'हमें TET से दो निजात', शिक्षकों की हुंकार, OPS और प्रमोशन की मांग को लेकर सचिवालय पर बोला धावा
देहरादून में पुरानी पेंशन, प्रमोशन में आरक्षण और टीईटी से छूट जैसी 19 मांगों को लेकर एससीएसटी शिक्षक एसोसिएशन ने सचिवालय कूच किया, जिसके बाद उनकी मुख्य सचिव से वार्ता हुई।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के दिल कहे जाने वाले इलाकों शिक्षकों का विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। इस दौरान पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) की बहाली, प्रमोशन में आरक्षण और टीईटी (TET) से छूट जैसी 19 बड़ी और अहम मांगों को लेकर एससीएसटी (SC/ST) शिक्षक एसोसिएशन ने एक बड़ा और असरदार विरोध प्रदर्शन किया। अपनी आवाज सीधे सत्ता के गलियारों तक पहुंचाने के लिए इन शिक्षकों ने हुंकार भरते हुए सचिवालय की तरफ कूच कर दिया, जिससे प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए और शहर में अच्छी-खासी हलचल मच गई।
सचिवालय की तरफ शिक्षकों का भारी हुजूम
ये पूरा वाकया उस वक्त शुरू हुआ जब प्रदेश अध्यक्ष जगदीश राठी और महामंत्री सुरेंद्र चंद्र की अगुवाई में सूबे के अलग-अलग हिस्सों से आए शिक्षक सुबह-सुबह ही परेड मैदान के पास जुटने लगे थे। शिक्षकों के चेहरों पर अपनी पुरानी मांगों के लगातार अनदेखे किए जाने की साफ नाराजगी और गुस्सा छलक रहा था। दोपहर करीब एक बजते-बजते इस भीड़ ने एक बड़े, अनुशासित लेकिन उग्र जुलूस की शक्ल ले ली। ये लोग अपने हाथों में बैनर लिए दर्शनलाल चौक, घंटाघर, एश्लेहॉल और ग्लोब चौक जैसे शहर के सबसे अहम और व्यस्त रास्तों से गुजरते हुए सचिवालय के करीब जा पहुंचे।
जाहिर सी बात है, प्रशासन भी शिक्षकों के इस बड़े कूच को लेकर पहले से ही पूरी तरह मुस्तैद था। पुलिस ने सचिवालय से कुछ ही दूरी पर भारी बैरिकेडिंग लगाकर पूरा रास्ता ब्लॉक कर दिया था ताकि भीड़ आगे न जा सके। जब शिक्षकों को आगे बढ़ने से सख्ती से रोका गया, तो उन्होंने भी हार नहीं मानी और कदम पीछे खींचने के बजाय वहीं सड़क पर ही अपना धरना शुरू कर दिया। बीच सड़क पर बैठते ही सरकार के खिलाफ नारेबाजी का सिलसिला काफी तेज हो गया।
हालात को काबू में करने और शिक्षकों के इस हुजूम को शांत करने के लिए मौके पर मौजूद सीओ-सिटी और सिटी मजिस्ट्रेट ने काफी मशक्कत की। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को मनाने और वापस लौटने की हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन शिक्षक इस बात पर पूरी तरह से अड़े रहे कि जब तक उनकी मुख्यमंत्री या मुख्य सचिव से आमने-सामने की सीधी मुलाकात नहीं होती, वे वहां से एक इंच भी हिलने वाले नहीं हैं।
मुख्य सचिव से वार्ता का बुलावा और आगे का रास्ता
सड़क पर शिक्षकों के इस कड़े रुख और बढ़ते हंगामे की भनक जैसे ही शासन के आला अधिकारियों को लगी, तो मामला फौरन मुख्य सचिव तक पहुंचा दिया गया। हालात की नजाकत को समझते हुए मुख्य सचिव ने ज्यादा वक्त न गंवाते हुए शिक्षकों के एक प्रतिनिधिमंडल को तुरंत बातचीत के लिए अपने पास बुला लिया।
मीटिंग खत्म होने के बाद बाहर आए प्रदेश अध्यक्ष जगदीश राठी ने धरने पर बैठे बाकी शिक्षकों को संबोधित करते हुए बताया कि मुख्य सचिव के साथ उनकी बातचीत काफी सकारात्मक और उम्मीद भरी रही है। उन्होंने जानकारी दी कि मुख्य सचिव ने एसोसिएशन को ये पूरा भरोसा दिलाया है कि उनकी तमाम 19 मांगों को लेकर सभी संबंधित विभागों से बारीकी से पूरा ब्योरा तलब किया जाएगा और इस पर जल्द से जल्द मुनासिब कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा, आंदोलनकारी शिक्षकों के लिए एक और बड़ी राहत की खबर ये निकलकर आई कि खुद मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारियों ने भी इस पूरे मसले का संज्ञान ले लिया है। ये तय किया गया है कि आने वाली 26 जून को एसोसिएशन के नेताओं की मुख्यमंत्री के साथ सीधे तौर पर बातचीत कराई जाएगी। शिक्षकों को इस मीटिंग से काफी आस है कि उनके हक में कोई ठोस और बड़ा फैसला जरूर लिया जाएगा।
आखिर क्या हैं इन शिक्षकों की मुख्य मांगें?
अगर तफसील से बात की जाए कि आखिर वो कौन से जरूरी मुद्दे हैं जिन्होंने शिक्षकों को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया, तो इसमें कुल 19 सूत्रीय मांगें शामिल हैं। इनमें से जो सबसे अहम मुद्दे हैं, जिन पर सबसे ज्यादा जोर दिया जा रहा है, वो इस तरह हैं -
पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) की बहाली: ये आज के दौर में हर सरकारी कर्मचारी की सबसे बड़ी और बुनियादी मांग बन चुकी है। शिक्षक चाहते हैं कि रिटायरमेंट के बाद उनका बुढ़ापा पूरी तरह से सुरक्षित हो।
पदोन्नति (प्रमोशन) में आरक्षण और टीईटी से छूट: ये दोनों ही मुद्दे शिक्षकों के करियर की तरक्की और उनके हक से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं, जिनकी लंबे वक्त से मांग हो रही है।
इरशाद हुसैन आयोग की रिपोर्ट: शिक्षक पिछले काफी लंबे वक्त से सरकार से इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की पुरजोर वकालत कर रहे हैं।
पारदर्शी तबादला नीति: उनका मानना है कि ट्रांसफर पॉलिसी में पूरी तरह से पारदर्शिता होनी चाहिए और इसका कड़ाई से पालन होना चाहिए ताकि किसी भी शिक्षक के साथ कोई नाइंसाफी न हो।
इसके अलावा, बच्चों की छात्रवृत्ति में इजाफा करने, बैकलॉग के खाली पड़े पदों पर जल्द से जल्द नई भर्ती निकालने और गोल्डन कार्ड के जरिए एक असरदार व बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने की मांग भी इस लंबी फेहरिस्त में प्रमुखता से शामिल है।
समायोजित शिक्षकों का भी फूटा गुस्सा
राजधानी में एक तरफ जहां एससीएसटी शिक्षक एसोसिएशन अपनी मांगों को लेकर सचिवालय के बाहर डटा हुआ था, वहीं दूसरी तरफ शिक्षा विभाग के ही एलटी (LT) समायोजित शिक्षकों के सब्र का पैमाना भी अब पूरी तरह से छलक पड़ा है। अपनी पुरानी मांगों को लेकर इन शिक्षकों ने सरकार के खिलाफ क्रमिक अनशन का मुश्किल रास्ता अख्तियार कर लिया है।
इन शिक्षकों की जो सबसे मुख्य मांग है, वो ये है कि बेसिक में दी गई उनकी पुरानी सेवाओं को भी उनके मौजूदा कार्यकाल में जोड़ा जाए और उसी के आधार पर उन्हें चयन प्रोन्नत वेतनमान (सलेक्शन ग्रेड पे) का फायदा दिया जाए। इस क्रमिक अनशन की शुरुआत मंगलवार के दिन से हो चुकी है, जिसमें कुमाऊं मंडल के पांच शिक्षक अपनी मांगों के समर्थन में धरने पर बैठ गए हैं।
राजकीय एलटी समायोजित पदोन्नत शिक्षक संघर्ष मंच के अध्यक्ष दिगंबर फुलैरिया ने इस दौरान बेहद सख्त लहजे में राज्य सरकार को खुली चेतावनी दे डाली है। उन्होंने बिल्कुल साफ कर दिया है कि अगर इस बार भी सरकार ने उनकी इन जायज मांगों को अनसुना या नजरअंदाज किया, तो उनका ये आंदोलन सिर्फ क्रमिक अनशन तक ही महदूद नहीं रहेगा। उन्होंने पूरे दमखम के साथ ऐलान किया है कि 25 जून से सभी शिक्षक आमरण अनशन पर चले जाएंगे, जिसके बाद पैदा होने वाले किसी भी हालात की पूरी जिम्मेदारी सीधे तौर पर शासन और प्रशासन की होगी। शिक्षकों के इस बड़े और कड़े कदम को देखते हुए राजकीय शिक्षक संघ और कार्मिक एकता मंच ने भी आगे आकर इस आंदोलन को अपना पूरा और बिना शर्त समर्थन देने का खुला ऐलान कर दिया है।


