9 साल तक स्कूल नहीं गए, फिर इंजीनियरिंग से दुनिया में कैसे बनाई पहचान; कितने पढ़े-लिखे हैं सोनम वांगचुक
सोनम वांगचुक फिलहाल 19 दिनों से अनशन पर हैं। वांगचुक की कौन-कौन सी काबीलियत है और उन्होंने अपने करियर में क्या-क्या किया जिससे उनकी हर जगह पूछ होती है, आइए जानते हैं।

'कॉकरोच जनता पार्टी' पिछले 25 दिनों से अधिक समय से नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रही है। इसी कड़ी के मद्देनजर सोनम वांगचुक 28 जून को इस आंदोलन में शामिल हुए थे और तब से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं। गुरुवार को सोमन के अनशन का 19वां दिन है। उनकी स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस दौरान उनका 9 किलो तक वजन कम हो गया है। फिलहाल सोनम वांगचुक को लेकर देश की सियासत गर्माई हुई है, मगर सोनम की काबीलियत और उन्होंने अपने करियर में क्या क्या जिससे उनकी हर जगह पूछ होती है यह भी जानना लाजमी है। आइए, एक नजर डालते हैं सोनम वांगचुक के अब तक के करियर पर...
इस बात से ज्यादातर लोग वाकिफ होंगे कि सोनम वांगचुक से प्रेरित होकर मशहूर बॉलीवुड फिल्म 'थ्री इडियट्स' का वो शानदार और अतरंगी किरदार 'फुंसुख वांगड़ू' गढ़ा गया था। एक इंजीनियर, शिक्षा सुधारक और लद्दाख के सबसे बड़े इनोवेटर के तौर पर पहचाने जाने वाले वांगचुक का सफर कभी भी आसान नहीं रहा। भौगोलिक दुश्वारियों और भाषाई बंदिशों को तोड़कर उन्होंने जो मुकाम हासिल किया है, वह हर किसी के लिए एक बड़ी मिसाल है। वांगचुक का मानना है कि असल तालीम वही है, जो किताबों से निकलकर हमारी रोजमर्रा की जिंदगी और समाज की मुश्किलों को आसान बनाए।
शुरुआत के 9 साल नहीं गए स्कूल
जरा सोचिए, एक बच्चा जिसकी उम्र नौ साल हो चुकी है और उसने कभी किसी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा। आज के दौर में यह बात अजीब लग सकती है लेकिन साल 1966 में लद्दाख के एक बेहद छोटे और दूर-दराज गांव अल्ची में जन्मे सोनम वांगचुक के साथ ऐसा ही हुआ था। उनके इलाके में कोई स्कूल था ही नहीं। लेकिन कहते हैं न कि अगर हौसला हो तो रास्ते खुद-ब-खुद बन जाते हैं। उनकी पहली गुरु बनीं उनकी अपनी मां। उन्होंने घर पर ही अपनी मातृभाषा में सोनम को पढ़ना-लिखना सिखाया। इस शुरुआती घरेलू तालीम ने उनके अंदर सीखने की एक ऐसी मजबूत बुनियाद तैयार की, जो आगे चलकर बहुत काम आई।
कुछ वक्त बाद जब उनके पिता जम्मू-कश्मीर में पब्लिक लाइफ का हिस्सा बने, तो वांगचुक की जिंदगी में एक बड़ा बदलाव आया। उनका दाखिला दिल्ली के विशेष केंद्रीय विद्यालय में करवा दिया गया। एक शांत हिमालयी गांव से निकलकर दिल्ली की भागदौड़ भरी जिंदगी में आना एक बड़ा सांस्कृतिक बदलाव था। इस नए माहौल ने वांगचुक के सोचने-समझने के दायरे को काफी बड़ा कर दिया और उन्हें बाहरी दुनिया की अकादमिक अहमियत समझ में आने लगी।
श्रीनगर से फ्रांस तक का किया सफर
दिल्ली में अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद सोनम ने इंजीनियरिंग की राह पकड़ी। साल 1987 में उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (उस वक्त यह रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज हुआ करता था), श्रीनगर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बी.टेक की डिग्री हासिल की। लेकिन वांगचुक सिर्फ एक आम इंजीनियर बनकर नहीं रहना चाहते थे। उनका दिल तो अपने पहाड़ों में बसता था।
हिमालय के बेहद नाजुक ईकोसिस्टम को समझने और वहां के मौसम के हिसाब से बुनियादी ढांचा तैयार करने की धुन उन्हें फ्रांस ले गई। वहां उन्होंने ग्रेनोबल के क्रेटर स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर से अर्थन आर्किटेक्चर (मिट्टी की वास्तुकला) की बारीकियां सीखीं। यह पढ़ाई सस्टेनेबल डिजाइन यानी टिकाऊ विकास की तरफ उनका एक बहुत बड़ा और अहम कदम था।
कैसे की शिक्षा में क्रांति की शुरुआत
साल 1988 में सोनम वांगचुक ने कुछ और लोगों के साथ मिलकर लद्दाख में एक बड़े बदलाव की नींव रखी। उन्होंने स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL) की शुरुआत की। इस संस्था का सबसे बड़ा मकसद लद्दाख के बच्चों के लिए शिक्षा को किताबी रटने की बजाय व्यावहारिक बनाना था। सेकमोल के तहत 'ऑपरेशन न्यू होप' जैसी शानदार पहल शुरू की गई। वांगचुक ने स्थानीय लोगों और सरकारी महकमों के साथ मिलकर सरकारी स्कूलों की हालत सुधारी। कोशिश यह थी कि बच्चों को वही पढ़ाया जाए, जो उनके इलाके और उनके हालात के हिसाब से उनके काम आए।
आइस स्तूप से किया कमाल
वांगचुक की इंजीनियरिंग और आर्किटेक्चर की पढ़ाई का असली जादू तब दिखा, जब उन्होंने लद्दाख में पानी की किल्लत दूर करने का एक नायाब तरीका खोज निकाला। उनके सबसे बड़े चमत्कारों में 'आइस स्तूप' का नाम सबसे ऊपर आता है। यह एक कृत्रिम ग्लेशियर तकनीक है। सर्दियों में जब पानी यूं ही बहकर बर्बाद हो जाता है, तब यह तकनीक उस पानी को बर्फ के बड़े-बड़े स्तूपों के रूप में जमा कर लेती है। वसंत के मौसम में जब किसानों को अपनी खेती के लिए पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब यह बर्फ धीरे-धीरे पिघलकर उन्हें पानी मुहैया कराती है। इस एक खोज ने लद्दाख के किसानों की जिंदगी को काफी हद तक आसान कर दिया।
सोनम वांगचुक का सफर यहीं नहीं रुका। उन्होंने 'हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स, लद्दाख' (HIAL) की सह-स्थापना की। यह संस्थान इस सोच पर काम करता है कि शिक्षा सिर्फ चार दीवारों के बीच नहीं, बल्कि प्रयोगों और अनुभवों के जरिए दी जानी चाहिए। इसके अलावा, उन्होंने 'फार्मस्टेज लद्दाख' की भी शुरुआत की। इसका मकसद स्थानीय लोगों को सस्टेनेबल टूरिज्म से जोड़कर उनके लिए रोजगार के नए रास्ते खोलना है, ताकि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना लोग अपनी रोजी-रोटी कमा सकें। आज सोनम वांगचुक का नाम सिर्फ एक शख्सियत तक सीमित नहीं है, बल्कि वह खुद में एक पूरी संस्था बन चुके हैं।


