जिसे शिक्षक बनना ही नहीं था, कौन हैं मैडम पुष्पा प्रसाद? अब राष्ट्रपति करेंगी सम्मानित
गोपालगंज की शिक्षिका पुष्पा प्रसाद को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। यह पुरस्कार उन्हें 5 सितंबर को दिल्ली में राष्ट्रपति से मिलेगा।

गोपालगंज की एक सरकारी शिक्षिका जो कभी कंप्यूटर सेंटर खोलने का सपना देखा करती थीं, अब देश के सबसे बड़े शिक्षक सम्मान की हकदार बन गई हैं। पटना से आ रही यह खबर बिहार के शिक्षा जगत के लिए गर्व की बात है, क्योंकि गोपालगंज की पुष्पा प्रसाद को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चुना गया है और यह सम्मान उन्हें 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के मौके पर मिलेगा।
एनडीटीवी की रिपोर्ट की मानें तो पुष्पा प्रसाद, गोपालगंज के कुचायकोट स्थित कन्या मध्य विद्यालय में सहायक शिक्षिका हैं। देशभर से जिन 11 शिक्षकों को इस साल राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चुना गया है, उनमें बिहार से दो नाम शामिल हैं, पहला गोपालगंज की पुष्पा प्रसाद और दूसरा बांका की खुशबू कुमारी का। दोनों शिक्षिकाओं को नई दिल्ली में एक भव्य समारोह में सम्मानित किया जाएगा, जहां देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू खुद उन्हें पुरस्कार प्रदान करेंगी।
पुष्पा नहीं बनना चाहतीं थीं टीचर
दिलचस्प बात यह है कि पुष्पा प्रसाद कभी शिक्षिका बनने की योजना ही नहीं बना रही थीं। कंप्यूटर शिक्षा में डिप्लोमा करने के बाद उनका सपना था कि वे अपना खुद का कंप्यूटर सेंटर खोलें और बच्चों को वहां पढ़ाएं। लेकिन तकदीर ने कुछ और ही तय कर रखा था। उनके पति बाल्मीकि प्रसाद, जो खुद 1999 बैच के बीपीएससी शिक्षक हैं, ने उन्हें शिक्षण के पेशे में आने के लिए प्रोत्साहित किया। यही सलाह आगे चलकर पुष्पा प्रसाद के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई।
पुष्पा का बचपन वायुसेना परिवार की छत्रछाया में बीता। उनके पिता रघुनंदन प्रसाद वायुसेना में कार्यरत थे और बेंगलुरु में तैनात थे, जहां पुष्पा ने कक्षा नौ तक केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाई की। बाद में पिता का तबादला हरियाणा के नजफगढ़ हो गया, जहां से उन्होंने दसवीं और बारहवीं की पढ़ाई पूरी की। यानी एक फौजी परिवार में पली-बढ़ी बेटी ने आगे चलकर शिक्षा के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई।
साल 2004 में हुआ विवाह
16 मई 2004 को पुष्पा का विवाह बाल्मीकि प्रसाद से हुआ और शादी के एक साल बाद ही दंपती को एक बेटा हुआ। घर-गृहस्थी और मातृत्व की जिम्मेदारियों के बीच भी पुष्पा ने पढ़ाई जारी रखी, जो उनकी दृढ़ता को दर्शाता है। साल 2006 में गोपालगंज पंचायत नियोजन प्रक्रिया के तहत उनका चयन शिक्षिका पद पर हुआ। उस दौर में उनके पति गोपालगंज के बलिवन सागर में ही सरकारी शिक्षक के तौर पर तैनात थे। पुष्पा ने प्राथमिक विद्यालय बलिवन सागर में करीब सात साल तक सेवा दी और इस दौरान अपने पढ़ाने के तरीके तथा स्कूल प्रबंधन की वजह से स्थानीय स्तर पर खूब सराहना बटोरी।
25 मार्च 2013 को उनका तबादला कन्या मध्य विद्यालय, कुचायकोट में हो गया, जहां वे आज भी सेवारत हैं। स्कूल में वे गणित, हिंदी और अंग्रेजी जैसे कई विषय पढ़ाती हैं। इतना ही नहीं, अपने खाली समय और छुट्टियों का इस्तेमाल भी वे बालिकाओं को पेंटिंग और अन्य सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां सिखाने में करती हैं। यानी क्लासरूम की चारदीवारी से बाहर निकलकर भी वे बच्चियों के समग्र विकास के लिए मेहनत करती रही हैं।
उनके इस समर्पण को समय-समय पर पहचान भी मिली है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर उन्हें जिला स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है, और पटना में उन्हें दो बार राजकीय पुरस्कार से नवाजा गया है। अब राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार उनके करियर का एक और मील का पत्थर साबित हुआ है।
अपने हालिया इंटरव्यू में पुष्पा प्रसाद ने बताया कि जब उन्हें पता चला कि उनका नाम राष्ट्रीय सम्मान के लिए चुने गए शिक्षकों की सूची में शामिल है, तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ। उन्हें इस बारे में मीडिया के जरिए ही जानकारी मिली और वे बेहद उत्साहित हैं। पुष्पा का कहना है कि गोपालगंज के दियारा इलाके के एक छोटे से गांव के स्कूल को बदलने की उनकी कोशिशों को आखिरकार पहचान मिल गई है। उनके पति और सहकर्मियों ने भी उन्हें इस उपलब्धि पर बधाई दी है।


