Bihar studants are far better in maths in national average but need to pay attention in primary level - बिहार के लाल गणित में राष्ट्रीय औसत से आगे, लेकिन यहां ध्यान देने की जरूरत DA Image

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बिहार के लाल गणित में राष्ट्रीय औसत से आगे, लेकिन यहां ध्यान देने की जरूरत

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बिहार के बच्चे गणित की समझ रखने और जोड़ से लेकर भाग तक के सवाल हल करने के मामले में राष्ट्रीय औसत से आगे हैं। प्रारंभिक शिक्षा में काम करने वाली प्रतिष्ठित संस्था ‘प्रथम' द्वारा एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर-2018) में यह खुलासा हुआ है।

मंगलवार को जारी असर की रिपोर्ट के मुताबिक कक्षा में बिहार में आठवीं के 56.9 फीसदी बच्चे भाग के सवाल बना लेते हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 43.9 प्रतिशत है। कक्षा तीन में 28.5 फीसदी बच्चे घटाव बना लेते हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 28.1 प्रतिशत है। हालांकि कक्षा 5 के स्तर पर घटाव बनाने के मामले में राष्ट्रीय औसत 52.3 फीसदी से बिहार पीछे है और यहां औसत 47 फीसदी है। 

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प्राथमिक स्तर पर बिहार को और ध्यान देने की जरूरत 
रिपोर्ट बताती है कि गणित के मामले में हमेशा से आगे रहने वाले बिहार को इस विषय में प्राथमिक स्तर पर और ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि रिपोर्ट का एक बड़ा पहलू यह भी है कि कक्षा एक के 42.7 फीसदी बच्चे1 से 9 तक का अंक नहीं पहचानते। कक्षा 2 में 22.7, कक्षा तीन में 12.1, कक्षा चार में 7.8, कक्षा 5 में 6.6 और कक्षा आठ में भी 1.3 फीसदी ऐसे बच्चे हैं, जो इन अंकों को नहीं पहचानते। कक्षा आठ में करीब 80 फीसदी ऐसे विद्यार्थी हैं, जो 10 से 99 तक की संख्या नहीं पहचानते और 43 फीसदी भाग करना नहीं जानते। उसी प्रकार 53.9 फीसदी कक्षा एक के बच्चे अक्षर नहीं पहचाते और 92 फीसदी शब्द। आठ में भी अक्षर नहीं पहचानने वाले 2.9 फीसदी हैं, जबकि 7.2 फीसदी शब्द नहीं पढ़ पाते हैं। 

असर की रपोर्ट: पांचवीं के 34 फीसदी बच्चे ही पढ़ पाते हैं दूसरी का पाठ

कक्षा दो के पाठ नहीं पढ़ पाते 8वीं के 28.8 फीसदी बच्चे 
असर के बुनियादी कौशल की रिपोर्ट बताती है कि बिहार में कक्षा तीन के बच्चे जो कक्षा दो का पाठ पढ़ सकते हैं वह 23.5 फीसदी हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 27.2 है। कक्षा दो का पाठ नहीं पढ़ पाने वालों का प्रतिशत 76.5 है। वहीं कक्षा 5 के 58.7 फीसदी बच्चे कक्षा 2 स्तर का पाठ नहीं पढ़ सकते हैं। कक्षा आठ के 28.8 फीसदी बच्चे कक्षा 2 स्तर का पाठ नहीं पढ़ सकते हैं। बिहार में आठवीं के 71.2 फीसदी बच्चे ही कक्षा 2 स्तर का पाठ पढ़ पाते हैं। इसमें राष्ट्रीय औसत भी 72.8 है। असर की रिपोर्ट भी इस बात पर मुहर लगाती है कि बिहार के प्रारंभिक स्कूलों में छात्राओं की संख्या छात्रों के मुकाबले अधिक हो गयी है। रिपोर्ट कहती है कि सरकारी विद्यालयों में 11 से 14 आयु वर्ग में लड़कों का नामांकन 76.3 फीसदी है, जबकि लड़कियां आठ फीसदी अधिक 84.3 फीसदी अधिक नामांकित हैं। 14 से 16 के आयुवर्ग में कम से कम कक्षा 2 स्तर के पाठ को पढ़ पाने में सक्षम बच्चों में बिहार में लड़कियों का प्रतिशत 72 है, जबकि लड़कों का 79.2 फीसदी है। प्रारंभिक गणित में भी लड़के बाजी मारते दिख रहे हैं। 14-16 आयुवर्ग में 65.9 प्रतिशत लड़के भाग के सवाल को हल कर सकते हैं, जबकि सिर्फ 54.3 प्रतिशत लड़की हल कर पाती हैं। .

राज्य के सभी 38 जिलों में हुआ था असर का सर्वेक्षण 
असर के राज्य समन्वयक संजय कुमार के मुताबिक असर-2018 के लिए बिहार के सभी 38 (ग्रामीण) जिलों के 1140 गांवों के 22 हजार 817 घरों में यह सर्वेक्षण हुआ। तीन से 16 वर्ष के 50 हजार 338 बच्चों तक सर्वेक्षण टीम पहुंची। इसके लिए बिहार के 1100 सरकारी विद्यालयों का भी भ्रमण किया। सितम्बर से नवम्बर 2018 के बीच 34 जिलों के डायट के प्रशिक्षार्थियों ने, तीन जिलों में एनजीओ के कर्मी, जबकि सुपौल में निजी बीएड कॉलेज के छात्रों ने यह सर्वे किया। 

बिहार में निजी स्कूलों को ज्यादा प्राथिमकता दे रहे पेरेंट्स
रिपोर्ट दर्शाती है कि बिहार में सरकारी स्कूल की तुलना में निजी स्कूल अभिभावकों को अधिक भा रहे हैं। निजी विद्यालयों में वर्ष 2010 में 7 से 16 आयुवर्ग में नामांकन 4.9 फीसदी था, 2018 में यह 15.6 फीसदी हो गया है। यह तीन गुना से भी अधिक है। हालांकि रिपोर्ट यह भी बताती है कि निजी स्कूलों में भी कक्षा 5 में पढ़ने वाले करीब 18 फीसदी बच्चे घटाव नहीं बना सकते।

असर की रिपोर्ट कहती है कि पिछले आठ साल में बिहार में बच्चों की उपस्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। वर्ष 2010 में कक्षा एक से पांच में बच्चों की औसत उपस्थिति 56.1 थी, जबकि 2018 में उपस्थिति 56.5 फीसदी ही है। बिहार के 24.4 प्रतिशत स्कूलों में ही शौचालय का प्रयोग होता है। सिर्फ 52.2 स्कूलों में अंदर खेल के मैदान और 54.5 फीसदी स्कूलों में खेल के सामान हैं। 

- स्कूलों में 11 से 14 आयुवर्ग में लड़कों से 8 फीसदी अधिक हुई लड़कियां
- पहली के 53.9 फीसदी बच्चे नहीं पढ़ पाते अक्षर, 42.7 फीसदी नहीं पहचानते अंक

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