सड़क हादसा, याददाश्त खोई, फिर व्हीलचेयर से तय किया UPSC तक का मुकाम; चौंका देगी अथिरा की कहानी
भयानक सड़क हादसे और याददाश्त खोने के बावजूद व्हीलचेयर के सहारे अथिरा सुगथन ने यूपीएससी 2025 में 483वीं रैंक हासिल कर यह साबित कर दिया कि मजबूत हौसलों के आगे हर मुश्किल छोटी है।

कहते हैं कि 'मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है... पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।' यह कहावत हम सबने कई बार सुनी है, लेकिन केरल के कोझिकोड की रहने वाली 30 साल की अथिरा सुगथन ने इस कहावत को अपनी जिंदगी में सच कर दिखाया है। जिंदगी ने उन्हें ऐसे जख्म दिए जो किसी भी आम इंसान को पूरी तरह से तोड़कर रख देते, लेकिन अथिरा ने अपने दर्द और नुकसान को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपने यूपीएससी (UPSC) के सपनों की उड़ान का लॉन्चपैड बना लिया। शुक्रवार को जब यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2025 (UPSC CSE 2025) के नतीजे घोषित हुए, तो व्हीलचेयर के सहारे जिंदगी बिता रहीं अथिरा ने 483वीं रैंक हासिल कर पूरी दुनिया के सामने एक ऐसी मिसाल कायम की है, जिसे भुला पाना नामुमकिन है। यह उनका चौथा प्रयास था और उनकी यह कामयाबी सिर्फ एक परीक्षा पास करने की कहानी नहीं, बल्कि इंसान के कभी न हार मानने वाले जज्बे की एक जिंदा दास्तान है।
वो मनहूस दिन जिसने जिंदगी पलट कर रख दी
बात फरवरी 2016 की है। अथिरा बेंगलुरु में रहकर बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी (BDS) की पढ़ाई कर रही थीं। सब कुछ सामान्य चल रहा था कि अचानक एक दिन वह एक भयानक सड़क हादसे का शिकार हो गईं। इस एक्सीडेंट ने उनकी हंसती-खेलती जिंदगी को पूरी तरह से उलट-पुलट कर दिया। हादसे की गंभीरता इतनी ज्यादा थी कि उन्हें व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ा। महीनों तक उनका इलाज चला और आखिरकार उन्हें वापस अपने घर कोझिकोड लौटना पड़ा।
लेकिन मुसीबतें यहीं खत्म नहीं हुई थीं। हादसे की वजह से अथिरा 'एमनेशिया' (Amnesia) यानी याददाश्त खोने की बीमारी का शिकार हो गईं। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए बताया, "दो साल तक मैं एमनेशिया से जूझती रही। मैं पूरी तरह भूल चुकी थी कि मैं बीडीएस की पढ़ाई कर रही थी। मेरी जिंदगी के वो पन्ने जैसे मेरे दिमाग से मिट गए थे।"
आयुर्वेद का सहारा और वापसी का शानदार जज्बा
करीब दो साल तक इस अंधेरे में रहने के बाद, आयुर्वेदिक इलाज से धीरे-धीरे उनकी याददाश्त वापस आने लगी। जैसे ही उन्हें अपने अतीत की याद आई, उन्होंने तय किया कि वह अपना अधूरा बीडीएस कोर्स पूरा करेंगी। वह वापस बेंगलुरु के उसी कॉलेज में गईं। उनके परिवार ने वहां उनकी देखभाल के लिए एक केयरटेकर का इंतजाम किया। अथिरा बताती हैं, "मैं पहले तीन सालों की सारी पढ़ाई भूल चुकी थी, लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। मैंने वहीं से दोबारा शुरुआत की जहां से सब छूटा था और आखिरकार अपना कोर्स पूरा किया।"
कोविड-19 का वो दौर और जिंदगी का नया मकसद
जिंदगी का अगला बड़ा मोड़ साल 2020 में आया। अथिरा वापस कोझिकोड आ गईं और एक एनजीओ (NGO) के साथ वॉलंटियर के तौर पर जुड़ गईं। यह वो वक्त था जब पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी की दहशत में थी। इस दौरान उन्होंने दिव्यांगों (differently-abled) के बीच काम करना शुरू किया। अथिरा कहती हैं, "उन दिनों मैंने अपने जैसे ही कई दिव्यांग लोगों की परेशानियों और तकलीफों को बेहद करीब से समझा। उसी दौरान मेरे अंदर एक बड़े कैनवस पर काम करने का सपना जागा। मैं समाज में बदलाव लाना चाहती थी, और इसी सोच ने मुझे सिविल सर्विस की तरफ कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।"
ऐसा था संघर्ष का सफर
यूपीएससी का सफर किसी के लिए भी आसान नहीं होता, और अथिरा के लिए तो चुनौतियां और भी बड़ी थीं। उन्होंने तिरुवनंतपुरम स्थित 'एब्सोल्यूट आईएएस एकेडमी' में दाखिला लिया। इस एकेडमी में 'बटरफ्लाई' नाम का एक खास प्रोग्राम चलाया जाता है, जो खास तौर पर यूपीएससी की तैयारी करने वाले दिव्यांग छात्रों के लिए है। अथिरा ने मलयालम भाषा को अपना वैकल्पिक (optional) विषय चुना और ऑनलाइन क्लासेज लेना शुरू किया। उनके माता-पिता, सुगथन और मिनी (जो दोनों एलआईसी एजेंट हैं), हर कदम पर उनके साथ खड़े रहे और कभी-कभी उन्हें सपोर्ट करने के लिए तिरुवनंतपुरम भी ले जाते थे।
छोटी बहन का वो बड़ा बलिदान जो आंखों में आंसू ला दे
इस पूरी कामयाबी के पीछे एक ऐसी कहानी भी है जो किसी को भी भावुक कर सकती है। अथिरा की इस लंबी लड़ाई में सबसे बड़ा सहारा उनकी छोटी बहन अनघा बनीं। अनघा उस वक्त बीएससी साइकोलॉजी (BSc Psychology) की पढ़ाई कर रही थीं, लेकिन अपनी बड़ी बहन की देखभाल करने के लिए उन्होंने अपनी डिग्री बीच में ही छोड़ दी। उन्होंने अपना करियर बदलकर बीएससी नर्सिंग (BSc Nursing) में दाखिला ले लिया ताकि वह बेहतर तरीके से अथिरा का ख्याल रख सकें।
अथिरा भरे गले से बताती हैं, "मैं अपनी बहन की ताउम्र कर्जदार रहूंगी। उसके बलिदान और समर्पण ने ही मुझे इस मुकाम तक पहुंचाया है। जब यूपीएससी के इंटरव्यू में मुझसे पूछा गया कि मेरा सबसे अच्छा दोस्त कौन है, तो मैंने बिना सोचे अपनी बहन का नाम लिया।"
भविष्य की उड़ान
आईएएस (IAS) अधिकारी बनने का सपना आंखों में सजाए अथिरा का कहना है कि अगर इस बार उनका सेलेक्शन आईएएस के लिए नहीं होता है, तो वह हार नहीं मानेंगी और एक बार फिर परीक्षा देंगी। उनके शब्द आज हर उस इंसान के लिए प्रेरणा हैं जो छोटी-छोटी मुश्किलों से हार मान लेते हैं। वह कहती हैं, "उस संकट ने मेरे अंदर के एक बेहद साहसी इंसान को बाहर निकाल दिया। मैंने तभी तय कर लिया था कि व्हीलचेयर पर बैठी यह जिंदगी मेरे बड़े सपने देखने के आड़े कभी नहीं आएगी।"
लेखक के बारे में
Himanshu Tiwariशॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।
परिचय एवं अनुभव
हिमांशु तिवारी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। बीते 10 सालों से वह लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस वक्त लाइव हिन्दुस्तान में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और बीते 3 साल से वह इस संस्थान से जुड़े हैं। शिक्षा, करियर, नौकरियों, नीट, जेईई, बैंकिंग, एसएससी और यूपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी और आरपीएससी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी खास पकड़ मानी जाती है। हिमांशु ने साल 2016 में पत्रकारिता की शुरुआत एबीपी न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म से किया। इसके बाद वह इंडिया टीवी और जी न्यूज (डीएनए) जैसे बड़े न्यूज चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी हिस्सा रह चुके हैं। हिमांशु तिवारी सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक सजग पाठक और आजीवन विद्यार्थी हैं, उनकी यही खूबी उनके कार्य में परिलक्षित होती है। उनका मानना है कि इन परीक्षाओं से जुड़ी सही और समय पर जानकारी लाखों युवाओं के भविष्य को दिशा दे सकती है, इसलिए वह इस बीट को सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।
लेखन की सोच और मकसद
हिमांशु के लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ सूचना देना नहीं है, बल्कि पाठक को सोचने की जगह देना भी है। खासकर करियर और शिक्षा के क्षेत्र में वह यह मानते हैं कि एक गलत या अधूरी खबर किसी छात्र की पूरी तैयारी को भटका सकती है। इसलिए उनके लेखन में सरल भाषा, ठोस तथ्य और व्यावहारिक नजरिया हमेशा प्राथमिकता में रहता है। उनकी कोशिश रहती है कि पाठक को सिर्फ खबर की जानकारी ही न हो, बल्कि यह भी समझ आए कि उस खबर का उसके जीवन और भविष्य से क्या रिश्ता है।
शिक्षा और अकादमिक पृष्ठभूमि
हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।
रुचियां और निजी झुकाव
काम से इतर हिमांशु की गहरी रुचि समकालीन इतिहास, समानांतर सिनेमा और दर्शन में रही है। राजनीति और विदेश नीति पर पढ़ना-लिखना उन्हें विशेष रूप से पसंद है। इसी रुचि के चलते उन्होंने दो लोकसभा चुनावों और दर्जनों विधानसभा चुनावों की कवरेज की, जहां राजनीति को उन्होंने बेहद नजदीक से देखा और समझा। चुनावी आंकड़ों की बारीकियां, नेताओं के भाषण, जमीनी मुद्दे और जनता की प्रतिक्रियाएं, इन सभी पहलुओं को समेटते हुए उन्होंने सैकड़ों खबरें और विश्लेषण तैयार किए, जो राजनीतिक प्रक्रिया की गहरी समझ को दर्शाते हैं।
विशेषज्ञताएं
- शिक्षा, करियर और नौकरियों से जुड़ी खबरों पर विशेष रुचि और निरंतर लेखन
- नीट, जेईई और राज्यवार बोर्ड परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों, बदलावों और परिणामों पर गहन फोकस
- UPSC, UPPSC, MPPSC, BPSC, RPSC और JPSC जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी, पैटर्न और नीतिगत पहलुओं पर पैनी नजर
- अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और विदेश नीति से जुड़े विषयों का विश्लेषणात्मक लेखन
- राजनीति, चुनावी आंकड़ों और जमीनी मुद्दों पर सरल और तथ्यपरक एक्सप्लेनर तैयार करने का अनुभव


