CBSE की तीन-भाषा नीति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में थी सुनवाई, केंद्र ने क्या रखा पक्ष
सुप्रीम कोर्ट ने CBSE की तीन-भाषा नीति पर सुनवाई टाल गई है। केंद्र ने कार्यान्वयन के सुझावों के लिए और समय मांगा है जिसके लिए अगले हफ्ते अगली सुनवाई होगी।

नौवीं कक्षा के बच्चों को तीन भाषाएं पढ़ाने की अनिवार्यता को लेकर पिछले कई महीनों से चल रही कानूनी जंग गुरुवार को एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंची मगर नतीजा वही रहा जो बीते कुछ हफ्तों से होता आ रहा है यानी मामला अगले हफ्ते के लिए टाल दिया गया। केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस ज्योमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच को बताया कि CBSE इस नीति को लागू करने के तौर-तरीकों पर अभी काम कर रहा है और इसके लिए उसे थोड़ा और वक्त चाहिए। बेंच ने केंद्र की इस दलील को रिकॉर्ड में लेते हुए सुनवाई को अगले हफ्ते के लिए स्थगित कर दिया।
यह पूरा विवाद तब और गरमा गया था जब 20 अगस्त को इसी बेंच ने साफ लफ्जों में कहा था कि तीन-भाषा नीति लागू करने में कुछ भी गलत नहीं है, मगर सवाल इस बात का है कि इसे किस तरीके से जमीन पर उतारा जा रहा है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था, "आप इनमें से कुछ दिक्कतों पर दोबारा गौर करें। इसमें कोई शक नहीं कि देर-सबेर इसे लागू करना ही होगा, इसमें कुछ गलत भी नहीं है। लेकिन जो रुकावटें या अड़चनें सामने आ रही हैं, उन्हें कैसे सुलझाया जाए, इसका कोई हल आपको ढूंढना होगा।"
जुलाई में भी उठ चुका है मामला
गौरतलब है कि यह विवाद नया नहीं है। जुलाई के महीने में भी जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में उठा था, तो अदालत ने साफ कहा था कि नौवीं जैसी बोर्ड परीक्षा से पहले वाली कक्षा में नई भाषा थोपना बच्चों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। उस वक्त जस्टिस बी वी नागरत्ना ने भी एक अलग सुनवाई के दौरान इस नीति पर तीखे सवाल उठाए थे और कहा था कि नौवीं कक्षा वैसे ही तनाव भरी होती है, ऐसे में नई भाषा शुरू करने का क्या तुक बनता है। कोर्ट की राय रही है कि तीसरी भाषा की पढ़ाई अगर शुरू करनी ही है तो कक्षा पांच-छह से शुरू होकर नौवीं तक खत्म हो जानी चाहिए, न कि नौवीं में जाकर नए सिरे से शुरू की जाए।
गुरुवार की सुनवाई में एक अहम मुद्दा यह भी उठा कि जिन भाषाओं का विकल्प छात्रों को दिया जा रहा है, उनके लिए पर्याप्त शिक्षक और संसाधन कहां से आएंगे। दरअसल पहले ही CBSE ने एक नोटिस के जरिए यह भी बता दिया था कि जब तक R3 यानी तीसरी भाषा की समर्पित किताबें तैयार होकर नहीं आतीं, तब तक नौवीं कक्षा के बच्चों को कक्षा छह की ही R3 किताबें (2026-27 संस्करण) पढ़नी होंगी। यह व्यवस्था भी याचिकाकर्ताओं के निशाने पर रही है, क्योंकि उनका कहना है कि उम्र और स्तर के हिसाब से यह ठीक नहीं बैठता।
अगले फिर होगी सुनवाई
बता दें कि CBSE ने यह तीन-भाषा नीति 2026-27 के शैक्षणिक सत्र से लागू की है। यह पूरी व्यवस्था राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF-SE) 2023 के मुताबिक तैयार की गई है। नई R1-R2-R3 प्रणाली के तहत हर छात्र को तीन भाषाएं सीखनी होंगी, जिनमें से कम से कम दो भाषाएं भारत की मूल भाषाओं में से होनी अनिवार्य हैं। इस नीति को लेकर तमिलनाडु समेत कई गैर-हिंदी भाषी राज्यों में पहले से ही राजनीतिक तापमान गर्म रहा है, जहां इसे "हिंदी थोपने" की कोशिश करार दिया जाता रहा है, हालांकि केंद्र सरकार इस आरोप को लगातार खारिज करती आई है। फिलहाल मामला अगले हफ्ते फिर सुप्रीम कोर्ट में सुना जाएगा, जहां उम्मीद है कि केंद्र सरकार अपनी तैयार की जा रही रूपरेखा के साथ कोर्ट के सामने पेश होगी। तब तक लाखों छात्रों और अभिभावकों की निगाहें इस फैसले पर टिकी रहेंगी कि आखिर यह नीति किस रूप में और किस समय-सीमा में उन पर लागू होती है।


