शिक्षक दिवस पर सड़कों पर शिक्षक, बंगाल में 5 सितंबर को बड़ा विरोध प्रदर्शन; क्यों काटा बवाल
पश्चिम बंगाल में प्राथमिक शिक्षकों ने शिक्षा व्यवस्था की बदहाली, स्कूलों के बंद होने और डीए की मांग को लेकर शिक्षक दिवस के सरकारी कार्यक्रमों का बहिष्कार कर कोलकाता में विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है।

आज 5 सितंबर है यानी शिक्षक दिवस। यह वो दिन है जब पूरे देश में गुरुओं का सम्मान किया जाता है, स्कूलों में जश्न का माहौल होता है और छात्र अपने शिक्षकों को उनके योगदान के लिए शुक्रिया कहते हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल से जो खबर सामने आ रही है वह कुछ अलग है। राज्य के प्राथमिक शिक्षकों ने इस बार शिक्षक दिवस के तमाम सरकारी कार्यक्रमों का पूरी तरह से बहिष्कार करने का बड़ा फैसला लिया है। जश्न मनाने की बजाय, ये शिक्षक आज कोलकाता की सड़कों पर उतरकर अपना विरोध जता रहे हैं।
शिक्षकों के इस बड़े कदम के पीछे ‘बंगीय प्राथमिक शिक्षक समिति’ का हाथ है। इस संगठन ने राज्य के स्कूली शिक्षा ढांचे में चल रही भारी उथल-पुथल और कई गंभीर मसलों को लेकर मोर्चा खोल दिया है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि राष्ट्र निर्माताओं को अपने ही दिन सड़क पर आना पड़ा? इसका जवाब उन तमाम परेशानियों में छिपा है, जिनका सामना शिक्षक और स्कूल प्रशासन लंबे समय से कर रहे हैं।
नीतियों में शिक्षकों की अनदेखी?
समिति ने साफ तौर पर कहा है कि जब भी शिक्षा को लेकर कोई नई नीति या नियम बनाए जाते हैं, तो उसमें शिक्षकों की राय को पूरी तरह से किनारे कर दिया जाता है। नीतियां ऊपर बैठे अधिकारी बनाते हैं और बिना सोचे-समझे उन्हें जमीन पर लागू करने का फरमान जारी कर दिया जाता है। इसका नतीजा यह हो रहा है कि सरकारी स्कूलों से आम लोगों और माता-पिता का भरोसा लगातार टूटता जा रहा है। वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने से कतराने लगे हैं। संगठन का मानना है कि यह शिक्षा क्षेत्र में एक बड़े संकट की आहट है, जिसकी तरफ सरकार को तुरंत ध्यान देना चाहिए।
स्कूलों पर लटकते ताले
विरोध कर रहे शिक्षकों ने एक केंद्रीय रिपोर्ट का हवाला देते हुए बेहद चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल पूरे देश में 4,791 स्कूल बंद हो गए, जिनमें से अकेले पश्चिम बंगाल के 568 स्कूल शामिल हैं। हैरानी की बात यह है कि सरकार इन स्कूलों के बंद होने की वजहें तलाशने और उन्हें सुधारने के बजाय, कम बच्चों वाले स्कूलों को दूसरे स्कूलों में मिलाने (मर्ज करने) की तैयारी कर रही है। शिक्षकों को डर है कि इस कदम से आने वाले वक्त में कई और स्कूलों पर ताले लग जाएंगे।
इसके अलावा, शिक्षकों की कमी का मसला भी बेहद गंभीर है। पूरे देश में 1,00,843 स्कूल ऐसे हैं जो सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। पश्चिम बंगाल में ऐसे प्राथमिक स्कूलों की तादाद 6,769 है। जरा सोचिए, एक ही शिक्षक पर पूरे स्कूल को संभालने की जिम्मेदारी है। राज्य के कई स्कूल ऐसे भी हैं जहां सिर्फ एक या दो शिक्षक ही पढ़ा रहे हैं। आजादी के इतने दशकों बाद भी प्राथमिक स्कूलों में कोई बेसिक सपोर्ट स्टाफ मौजूद नहीं है। ऊपर से, शिक्षकों को चुनाव और जनगणना जैसे गैर-शैक्षणिक कामों में लगा दिया जाता है, जिससे बच्चों की पढ़ाई का भारी नुकसान होता है।
टीईटी का झमेला
शिक्षकों के गुस्से की एक बड़ी वजह टीईटी यानी शिक्षक पात्रता परीक्षा से जुड़े नियम भी हैं। संगठन के महासचिव आनंद हांडा ने बताया कि 2011 से पहले नौकरी पर लगे शिक्षकों के सिर पर नौकरी जाने की तलवार लटक रही है। अगर ये शिक्षक 31 अगस्त 2028 तक टीईटी पास नहीं कर पाते हैं, तो उन्हें जबरन रिटायर कर दिया जाएगा या नौकरी से निकाल दिया जाएगा। इसके साथ ही, करीब 32,000 शिक्षकों की भर्ती से जुड़ा एक बड़ा मामला भी है। हालांकि कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस मामले में थोड़ी राहत दी थी, लेकिन फिलहाल यह मसला सुप्रीम कोर्ट में अटका हुआ है, जिससे हजारों शिक्षकों का भविष्य अधर में है।
डीए की मांग और अधूरा वादा
पैसों से जुड़े मसले भी इस विरोध प्रदर्शन की अहम वजह हैं। महंगाई भत्ते (डीए) को लेकर शिक्षकों में भारी नाराजगी है। उनका कहना है कि राज्य सरकार ने कई बार भरोसे में लिया, लेकिन अभी तक यह साफ नहीं है कि केंद्रीय दरों के हिसाब से बकाया डीए कब मिलेगा। संगठन का यह भी आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बकाया डीए का 25 फीसदी हिस्सा तो जारी कर दिया गया, लेकिन इसका फायदा शिक्षकों और ग्रांट-इन-एड के तहत काम करने वाले कर्मचारियों को बिल्कुल नहीं मिला।
आगे क्या है तैयारी?
इन तमाम अनसुलझे मसलों और बढ़ती नाराजगी के बीच, संगठन ने तय किया है कि वे न सिर्फ सरकारी आयोजनों का बहिष्कार करेंगे, बल्कि कोलकाता में धरने पर बैठेंगे। इस धरने के जरिए राज्यपाल और मुख्यमंत्री को उनकी मांगों का एक ज्ञापन भी सौंपा जाएगा। शिक्षकों का यह भी कहना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) और कक्षा 5वीं और 8वीं में पास-फेल सिस्टम को फिर से लागू करने जैसे अहम फैसलों को राज्य में सही तरीके से जमीन पर नहीं उतारा गया है। कुल मिलाकर, यह विरोध सिर्फ शिक्षकों की अपनी मांगों का नहीं है, बल्कि उस दरकती शिक्षा व्यवस्था को बचाने की एक गुहार है, जो आने वाली पीढ़ी का भविष्य तय करती है।


