कौन हैं स्वामी प्रणवानंद, जिनका इतिहास अब पढ़ेंगे बंगाल के बच्चे; CM सुभेंदु ने किया है ऐलान
बंगाल सरकार अब स्कूली पाठ्यक्रम में स्वामी प्रणवानंद और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन व योगदान से जुड़े अध्याय शामिल करेगी।

कोलकाता की गलियों में एक बार फिर इतिहास और राजनीति का पुराना रिश्ता सुर्खियों में है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुभेंदु अधिकारी ने शनिवार को एक बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि राज्य के स्कूली पाठ्यक्रम में अब भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और भारत सेवाश्रम संघ के संस्थापक स्वामी प्रणवानंद के जीवन और योगदान से जुड़े अध्याय शामिल किए जाएंगे। इस घोषणा के बाद से ही लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर स्वामी प्रणवानंद कौन थे और उनका बंगाल के इतिहास में इतना बड़ा स्थान क्यों माना जाता है।
कौन थे स्वामी प्रणवानंद
स्वामी प्रणवानंद का जन्म 29 जनवरी 1896 को अविभाजित बंगाल के फरीदपुर जिले (अब बांग्लादेश में) के बाजितपुर गांव में हुआ था। बचपन का नाम बिनोद था। उनके पिता विष्णुचरण दास और माता शारदा देवी शिवभक्त थे, और कहा जाता है कि बचपन से ही वे गहरे ध्यान और आध्यात्मिक चिंतन में डूबे रहते थे। बड़े होकर उन्होंने योग और साधना का मार्ग अपनाया और बाबा गंभीरनाथ जी को अपना गुरु बनाया। उनके अनुयायी उन्हें भगवान शिव का अवतार मानते हैं।
सन् 1917 में स्वामी प्रणवानंद ने भारत सेवाश्रम संघ की स्थापना की, जो संन्यासियों और निःस्वार्थ सेवकों का एक ऐसा संगठन है जो मानवता की सेवा, राष्ट्र-रक्षा और लोकोपकार के काम में जुटा रहता है। आज इस संघ का मुख्यालय कोलकाता में है और देश-विदेश में इसकी दर्जनों शाखाएं फैली हुई हैं। 1919 में जब बंगाल भीषण चक्रवात की चपेट में आया था, तब स्वामी प्रणवानंद के आश्रम ने राहत और सेवा कार्यों में अहम भूमिका निभाई थी, जिसने उन्हें आम जनता के बीच खासी लोकप्रियता दिलाई। वे स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े रहे और महज 44 साल की उम्र में 8 जनवरी 1941 को उन्होंने महासमाधि ली।
बंटवारे के दौर में निभाई अहम भूमिका
मुख्यमंत्री सुभेंदु अधिकारी ने अपने बयान में खास तौर पर इस बात का जिक्र किया कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी और स्वामी प्रणवानंद, दोनों ने ही पश्चिम बंगाल के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनका कहना था कि भारत के बंटवारे के उस मुश्किल दौर में इन दोनों शख्सियतों ने करोड़ों हिंदुओं की जान बचाने में योगदान दिया था। सुभेंदु अधिकारी ने कहा, "हम विद्यालयों के पाठ्यक्रम में श्यामा प्रसाद मुखर्जी और स्वामी प्रणवानंद के योगदान और बलिदान से जुड़े अध्यायों को शामिल करेंगे, जिन्होंने पश्चिम बंगाल के निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी।"
पुरानी सरकार पर साधा निशाना
इस मौके पर मुख्यमंत्री ने पिछली तृणमूल कांग्रेस सरकार पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में स्कूलों की बुनियादी सुविधाएं और ढांचा बदहाल हो गया था, क्योंकि उस सरकार का पूरा ध्यान 'खेला', 'मेला', पूजा अनुदान और इमामों के भत्ते पर केंद्रित रहा। इससे पहले भी सुभेंदु अधिकारी यह आरोप लगा चुके हैं कि पुराने पाठ्यक्रम को राजनीतिक मकसद से इस तरह गढ़ा गया था कि ईश्वरचंद्र विद्यासागर और स्वामी विवेकानंद जैसी महान हस्तियों की शिक्षाओं को हाशिये पर धकेल दिया गया, जबकि सिंगूर आंदोलन जैसे राजनीतिक घटनाक्रमों को तवज्जो दी गई।
शिक्षा सुधार का बड़ा एलान
पाठ्यक्रम में बदलाव के साथ-साथ मुख्यमंत्री ने स्कूलों के लिए बड़े ऐलान भी किए। उन्होंने बताया कि सरकारी और सहायता प्राप्त विद्यालयों के लिए 300 करोड़ रुपये का समग्र अनुदान जारी किया जाएगा, जिसका इस्तेमाल स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं बढ़ाने और शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने में किया जाएगा। सरकार का मकसद यह है कि आने वाली पीढ़ी बंगाल के उन महापुरुषों के त्याग और संघर्ष से परिचित हो, जिन्होंने राज्य के निर्माण और सामाजिक उत्थान में अपना जीवन समर्पित कर दिया।


