बच्चे गुमराह हो रहे मीलॉर्ड... बिना मान्यता चल रहे धार्मिक संस्थानों पर सवाल; सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

Himanshu Tiwari पीटीआई, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट 11 मई को उस जनहित याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें 14 साल से कम उम्र के बच्चों को शिक्षा या धार्मिक शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों के रजिस्ट्रेशन और निगरानी की मांग की गई है।

बच्चे गुमराह हो रहे मीलॉर्ड... बिना मान्यता चल रहे धार्मिक संस्थानों पर सवाल; सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

देशभर में 14 साल से कम उम्र के बच्चों को पढ़ाने या धार्मिक शिक्षा देने वाले गैर मान्यता प्राप्त संस्थानों को लेकर विवाद अब देश की सबसे बड़ी अदालत पहुंच गया है। इस बाबत सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होने जा रहा है। अदालत 11 मई को उस जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करेगी जिसमें मांग की गई है कि ऐसे सभी संस्थानों का रजिस्ट्रेशन, मान्यता और निगरानी अनिवार्य की जाए। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब कई इलाकों में बिना मान्यता वाले संस्थानों के संचालन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। याचिका में कहा गया है कि बच्चों की कम उम्र और समझ को देखते हुए राज्य की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

दो जजों की बेंच करेगी सुनवाई

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच इस मामले की सुनवाई कर सकती है। यह जनहित याचिका वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की तरफ से दायर की गई है, जिसे अधिवक्ता अश्वनी दुबे के जरिए सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया। याचिका में अदालत से अपील की गई है कि देशभर में बच्चों को धर्मनिरपेक्ष शिक्षा या धार्मिक शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों को कानूनी दायरे में लाया जाए।

संविधान के कई अनुच्छेदों का दिया गया हवाला

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21ए, 39(एफ), 45 और 51-ए(के) का हवाला दिया गया है। इसमें कहा गया है कि बच्चों को सुरक्षित और बेहतर शिक्षा देना राज्य की जिम्मेदारी है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि अदालत केंद्र और राज्यों को निर्देश दे कि वे ऐसे सभी संस्थानों को रजिस्टर करें, उनकी पहचान तय करें और समय-समय पर उनकी निगरानी करें।

अनुच्छेद 30 को लेकर भी उठाया सवाल

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 30 को लेकर भी व्याख्या मांगी गई है। इसमें कहा गया है कि अल्पसंख्यकों को दिए गए अधिकार अनुच्छेद 19(1)(जी) से अलग कोई अतिरिक्त विशेषाधिकार नहीं देते। याचिका में अदालत से यह भी घोषित करने की मांग की गई है कि अनुच्छेद 30 केवल अनुच्छेद 19(1)(जी) का विस्तार है और उससे अतिरिक्त अधिकार नहीं मिलते।

बच्चों को गुमराह किया जा सकता है: पीआईएल

याचिका में कहा गया है कि छोटे बच्चे बहुत मासूम और आसानी से प्रभावित होने वाले होते हैं। इसलिए उनकी शिक्षा और मानसिक विकास को लेकर सरकार की जिम्मेदारी ज्यादा होती है। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि बिना रजिस्ट्रेशन और बिना निगरानी चलने वाले संस्थानों में बच्चों को गलत तरीके से प्रभावित या ब्रेनवॉश किया जा सकता है। इसी वजह से इस मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जोड़ा गया है।

यूपी बॉर्डर के जिलों का भी किया जिक्र

अश्विनी उपाध्याय ने अपनी याचिका में कहा कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे कई जिलों का दौरा किया, जहां बड़ी संख्या में बिना रजिस्ट्रेशन और बिना मान्यता वाले संस्थान चलते मिले। याचिका में दावा किया गया कि सीमावर्ती इलाकों में ऐसे संस्थान तेजी से बढ़ रहे हैं लेकिन उन पर कोई प्रभावी निगरानी व्यवस्था मौजूद नहीं है।

Himanshu Tiwari

लेखक के बारे में

Himanshu Tiwari

शॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।

परिचय एवं अनुभव
हिमांशु तिवारी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। बीते 10 सालों से वह लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस वक्त लाइव हिन्दुस्तान में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और बीते 3 साल से वह इस संस्थान से जुड़े हैं। शिक्षा, करियर, नौकरियों, नीट, जेईई, बैंकिंग, एसएससी और यूपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी और आरपीएससी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी खास पकड़ मानी जाती है। हिमांशु ने साल 2016 में पत्रकारिता की शुरुआत एबीपी न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म से किया। इसके बाद वह इंडिया टीवी और जी न्यूज (डीएनए) जैसे बड़े न्यूज चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी हिस्सा रह चुके हैं। हिमांशु तिवारी सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक सजग पाठक और आजीवन विद्यार्थी हैं, उनकी यही खूबी उनके कार्य में परिलक्षित होती है। उनका मानना है कि इन परीक्षाओं से जुड़ी सही और समय पर जानकारी लाखों युवाओं के भविष्य को दिशा दे सकती है, इसलिए वह इस बीट को सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।

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हिमांशु के लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ सूचना देना नहीं है, बल्कि पाठक को सोचने की जगह देना भी है। खासकर करियर और शिक्षा के क्षेत्र में वह यह मानते हैं कि एक गलत या अधूरी खबर किसी छात्र की पूरी तैयारी को भटका सकती है। इसलिए उनके लेखन में सरल भाषा, ठोस तथ्य और व्यावहारिक नजरिया हमेशा प्राथमिकता में रहता है। उनकी कोशिश रहती है कि पाठक को सिर्फ खबर की जानकारी ही न हो, बल्कि यह भी समझ आए कि उस खबर का उसके जीवन और भविष्य से क्या रिश्ता है।

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हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।

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काम से इतर हिमांशु की गहरी रुचि समकालीन इतिहास, समानांतर सिनेमा और दर्शन में रही है। राजनीति और विदेश नीति पर पढ़ना-लिखना उन्हें विशेष रूप से पसंद है। इसी रुचि के चलते उन्होंने दो लोकसभा चुनावों और दर्जनों विधानसभा चुनावों की कवरेज की, जहां राजनीति को उन्होंने बेहद नजदीक से देखा और समझा। चुनावी आंकड़ों की बारीकियां, नेताओं के भाषण, जमीनी मुद्दे और जनता की प्रतिक्रियाएं, इन सभी पहलुओं को समेटते हुए उन्होंने सैकड़ों खबरें और विश्लेषण तैयार किए, जो राजनीतिक प्रक्रिया की गहरी समझ को दर्शाते हैं।

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