स्कूल में मलाला यूसुफजई की किताब को लेकर बवाल, शिक्षा विभाग ने क्यों ठोका जुर्माना
अहमदाबाद के आनंद निकेतन स्कूल पर मलाला की किताब विवाद को लेकर शिक्षा विभाग की कार्रवाई के बाद जुर्माना लगाया गया है।

गुजरात के अहमदाबाद शहर से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने स्कूली शिक्षा और धार्मिक भावनाओं के बीच की महीन लकीर को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। शिलज इलाके में स्थित आनंद निकेतन स्कूल इन दिनों नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई की किताब 'आई एम मलाला' को लेकर मुसीबत में घिर गया है। स्कूल की लाइब्रेरी में यह किताब मौजूद होने पर कुछ अभिभावकों और विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) जैसे संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई, जिसके बाद अहमदाबाद सिटी डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन डिपार्टमेंट ने स्कूल के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू कर दी।
विरोध की जड़ में क्या था मामला
टाइम्स नाउ की रिपोर्ट की मानें तो प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि बच्चों को ऐसी किताब पढ़ने के लिए मजबूर किया जा रहा था जिसे वे धार्मिक नजरिए से आपत्तिजनक मानते हैं। यह विवाद तब और तूल पकड़ गया जब स्कूल में मिड-डे मील में कांच का टुकड़ा मिलने की शिकायत भी सामने आई, जिसके बाद गुस्साए अभिभावकों ने स्कूल के बाहर प्रदर्शन किया। इसी दौरान मलाला यूसुफजई और ऐनी फ्रैंक की किताबों को लेकर भी सवाल उठाए गए और कुछ लोगों ने इसे धार्मिक भेदभाव तक करार दे दिया। मामले की गंभीरता को देखते हुए अहमदाबाद के शिक्षा अधिकारी रोहित चौधरी ने स्कूल को शो-कॉज नोटिस थमा दिया और पूरे मसले की जांच का आदेश दे दिया।
किताब सिलेबस का हिस्सा नहीं: स्कूल
शिक्षा विभाग को दिए अपने लिखित जवाब में स्कूल प्रबंधन ने साफ किया कि 'आई एम मलाला' कभी भी अनिवार्य पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं रही। स्कूल के मुताबिक, यह किताब सिर्फ एक ऐच्छिक बुक क्लब और लाइब्रेरी प्रोग्राम के तहत उपलब्ध कराई गई थी, जिसे मलाला और ऐनी फ्रैंक जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त लेखकों के साहित्य के तौर पर बच्चों में सहानुभूति, चिंतन और वैश्विक जागरूकता बढ़ाने के मकसद से रखा गया था। स्कूल ने यह भी कहा कि उसका इरादा किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कतई नहीं था, और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसका पूरा भरोसा दिलाया गया। साथ ही स्कूल ने वादा किया कि आगे से लाइब्रेरी में भारतीय और अंतरराष्ट्रीय, दोनों तरह की शख्सियतों पर किताबें रखी जाएंगी ताकि बच्चों का सर्वांगीण विकास हो सके।
विवाद बढ़ने के बाद स्कूल ने बड़ा कदम उठाते हुए मुनज्जा शम्स को अपने संस्थान से अलग कर दिया। स्कूल प्रबंधन ने उन्हें एजुकेशन कंसल्टेंट, करिकुलम डिजाइनर और पूर्व छात्रा के तौर पर पहचान दी थी। हालांकि स्कूल ने यह भी स्पष्ट किया कि शम्स न तो कोई डायरेक्टर थीं और न ही स्थायी प्रशासनिक पद पर तैनात थीं, उन्हें केवल पार्ट-टाइम बाहरी सलाहकार के तौर पर रखा गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, विवाद के बाद स्कूल ने शम्स समेत कुल चार लोगों को अपने से अलग किया है, और किताब को लाइब्रेरी की अलमारी से भी हटा लिया गया है।
अब रोज होगी प्रार्थना
अभिभावकों की एक और बड़ी शिकायत यह थी कि स्कूल में सुबह की प्रार्थना बंद कर दी गई थी। इस पर शिक्षा अधिकारी रोहित चौधरी ने बताया कि स्कूल ने अब विभाग को साप्ताहिक शेड्यूल सौंप दिया है और यह भरोसा दिलाया है कि रोजाना प्रार्थना कराई जाएगी। स्कूल के बयान के अनुसार, नाश्ते और लंच के दौरान श्लोक पाठ पहले की तरह जारी था, वहीं सेकेंडरी सेक्शन में मॉर्निंग असेंबली छात्र परिषद द्वारा संचालित की जा रही थी। इसके अलावा स्कूल ने योग और शारीरिक व्यायाम से जुड़े मॉर्निंग फिटनेस प्रोग्राम को भी और मज़बूत करने की बात कही।
RTE नियमों के तहत जुर्माना
शिक्षा विभाग ने इस पूरे मामले को RTE नियम, 2012 के तहत पहला उल्लंघन मानते हुए स्कूल पर 10,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है। DEO रोहित चौधरी ने स्कूल प्रशासन को सख्त हिदायत दी है कि छात्रों की शिक्षा और अभिभावकों की भावनाओं से जुड़े मामलों को बेहद संवेदनशीलता और सावधानी से संभाला जाए, ताकि भविष्य में ऐसा कोई विवाद दोबारा खड़ा न हो। फिलहाल स्कूल प्रबंधन ने विभाग की सभी शर्तों को मानते हुए सुधार का भरोसा दिलाया है, लेकिन यह मामला शिक्षा और धार्मिक संवेदनशीलता के बीच जारी बहस को एक बार फिर हवा दे गया है।


