कश्मीर के इरफान ने दोनों आंखें गंवाने के बाद भी पास की UPSC परीक्षा, मजदूर पिता के छलके आंसू
कश्मीर के बांदीपोरा के दृष्टिबाधित युवा इरफान अहमद लोन ने आंखों की रोशनी खोने और तमाम मुश्किलों के बावजूद तीसरे प्रयास में यूपीएससी परीक्षा पास कर पूरे देश में शानदार मिसाल कायम की है।

कहते हैं कि अगर हौसलों में जान हो, तो दुनिया की कोई भी अंधेरी रात आपके सपनों का सूरज उगने से नहीं रोक सकती। कश्मीर के बांदीपोरा जिले के एक छोटे से गांव नैदखाई (Naidkhai) के रहने वाले इरफान अहमद लोन ने इस कहावत को अक्षरश: सच कर दिखाया है। इरफान देख नहीं सकते, लेकिन उनके विजन (Vision) और उनकी कामयाबी की चमक ने आज पूरे देश को रोशन कर दिया है। अपनी शारीरिक अक्षमता और गरीबी की जंजीरों को तोड़ते हुए इरफान ने देश की सबसे कठिन संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) सिविल सेवा परीक्षा पास कर ली है और उन्हें 957वीं रैंक हासिल हुई है।
जैसे ही यह खबर गांव में पहुंची, मीरपोरा मोहल्ले में जश्न का माहौल बन गया। इरफान के पिता बशीर अहमद सिंचाई विभाग में एक दिहाड़ी मजदूर (Daily wage labourer) हैं। उनका छोटा सा एक मंजिला घर बधाई देने आ रहे लोगों की भीड़ को संभालने के लिए काफी नहीं था, इसलिए खुशी से फूले न समा रहे इस पिता ने घर के बाहर लॉन में एक बड़ा सा टेंट लगवा दिया है। टेंट में अपनी 11वीं कक्षा में पढ़ने वाली बेटी शाबिया और 10वीं में पढ़ने वाले बेटे मुजताहिब के साथ बैठे बशीर अहमद भावुक होकर कहते हैं, "शुक्रवार शाम इरफान ने मुझे दिल्ली से फोन किया और यह खुशखबरी दी। हम सालों से इस दिन का इंतजार कर रहे थे। खबर सुनते ही मेरी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े।"
किस्मत का क्रूर मजाक: दो हादसों ने छीन ली आंखों की रोशनी
इरफान की कामयाबी की यह कहानी जितनी शानदार है, इसके पीछे का संघर्ष उतना ही दर्दनाक है। बशीर अहमद बताते हैं कि इरफान बचपन में बिल्कुल स्वस्थ पैदा हुए थे। उनकी आंखों में कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन जब वह महज चार साल के थे, तब पड़ोस के एक बच्चे ने गलती से उनकी दाहिनी आंख में एक सिरिंज (Syringe) घुसा दी। इस हादसे ने उनकी एक आंख को बुरी तरह डैमेज कर दिया।
बशीर उस खौफनाक दौर को याद करते हुए बताते हैं, "यह 2002 के आसपास की बात है। मैं उसे इलाज के लिए चंडीगढ़ ले गया। डॉक्टरों ने कहा कि जब वह 10 साल का हो जाएगा, तब उसका ऑपरेशन किया जा सकता है। हम वापस लौट आए और मैंने उसे स्कूल में दाखिला दिला दिया।" लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। स्कूल में एक दिन एक दूसरे छात्र ने इरफान को धक्का दे दिया और एक पेंसिल सीधे उनकी दूसरी सही आंख में जा घुसी।
इस दूसरे हादसे ने परिवार को पूरी तरह तोड़ कर रख दिया। बशीर अपने बेटे को लेकर पहले श्रीनगर के शेर ए कश्मीर आयुर्विज्ञान संस्थान (SKIMS) भागे और फिर दिल्ली के एम्स (AIIMS) पहुंचे। पिता दर्द भरे शब्दों में कहते हैं, "हम इस उम्मीद में 14 महीने तक दिल्ली के एम्स में रहे कि शायद मेरे बेटे की आंखों की रोशनी वापस आ जाए। कई सर्जरी हुईं, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ और हम टूटे हुए दिल के साथ खाली हाथ अपने गांव वापस लौट आए।"
पिता का अटूट विश्वास और तालीम का सफर
गांव लौटने के बाद लोगों ने बशीर को सलाह दी कि वह इरफान को श्रीनगर के दृष्टिबाधित बच्चों के एक विशेष स्कूल में डाल दें। बशीर वहां गए, लेकिन स्कूल की बदहाली देखकर उनका दिल बैठ गया। उन्होंने तय किया कि वह अपने बेटे के मुस्तकबिल से समझौता नहीं करेंगे। फिर उन्हें देहरादून के 'मॉडल स्कूल फॉर द विजुअली हैंडीकैप्ड' (Model School for the Visually Handicapped) के बारे में पता चला।
काफी जद्दोजहद और एक साल के इंतजार के बाद, एक दिहाड़ी मजदूर पिता ने अपने बेटे का दाखिला वहां करा दिया। बशीर अपने बेटे से मिलने साल में चार बार देहरादून जाते थे। उन्होंने बताया, "मुझे इरफान की पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए अपनी जमीन तक बेचनी पड़ी। वो बहुत मुश्किल दिन थे, लेकिन मुश्किल दिन कभी हमेशा नहीं रहते।"
इरफान ने भी पिता के इस बलिदान को बेकार नहीं जाने दिया। उन्होंने देहरादून के स्कूल से 12वीं की परीक्षा डिस्टिंक्शन (Distinction) के साथ पास की। इसके बाद उन्होंने दिल्ली के प्रतिष्ठित हिंदू कॉलेज (Hindu College) से ग्रेजुएशन किया और फिर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से राजनीति विज्ञान (Political Science) में मास्टर्स की डिग्री हासिल की।
हार न मानने की जिद: नौकरी के साथ की UPSC की तैयारी
अपनी तालीम पूरी करने के बाद इरफान ने पंजाब नेशनल बैंक (PNB) में करीब 18 महीने तक नौकरी की। इसके बाद उन्होंने भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) में असिस्टेंट एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर (AAO) की परीक्षा पास की और दिल्ली में पोस्टिंग हासिल की। लेकिन इरफान की मंजिल सिविल सर्विसेज थी। उन्होंने नौकरी के साथ अपनी तैयारी जारी रखी।
पहला प्रयास: उन्होंने अपने पहले प्रयास में ही प्रीलिम्स (Prelims) परीक्षा पास कर ली, लेकिन आगे नहीं बढ़ सके।
दूसरा प्रयास: अपनी गलतियों से सीखते हुए दूसरे प्रयास में उन्होंने मेन्स (Mains) परीक्षा भी पास कर ली, लेकिन फाइनल लिस्ट में जगह नहीं बना पाए।
तीसरा प्रयास: आखिरकार तीसरे प्रयास में इरफान ने हर बाधा को पार करते हुए मेरिट लिस्ट में अपनी जगह पक्की कर ली और अपना व अपने परिवार का सपना सच कर दिया।
लेखक के बारे में
Himanshu Tiwariशॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।
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शिक्षा और अकादमिक पृष्ठभूमि
हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।
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काम से इतर हिमांशु की गहरी रुचि समकालीन इतिहास, समानांतर सिनेमा और दर्शन में रही है। राजनीति और विदेश नीति पर पढ़ना-लिखना उन्हें विशेष रूप से पसंद है। इसी रुचि के चलते उन्होंने दो लोकसभा चुनावों और दर्जनों विधानसभा चुनावों की कवरेज की, जहां राजनीति को उन्होंने बेहद नजदीक से देखा और समझा। चुनावी आंकड़ों की बारीकियां, नेताओं के भाषण, जमीनी मुद्दे और जनता की प्रतिक्रियाएं, इन सभी पहलुओं को समेटते हुए उन्होंने सैकड़ों खबरें और विश्लेषण तैयार किए, जो राजनीतिक प्रक्रिया की गहरी समझ को दर्शाते हैं।
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- अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और विदेश नीति से जुड़े विषयों का विश्लेषणात्मक लेखन
- राजनीति, चुनावी आंकड़ों और जमीनी मुद्दों पर सरल और तथ्यपरक एक्सप्लेनर तैयार करने का अनुभव


