अनुभव के भरोसे नहीं मिलेगी छूट, यूपी में प्रधानाचार्य बनने के लिए PG में 50% अंक जरूरी, और क्या बदले नियम

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यूपी में प्रधानाचार्य व प्रधानाध्यापक की अर्हता बदल गई है अब इस पद के लिए पीजी में 50 फीसदी अंक जरूरी है साथ ही बीएड अनिवार्य कर दिया गया है।

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स्कूली छात्र

यूपी में सरकारी और सहायता प्राप्त इंटर कॉलेजों में प्रधानाचार्य और हाईस्कूलों में प्रधानाध्यापक बनने की चाहत रखने वाले शिक्षकों के लिए राहत भरी खबर आई है। बरसों से चली आ रही अर्हता की उलझन को सुलझाते हुए प्रदेश सरकार ने नियमों में बड़ा फेरबदल कर दिया है। अब पीजी में सिर्फ 50 फीसदी अंक होने पर भी शिक्षक इन प्रतिष्ठित पदों के लिए आवेदन कर सकेंगे।

माध्यमिक शिक्षा विभाग की ओर से जारी इस आदेश पर विशेष सचिव संदीप परमार के हस्ताक्षर हैं। दरअसल, उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा अधिनियम 1921 के अध्याय 2 के विनियम-1 के परिशिष्ट क में संस्था प्रधान की अर्हता को लेकर प्रावधान दर्ज हैं। इसी परिशिष्ट में संशोधन करते हुए विभाग ने प्रधानाचार्य और प्रधानाध्यापक, दोनों पदों की योग्यता को नए सिरे से परिभाषित किया है।

पीजी में 50 फीसदी अंक जरूरी

नए नियम के मुताबिक, इंटर कॉलेजों में प्रधानाचार्य बनने के लिए अभ्यर्थी का स्नातकोत्तर यानी पीजी में कम से कम 50 फीसदी अंकों के साथ उत्तीर्ण होना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके अलावा एनसीटीई से मान्यता प्राप्त संस्थान से बीएड की डिग्री होना भी जरूरी शर्त बना दी गई है, जो पहले शामिल नहीं थी। शैक्षणिक अनुभव के मोर्चे पर देखें तो पुराना ढांचा ही बरकरार रखा गया है। यानी अभ्यर्थी के पास कक्षा नौ से बारह तक प्रवक्ता या सहायक अध्यापक के पद पर कम से कम चार साल पढ़ाने का अनुभव होना चाहिए। इसके साथ ही हाईस्कूल में प्रधानाध्यापक के पद पर भी न्यूनतम चार साल तक काम कर चुका होना जरूरी है। आयु सीमा को लेकर भी स्पष्ट कर दिया गया है कि अभ्यर्थी की उम्र 30 साल से कम नहीं होनी चाहिए।

वहीं हाईस्कूल स्तर पर प्रधानाध्यापक पद के लिए भी लगभग मिलती-जुलती शर्तें रखी गई हैं, हालांकि इसमें एक अतिरिक्त योग्यता जोड़ी गई है। यहां भी पीजी में 50 फीसदी अंक अनिवार्य होंगे, मगर बीएड के साथ-साथ बीपीएड की डिग्री भी होनी चाहिए, जो शारीरिक शिक्षा में प्रशिक्षण को अनिवार्य बनाती है। अनुभव के मामले में केंद्र या राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त संस्थानों में कक्षा नौ से बारह तक प्रवक्ता या सहायक अध्यापक पद पर चार साल का अनुभव मांगा गया है। साथ ही जूनियर हाईस्कूल में प्रधानाध्यापक पद पर भी कम से कम चार साल काम करने की शर्त रखी गई है। यहां भी न्यूनतम आयु 30 वर्ष तय की गई है।

अनुभव नहीं अंक जरूरी

गौरतलब है कि अब तक दोनों पदों, प्रधानाचार्य और प्रधानाध्यापक, के लिए अर्हता लगभग एक समान ही मानी जाती थी और इसे लेकर अक्सर भ्रम की स्थिति बनी रहती थी। इतना ही नहीं, पुराने नियमों में एक और सुविधा यह थी कि जिन अभ्यर्थियों के पास ज्यादा अनुभव होता था, उन्हें पीजी के अंकों में कुछ छूट भी मिल जाती थी। अब विभाग ने इस छूट वाले प्रावधान को पूरी तरह खत्म कर दिया है, यानी चाहे अनुभव कितना भी क्यों न हो, पीजी में 50 फीसदी अंक हर हाल में लाने होंगे। इसके अलावा एक और अहम बदलाव यह हुआ है कि डिप्लोमा के आधार पर मिलने वाली अर्हता को भी अब पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है।

शिक्षा जगत से जुड़े जानकारों का मानना है कि यह संशोधन दोनों पदों की योग्यता को बेहतर ढंग से परिभाषित करने और भर्ती प्रक्रिया में एकरूपता लाने की दिशा में उठाया गया कदम है। बीएड को अनिवार्य किए जाने से शिक्षण गुणवत्ता को भी बल मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। विभाग के इस फैसले के बाद अब हजारों शिक्षकों को अपने आवेदन से पहले नई अर्हता के हिसाब से खुद को परखना होगा।

Himanshu Tiwari

लेखक के बारे में

Himanshu Tiwari

शॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।

परिचय एवं अनुभव
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