यूपीएससी पास करने के ढोल नगाड़े बजे पर लेटर नहीं आया, IAS से DANICS कुछ नहीं मिला, पास हुए 100 अभ्यर्थी क्यों फंसे

लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2025 के करीब 100 चयनित ओबीसी अभ्यर्थियों को तब तगड़ा झटका लगा जब उन्हें कई दिनों के इंतजार के बाद भी अपॉइंटमेंट लेटर नहीं मिला। उनका नाम सर्विस लिस्ट में नहीं आया।

UPSC CSE obc controversy (AI Image)
यूपीएससी ओबीसी विवाद (AI निर्मित तस्वीर)

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2025 का जब परिणाम आया तो चयनित होने वाले सैंकड़ों अभ्यर्थियों के घर मोहल्लों में जमकर जश्न मना। बधाइयां आईं और मिठाइयां बांटी गईं। लेकिन पास होने वाले करीब 100 अभ्यर्थियों को तब तगड़ा झटका लगा जब उन्हें कई दिनों के इंतजार के बाद भी अपॉइंटमेंट लेटर नहीं मिला। रिजल्ट के तीन माह बाद जब चयनितों को आईएएस, आईपीएस, आईआरएस , आईएफएस जैसी सर्विस अलॉट हुईं तो उनका लिस्ट में नाम ही नहीं था। ओबीसी क्रीम लेयर को लेकर हुए विवाद ने इन अभ्यर्थियों का भविष्य अधर में लटका दिया है। बीबीसी मराठी से बातचीत में सतेज नाम के एक अभ्यर्थी ने बताया कि उसके लिए यह समझना मुश्किल था कि देश की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक पास करने के बावजूद उसे सरकारी सेवा क्यों नहीं मिली। सतेज ओबीसी आरक्षण विवाद से प्रभावित करीब 100 अभ्यर्थियों में से एक हैं।

इन अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्हें ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं मिला क्योंकि उन्हें क्रीमी लेयर में माना गया। मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि किसी ओबीसी अभ्यर्थी के क्रीमी लेयर में होने का फैसला केवल उसके माता-पिता की सैलरी के आधार पर नहीं किया जा सकता। अदालत ने 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम और उसके बाद जारी निर्देशों को साथ पढ़ते हुए कहा कि अभिभावक की सामाजिक स्थिति और उनके पद की प्रकृति भी महत्वपूर्ण है। हालांकि इस फैसले के बाद भी विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

परीक्षा पास की लेकिन नियुक्ति नहीं मिली

सतेज जैसे अभ्यर्थी सालों की कड़ी मेहनत से यूपीएससी में पास हुए। वे परीक्षा पास कर चुके थे और नियुक्ति के लिए अनुशंसित भी किए गए थे। समस्या बाद में सामने आई जब सर्विस आवंटन के लिए उनके OBC नॉन-क्रीमी लेयर स्टेटस की जांच हुई।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार कई सफल अभ्यर्थियों के माता-पिता PSU, बैंक या अन्य संस्थानों में काम करते थे। चूंकि उनके माता-पिता के पदों की सरकारी पदों के साथ समकक्षता औपचारिक रूप से तय नहीं की गई थी इसलिए कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने आय/संपत्ति संबंधी मानदंड लागू किया और इन अभ्यर्थियों को क्रीमी लेयर में माना। इसके कारण उन्हें OBC आरक्षण के तहत सर्विस अलोकेशन में शामिल नहीं किया ग

या।

इस मामले में सरकार के फैसले के खिलाफ छात्रों ने पहले केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण और बाद में हाईकोर्ट गए। इस मामले में दिल्ली, केरल और मद्रास हाईकोर्ट ने छात्रों के हक में फैसला दिया था। इसके खिलाफ केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या बदला

11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहिथ नाथन एवं अन्य मामले में फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि माता-पिता की सैलरी या आय को अकेले आधार बनाकर यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई OBC अभ्यर्थी क्रीमी लेयर में आता है या नहीं। इसके लिए माता-पिता के पद की स्थिति और श्रेणी को भी ध्यान में रखना होगा।

विवाद की जड़ 1993 के डीओपीटी ऑफिस मेमोरेंडम और 2004 में जारी एक स्पष्टीकरण से जुड़ी है। मूल व्यवस्था में संबंधित आय/संपत्ति परीक्षण के संदर्भ में वेतन और कृषि आय को बाहर रखा गया था। लेकिन 2004 के स्पष्टीकरण के बाद PSU और निजी क्षेत्र में काम करने वाले अभिभावकों की सैलरी को भी क्रीमी लेयर तय करने में ध्यान में रखा जाने लगा, खासकर तब जब उनके पदों की सरकारी पदों से समानता औपचारिक रूप से तय नहीं हुई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस व्यवस्था से सरकारी और PSU/निजी क्षेत्र के समान स्थिति वाले कर्मचारियों के बच्चों के साथ असमान व्यवहार हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि सरकार द्वारा पदों की समानता तय नहीं किए जाने की वजह से अभ्यर्थियों को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता।

कोर्ट ने प्रभावित अभ्यर्थियों के दावों पर दोबारा विचार करने और छह महीने के भीतर प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया। जरूरत पड़ने पर गलत तरीके से बाहर किए गए अभ्यर्थियों को नियुक्त करने के लिए सुपरन्यूमरेरी पोस्ट यानी अतिरिक्त पद बनाने का निर्देश भी दिया गया।

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से मांगा स्पष्टीकरण

केंद्र सरकार के DoPT की नई याचिका का मुख्य फोकस सिविल सेवा परीक्षा 2025 है। बात यह है कि CSE-2025 परीक्षा का रिजल्ट 11 मार्च के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पांच दिन पहले घोषित हो चुका था। अब यदि फैसले को उस चयन प्रक्रिया पर सीधे लागू किया गया, तो श्रेणी के अनुसार मेरिट और सर्विस के बंटवारे को फिर से दोबारा आमूल चूल प्रभावित करने की स्थिति बन सकती है। ऐसे में उसने शीर्ष अदालत से गाइडलाइन मांगी है और यह स्पष्ट करने की मांग की है कि फैसले को पहले से काफी हद तक पूरी हो चुकी CSE-2025 के परिणामों के साथ किस तरह लागू किया जाए?

8 लाख से अधिक वार्षिक आय वाले क्रीमी लेयर में

क्रीमी लेयर शब्द का इस्तेमाल ओबीसी समुदाय के उन लोगों के लिए किया जाता है, जो आर्थिक व सामाजिक रूप से काफी समृद्ध हो चुके हैं। क्रीमी लेयर अवधारणा की शुरुआत 1992 के प्रसिद्ध इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार मामले के बाद हुई थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण को तो बरकरार रखा था, लेकिन संपन्न वर्ग को इससे बाहर रखने का आदेश दिया था। इसके बाद 1993 में सरकार ने इसे लागू करने के नियम बनाए थे। वर्तमान नियमों के अनुसार, यदि किसी ओबीसी परिवार की वार्षिक आय 8 लाख रुपये से अधिक है, तो उसे क्रीमी लेयर में माना जाता है। ऐसे उम्मीदवार सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के हकदार नहीं होते।

Pankaj Vijay

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पंकज विजय| वरिष्ठ पत्रकार

शॉर्ट बायो पंकज विजय एक वरिष्ठ डिजिटल पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 15 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वर्तमान में livehindustan.com में असिस्टेंट एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। वे करियर, स्कूल व हायर एजुकेशन, जॉब्स से जुड़े विषयों पर खबर लेखन और विश्लेषण में विशेषज्ञता रखते हैं। 9 वर्षों से यहां इसी भूमिका में हैं। सरकारी भर्तियों, बोर्ड व एंट्रेंस एग्जाम, प्रतियोगी परीक्षाओं, उनके परिणाम, बदलते दौर में करियर की नई राहों, कोर्स, एडमिशन एवं नए जमाने के रोजगार के लिए जरूरी स्किल्स से जुड़ी अपडेट तेजी से पाठकों तक पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं।


15 से अधिक सालों का अनुभव

पंकज विजय ने अपने करियर की शुरुआत प्रिंट मीडिया से की। अमर उजाला समाचार पत्र में रिसर्च, संपादकीय और करियर एजुकेशन जॉब्स डेस्क पर काम किया। यहां उन्हें फीचर लेखन व रिपोर्टिंग का भी मौका मिला। इसके बाद उन्होंने आज तक डिजिटल में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। आज तक वेबसाइट पर राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय, अपराध और एजुकेशन व रोजगार जगत से जुड़ी खबरें लिखीं। इसके बाद एनडीटीवी ऑनलाइन में एजुकेशन जॉब्स सेक्शन पर काम कर इस विषय में अपनी समझ को और व्यापक बनाया। एनडीटीवी की पारी के बाद वे लाइव हिन्दुस्तान से जुड़े और बीते 9 वर्षों से करियर एजुकेशन जॉब्स सेक्शन पर काम कर रहे हैं।


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भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी), दिल्ली से हिन्दी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा, गुरु जंभेश्वर यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन में एमए व दिल्ली यूनिवर्सिटी से इतिहास में बीए ऑनर्स किया है। एनसीसी सी सर्टिफिकेट होल्डर हैं जिसके चलते उन्हें रक्षा क्षेत्र जैसे पुलिस व सेनाओं की भर्तियों की बेहतर समझ है।


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