बदल दी पूरी तस्वीर
रिपोर्ट्स की मानें तो इस पूरी नियुक्ति के पीछे एक ऐसी कहानी भी है जिसने सत्ता के गलियारों में काफी हलचल मचा दी थी। दरअसल, सरकार ने शुरुआत में नरेश पाल गंगवार को उच्च शिक्षा सचिव के अहम पद के लिए चुना था। सब कुछ तय हो चुका था, लेकिन ऐन मौके पर उनके परिवार से जुड़ा एक बड़ा विवाद सामने आ गया। नरेश पाल गंगवार के परिवार पर सरकारी बागवानी सब्सिडी के मामले में करीब 1.16 करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे। इस विवाद ने इतना तूल पकड़ा कि गंगवार ने उच्च शिक्षा विभाग में अपना कार्यभार ही नहीं संभाला। इसी घटनाक्रम के बाद दीप्ति गौर मुखर्जी को यह बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई।
यूजीसी की भूमिका
यूजीसी देश में उच्च शिक्षा का एक सबसे बड़ा और मजबूत स्तंभ है। यह देशभर की यूनिवर्सिटीज को मान्यता देने से लेकर उनके लिए नियम-कानून तय करने तक का काम करता है। ऐसे में दीप्ति गौर मुखर्जी के कंधों पर अब दोहरी जिम्मेदारी आ गई है। एक तरफ उन्हें उच्च शिक्षा मंत्रालय के कामकाज को सुचारू रूप से चलाना है, वहीं दूसरी तरफ यूजीसी के चेयरमैन के तौर पर देशभर के विश्वविद्यालयों से जुड़े अहम फैसले भी लेने हैं।
देशभर के लाखों छात्रों, प्रोफेसरों और शिक्षाविदों की नजरें अब यूजीसी के नए कदमों पर टिकी हैं। हाल ही में महाराष्ट्र के नए मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी की कमी को दूर करने के लिए एमयूएचएस (MUHS) द्वारा वर्चुअल क्लासरूम और रिमोट लेक्चर जैसी योजनाएं सामने आई हैं। ये दिखाता है कि आज के दौर में शिक्षा के तरीके कितनी तेजी से बदल रहे हैं। दीप्ति गौर मुखर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वो कैसे पुरानी व्यवस्थाओं में नयापन लाती हैं।
भारत सरकार जिस तरह से नई शिक्षा नीति (NEP 2020) को देशभर में पूरी तरह से लागू करने की कोशिश कर रही है, उसमें उच्च शिक्षा विभाग और यूजीसी दोनों ही संस्थानों की भूमिका रीढ़ की हड्डी जैसी है। इसके अलावा, एक ही विभाग में सचिव और उसी से जुड़ी सबसे बड़ी ऑटोनोमस बॉडी यानी स्वायत्त संस्था के चेयरमैन का पद एक ही व्यक्ति के पास होने से लाल फीताशाही काफी हद तक कम हो जाती है। फाइलों को एक टेबल से दूसरी टेबल तक जाने और मंजूरियों में लगने वाला समय बचता है। कुल मिलाकर, शिक्षा के इस विशाल क्षेत्र में यह नियुक्ति आने वाले दिनों में कई बड़े बदलावों की गवाह बन सकती है और उम्मीद है कि उनके नेतृत्व में देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में और भी ज्यादा पारदर्शिता व तेजी देखने को मिलेगी।


