DA Image
हिंदी न्यूज़   ›   करियर  ›  हिन्दुस्तान विशेष: विरोधाभासी नियमों से अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों का टोटा

करियरहिन्दुस्तान विशेष: विरोधाभासी नियमों से अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों का टोटा

स्कन्द विवेक धर,नई दिल्लीPublished By: Anuradha
Tue, 11 Feb 2020 02:35 PM
हिन्दुस्तान विशेष: विरोधाभासी नियमों से अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों का टोटा

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ऋषिकेश अपने कुछ सुपर स्पेशियलटी विभाग में फैकल्टी की नियुक्ति के लिए 9 से 10 बार तक विज्ञापन निकाल चुका है, लेकिन उसे उम्मीदवार नहीं मिल रहे हैं। दूसरे एम्स और अन्य सरकारी सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों को भी ऐसी ही समस्या से दो चार होना पड़ रहा है। इस समस्या का कारण सरकार की दो नीतियों को आपस में विरोधाभासी होना है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी इस समस्या से बखूबी वाकिफ भी हैं, लेकिन राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा होने कारण कोई इसमें हाथ नहीं डालना चाहता। 

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत मेडिकल की सुपर स्पेशलिटी कोर्स डीएम और एमसीएच में कोई भी आरक्षण नहीं होता। इतना ही नहीं, डीएम और एमसीएच में पीजी सीटों की तुलना में सीटें भी मात्र 5 फीसदी ही होती हैं। ऐसे में कम सीट और आरक्षण न होने की वजह से आरक्षित वर्ग के बहुत कम छात्र-छात्राएं ही डीएम और एमसीएच जैसे कोर्स में दाखिला ले पाते हैं। वहीं, जब बात सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में नियुक्ति की आती है तो सुपर स्पेशलिटी विभागों में भी 50 फीसदी सीटें एससी, एसटी और ओबीसी उम्मीदवारों के लिए आरक्षित होती हैं। ऐसे में सरकारी अस्पतालों को आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार मिल ही नहीं पाते और सुपर स्पेशलिटी विभागों में पद खाली पड़े रहते हैं। 

एम्स ऋषिकेश के निदेशक डॉ. रविकांत ने हिन्दुस्तान से बातचीत में कहा कि हमारे यहां फैकल्टी के कुल 300 स्वीकृत पद हैं। इसमें से सौ पद सुपर स्पेशलिटी विभागों में हैं। इसमें से 50 पद आरक्षित हैं। उन्होंने कहा कि हम आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन सरकार को कोई ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि अगर मेडिकल कॉलेज में कोई आरक्षित पद नहीं भर रहा हो तो उसे जिस भी वर्ग का उम्मीदवार उपलब्ध हो उससे भर दिया जाए। जिससे अस्पताल चल सकें और शिक्षण कार्य प्रभावित न हो। 
वहीं, स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर स्वीकार किया कि ये विरोधाभासी नियम सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों के लिए बड़ी समस्या बन गए हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि राजनीतिक रूप से संवेदनशील मसला होने की वजह से हम इसमें निर्णय नहीं ले सकते। इसमें जो भी करना होगा वह सुप्रीम कोर्ट ही करेगा। 
स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी भले ही ये मामला सुप्रीम कोर्ट के हवाले कर रहे हों, लेकिन जानकारों को कहना है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही सुपर स्पेशलिटी विभागों में फैकल्टी की नियुक्तियों में आरक्षण लागू नहीं करने का आदेश दे चुका है। लेकिन सरकार इस आदेश को लागू नहीं कर रही है। दिल्ली एम्स के पूर्व निदेशक डॉ. एमसी मिश्रा ने हिन्दुस्तान से बातचीत में कहा कि वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अल्तमस कबीर ने आदेश दिया था कि सुपर स्पेशलिटी विभागों में फैकल्टी की नियुक्तियों में आरक्षण लागू नहीं हो सकता। यह आदेश कभी बदला नहीं गया और ये अब भी कायम है। लेकिन सरकार इसे लागू नहीं कर रही है। 
सुप्रीम कोर्ट ने अपने जजमेंट में कहा था कि एमबीबीएस और पीजी में आरक्षण दिया जा चुका है। ऐसे में सुपर स्पेशलिटी में फिर आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता। डॉ. एमसी मिश्रा ने कहा कि यदि सरकार सभी अस्पतालों में इसे लागू नहीं कर सकती तो कम से कम एम्स जैसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में इसे लागू करना चाहिए, ताकि इनकी गुणवत्ता पर असर न पड़े। 

पब्लिक हेल्थ विशेषज्ञ और पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष प्रो. के श्रीनाथ रेड्डी ने भी विरोधाभासी नियमों को बदलने की सिफारिश करते हुए कहा कि मैं आरक्षण के कतई खिलाफ नहीं हूं। लेकिन सरकार को ऐसे विरोधभासी नीतिगत फैसलों को बदलना चाहिए। अव्वल तो डीएम और एमसीएच में भी आरक्षण लागू करना चाहिए। अगर ऐसा नहीं कर सकते तो सुपर स्पेशियलिटी विभागों में खाली पड़े आरक्षित पदों को भरने का कोई अन्य उपाय जल्द से जल्द खोज लेना चाहिए। 

ये होते हैं सुपर स्पेशियलिटी विभाग
सुपर स्पेशियलिटी में कॉर्डियोलॉजी, सीटीवीएस, न्यूरोसर्जरी, यूरोलॉजी, नैफ्रोलॉजी, मेडिकल आंकोलॉजी और सर्जिकल आंकोलॉजी समेत करीब 18 विभाग शामिल होते हैं।

संबंधित खबरें