प्राइवेट टीचर्स भी पेंशन के हकदार? सुप्रीम कोर्ट पहुंची याचिका, किस आधार पर उठी मांग
सुप्रीम कोर्ट ने प्राइवेट स्कूल टीचर्स की पेंशन, मेडिकल सुविधा और सामाजिक सुरक्षा को लेकर याचिका पर केंद्र व राज्यों से जवाब मांगा है। इस मामले की अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद निर्धारित है।

देश के 37 लाख से ज्यादा प्राइवेट स्कूल टीचर्स के लिए बड़ी खबर सामने आ रही है। गुरुवार 10 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसी जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया जिसमें देशभर के निजी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए रिटायरमेंट के बाद पेंशन, मेडिकल सुविधा और सामाजिक सुरक्षा की मांग की गई है। मामला केंद्र सरकार से लेकर तमाम राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक पहुंच चुका है और अब चार हफ्ते बाद इस पर अगली सुनवाई होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने केंद्र सरकार, सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों के साथ-साथ नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (NCTE) जैसी संस्थाओं को भी नोटिस भेजा है। कोर्ट ने इस याचिका को चार हफ्ते के लिए पोस्ट कर दिया है, यानी इतने समय के भीतर संबंधित पक्षों को अपना जवाब दाखिल करना होगा। यह याचिका ऑल इंडिया टीचर्स फेडरेशन की नेशनल कोऑर्डिनेटर लिगिमोल जॉर्ज ने दाखिल की है। उनकी ओर से एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड दीपक प्रकाश ने कोर्ट में पक्ष रखा। यह मामला अनुच्छेद 32 के तहत रिट पिटीशन के रूप में दर्ज किया गया है।
संविधान के हवाले से उठाया गया सवाल
याचिका का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इसमें प्राइवेट स्कूल टीचर्स के काम को सीधे संविधान के अनुच्छेद 21A से जोड़ा गया है, जो शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाता है। तर्क यह दिया गया है कि जब यह शिक्षक संविधान की इस भावना को जमीन पर उतारने का काम कर रहे हैं, तो उनके खुद के बुढ़ापे की सुरक्षा को नजरअंदाज करना असंगत है। याचिका में कहा गया है कि नेशनल प्राइवेट स्कूल टीचर्स वेलफेयर बोर्ड जैसी किसी संस्था के न होने, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा के लिए ठोस कानून के अभाव और मेडिकल सहायता, बीमा, कल्याण कोष जैसे इंतजामों में तालमेल न होने से एक बड़ा कानूनी खालीपन पैदा हो गया है, जो सीधे शिक्षकों की गरिमा और आर्थिक सुरक्षा पर चोट करता है। जैसा कि लाइवलॉ की रिपोर्ट में सामने आया है, याचिका ने इसे संवैधानिक जांच के दायरे में लाने की मांग की है।
याचिका में लिखा गया है, "नेशनल प्राइवेट स्कूल टीचर्स वेलफेयर बोर्ड की लगातार अनुपस्थिति, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा का व्यापक कानूनी ढांचा न होना, और रिटायरमेंट के बाद सुरक्षा, मेडिकल सहायता, बीमा, कल्याण कोष तथा पारिवारिक फायदों के लिए किसी समन्वित संस्थागत तंत्र की गैरमौजूदगी ने देशभर के लाखों शिक्षकों को प्रभावित करने वाला एक बड़ा कानूनी और नीतिगत खालीपन पैदा कर दिया है।" जैसा कि लाइवलॉ की रिपोर्ट में बताया गया है, याचिका में इसे शिक्षकों की गरिमा, आर्थिक सुरक्षा और जीवन की गुणवत्ता से सीधे जुड़ा मुद्दा बताते हुए संवैधानिक जांच की मांग की गई है।
37 लाख से ज्यादा शिक्षकों पर सीधा असर
याचिका में यूडाइस प्लस के 2023-24 के आंकड़ों का हवाला दिया गया है, जिसके मुताबिक देशभर के मान्यता प्राप्त प्राइवेट अनएडेड स्कूलों में करीब 37 लाख 30 हजार शिक्षक कार्यरत हैं। इतनी बड़ी संख्या के बावजूद इनके लिए कोई एकसमान राष्ट्रीय व्यवस्था नहीं होने की बात याचिका में उठाई गई है। याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि बड़ी संख्या में प्राइवेट स्कूल टीचर्स को रिटायरमेंट के समय उचित पेंशन नहीं मिलती। न मेडिकल सहायता का कोई ठोस इंतजाम है, न बीमा सुरक्षा, न परिवार के लिए कल्याण योजनाएं और न ही दिव्यांगता की स्थिति में कोई सहयोग। नतीजा यह होता है कि ये शिक्षक रिटायरमेंट के बाद आर्थिक तंगी और अनिश्चितता के दौर से गुजरने को मजबूर हो जाते हैं।
मौजूदा कानूनों में सीमित सुरक्षा
याचिका में इस बात का भी जिक्र है कि एम्प्लॉइज स्टेट इंश्योरेंस एक्ट, एम्प्लॉइज प्रोविडेंट फंड्स एंड मिसलेनियस प्रोविजन्स एक्ट, पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट और कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी 2020 जैसे मौजूदा कानून प्राइवेट स्कूल टीचर्स को केवल सीमित और खंडित सुरक्षा ही दे पाते हैं। इनका लाभ भी पात्रता की शर्तों और राज्य-विशेष नियमों पर निर्भर करता है, जिससे एकरूपता की कमी बनी रहती है। इसी वजह से याचिका में एक नेशनल प्राइवेट स्कूल टीचर्स वेलफेयर बोर्ड या इसी तरह की किसी संस्थागत व्यवस्था के गठन की मांग की गई है, जो पूरे देश में पेंशन, प्रोविडेंट फंड, ग्रेच्युटी और शिकायत निवारण जैसी सुविधाओं की निगरानी और समन्वय कर सके। अब देखना यह होगा कि केंद्र सरकार और राज्य इस मामले में चार हफ्ते के भीतर क्या जवाब दाखिल करते हैं।


