कभी मिलते थे सिर्फ 60 रुपये रोज, आज पूरे देश में नाम, सुमन गोयल ने कैसे किया ये कमाल
जिस सरकारी स्कूल से पढ़ाई कर 12वीं टॉप की, वहीं 60 रुपये रोजाना पर पढ़ाना शुरू किया। आज वही सुमन गोयल नेशनल टीचर्स अवॉर्ड 2026 के लिए चुनी गई हैं।

साल 2004 की बात है। दिल्ली के एक सरकारी स्कूल के क्लासरूम में 19-20 साल की एक लड़की ने कदम रखा। फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार वह बेंच पर बैठने नहीं, बल्कि ब्लैकबोर्ड के सामने खड़ी होकर बच्चों को पढ़ाने आई थी। जेब खाली थी और कॉलेज की फीस भरनी थी। इसी मजबूरी में उसने महज 60 रुपये रोज की दिहाड़ी पर पढ़ाना शुरू किया। महीने का बमुश्किल 1200 से 1300 रुपये हाथ आता था।
आज उसी लड़की की लगन और जज्बे को पूरे देश में पहचान मिली है। हम बात कर रहे हैं 41 साल की सुमन गोयल की, जिन्हें नेशनल टीचर्स अवॉर्ड 2026 के लिए चुना गया है। रोहिणी के पूठ कलां स्थित राजकीय सर्वोदय कन्या विद्यालय में प्राइमरी टीचर के तौर पर तैनात सुमन की यह कहानी सिर्फ एक पुरस्कार तक सीमित नहीं है। यह कहानी उस हिम्मत की है, जो अभावों के बीच रास्ता बनाती है और सैकड़ों बच्चों की जिंदगी रोशन कर देती है।
जिस स्कूल में पढ़ीं वहीं से बदली किस्मत
सुमन का शुरुआती जीवन आसान नहीं था। मूल रूप से हरियाणा में 10वीं तक पढ़ीं सुमन का सपना डॉक्टर बनने का था। लेकिन परिवार के सामने अचानक आर्थिक संकट गहरा गया और उन्हें दिल्ली आना पड़ा। तंगी के कारण डॉक्टर बनने की ख्वाहिश पीछे छूट गई। सुमन ने पूठ कलां के इसी सर्वोदय कन्या विद्यालय में दाखिला लिया और 2002 में 12वीं की परीक्षा में पूरे स्कूल में टॉप किया।
इसके बाद उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के लक्ष्मीबाई कॉलेज में बीए में एडमिशन तो ले लिया, लेकिन आगे की पढ़ाई का खर्च उठाना मुश्किल हो रहा था। इसी दौरान उन्होंने अपने ही पुराने स्कूल में अस्थायी तौर पर पढ़ाना शुरू कर दिया। 60 रुपये रोजाना से शुरू हुआ यह सफर 2009 में तब एक नए मुकाम पर पहुंचा, जब उनका चयन पक्के सरकारी शिक्षक के रूप में हो गया। साल 2013 से वे अपने उसी पुराने स्कूल में बतौर प्राइमरी टीचर बच्चों का भविष्य संवार रही हैं।
सुमन अपने पढ़ाने के अंदाज को 'मदर टीचर' का नाम देती हैं। उनका मानना है कि छोटे बच्चों के लिए एक शिक्षक को सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। एक मां की तरह उनकी बुनियादी जरूरतों और मानसिक सेहत का ख्याल रखना भी शिक्षक की ही जिम्मेदारी है।
उनके स्कूल में आने वाले ज्यादातर बच्चे दिहाड़ी मजदूरों, दर्जियों और छोटे-मोटे काम करने वाले परिवारों से हैं। ये अपने परिवार में पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी हैं। सुमन बताती हैं कि ऐसे माहौल से आने वाले बच्चों के लिए सिर्फ पढ़ाई-लिखाई की बात करना काफी नहीं होता। यही वजह है कि वे अपनी अलमारी में एक्स्ट्रा स्वेटर, पेंसिल, कॉपियां और स्टेशनरी का सामान हमेशा तैयार रखती हैं। कोई बच्चा भूखा न रहे या उसकी तबीयत न बिगड़े, इसके लिए वे पीएम पोषण योजना, आईसीएमआर के टूथ-ब्रशिंग अभियान और आयरन की गोलियों के वितरण पर खुद नजर रखती हैं।
समावेशी कक्षा और 'निपुण गणित किट' से बनाई पहचान
सुमन के काम की सबसे खास बात रही है दिव्यांग और विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को मुख्यधारा की कक्षा में जोड़ना। जो बच्चे गंभीर बीमारियों या बौद्धिक अक्षमताओं के कारण अक्सर अकेले पड़ जाते हैं, उन्हें सुमन ने बाकी सहपाठियों के साथ घुलने-मिलने का माहौल दिया। उन्होंने क्लास में ऐसे ग्रुप बनाए जिससे ये बच्चे कभी खुद को अलग-थलग न समझें।
पढ़ाई को आसान बनाने के लिए उन्होंने खुद 'निपुण मैथ्स किट' तैयार की। बुनियादी गणित और संख्याओं की समझ विकसित करने वाली इस किट की तारीफ राज्य स्तर पर 'निपुण संकल्प' के तहत भी हुई। इसका नतीजा यह हुआ कि उनकी चौथी क्लास के सभी बच्चों ने बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मकता के तय लक्ष्यों को हासिल कर लिया।
सुमन ने बच्चों की रचनात्मकता को भी नए पंख दिए। उनके मार्गदर्शन में बच्चे राज्यस्तरीय नाटक प्रतियोगिताओं तक पहुंचे। इतना ही नहीं, करीब एक दर्जन बच्चों की लिखी कहानियों और विचारों को बाकायदा एक चिल्ड्रन्स पब्लिशिंग प्लेटफॉर्म पर किताबों के रूप में छपवाया भी गया।
राज्य शिक्षक पुरस्कार के बाद अब राष्ट्रीय पुरस्कार तक पहुंचना सुमन के लिए एक चक्र पूरा होने जैसा है। जिस स्कूल की चौखट पर वे कभी एक जरूरतमंद छात्रा के रूप में खड़ी थीं, आज उसी स्कूल का नाम उन्होंने देश के नक्शे पर चमका दिया है। सुमन गोयल का यह सफर साबित करता है कि जब इरादे मजबूत हों, तो परिस्थितियां कभी रुकावट नहीं बन सकतीं।


