IIT की तैयारी छोड़ी, कॉलेज ड्रॉपआउट लड़के ने बनाया ऐसा स्टार्टअप, आज है अरबों की कंपनी का मालिक
IIT की तैयारी कर रहे रितेश अग्रवाल ने पढ़ाई के दौरान एक ऐसी समस्या पहचानी, जिसने आगे चलकर OYO Rooms जैसी अरबों की कंपनी की नींव रख दी। आइए जानते हैं उनकी प्रेरणादायक सफलता की कहानी।

आज जब लोग ओयो (OYO) का नाम सुनते हैं, तो उनके दिमाग में कम बजट में आसान और भरोसेमंद होटल बुकिंग की तस्वीर उभरती है। लेकिन इस बड़े ब्रांड के पीछे एक छोटे शहर के उस लड़के की कहानी छिपी है, जिसने तय रास्तों पर चलने के बजाय अपने सपनों पर भरोसा किया। हम बात कर रहे हैं रितेश अग्रवाल की, जिन्होंने आईआईटी की तैयारी और कॉलेज की पढ़ाई बीच में छोड़कर ऐसा स्टार्टअप खड़ा किया, जो आज भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के सबसे चर्चित कारोबारों में गिना जाता है।
ओडिशा के छोटे शहर से शुरू हुई कहानी
रितेश अग्रवाल का जन्म 16 नवंबर 1993 को ओडिशा के बिसम कटक में हुआ था। उनका परिवार बहुत अमीर नहीं था। पिता छोटा सा इंफ्रास्ट्रक्चर बिजनेस चलाते थे और जिंदगी सामान्य तरीके से गुजर रही थी। लेकिन रितेश की सोच बचपन से अलग थी। उन्हें कंप्यूटर, बिजनेस और नए आइडियाज में दिलचस्पी थी। जहां ज्यादातर बच्चे सिर्फ पढ़ाई तक सीमित रहते हैं, वहीं रितेश कम उम्र में ही स्टार्टअप और बिजनेस की दुनिया को समझने लगे थे।
IIT की तैयारी के बीच बदल गया सपना
स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद रितेश भी लाखों छात्रों की तरह राजस्थान के कोटा पहुंचे। मकसद था IIT की तैयारी करना। लेकिन वहां पढ़ाई के साथ-साथ उनका ध्यान स्टार्टअप्स और बिजनेस इवेंट्स की तरफ ज्यादा जाने लगा। वो अलग-अलग फाउंडर्स से मिलते, बिजनेस मॉडल समझते और नई चीजें सीखते। धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि उनकी असली रुचि नौकरी में नहीं बल्कि खुद कुछ बड़ा बनाने में है। इसके बाद वो दिल्ली आए, लेकिन कॉलेज की पढ़ाई ज्यादा समय तक नहीं चली। उन्होंने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी और पूरा फोकस अपने स्टार्टअप पर लगा दिया।
जब ट्रैवल की परेशानी बनी बिजनेस आइडिया
रितेश अक्सर कम बजट में यात्रा करते थे। इस दौरान उन्होंने एक बड़ी समस्या नोटिस की। सस्ते होटल तो हर जगह मिल जाते थे, लेकिन उनकी क्वालिटी का कोई भरोसा नहीं होता था। कहीं कमरे गंदे होते थे, कहीं बाथरूम खराब, तो कहीं फोटो और असली होटल में जमीन-आसमान का फर्क होता था। यहीं से उनके दिमाग में एक सवाल आया कि अगर कम कीमत में भरोसेमंद और स्टैंडर्ड होटल मिलें तो? यही सवाल आगे चलकर OYO की नींव बना।
Oravel Stays से शुरू हुआ सफर
साल 2012 में, सिर्फ 18 साल की उम्र में रितेश ने Oravel Stays नाम का प्लेटफॉर्म शुरू किया। शुरुआत में यह सिर्फ बजट होटल्स की लिस्टिंग करता था। उन्हें शुरुआती फंडिंग भी मिली, लेकिन कुछ समय बाद रितेश को समझ आया कि असली समस्या होटल ढूंढना नहीं बल्कि भरोसा है। लोगों को ऐसा होटल चाहिए था जहां कम पैसे में कम से कम बेसिक सुविधाएं पक्की मिलें।
फिर जन्म हुआ OYO Rooms का
2013 में रितेश ने अपने बिजनेस मॉडल को पूरी तरह बदल दिया और Oravel Stays को OYO Rooms में बदल दिया। अब कंपनी सिर्फ होटल लिस्ट नहीं करती थी, बल्कि छोटे होटल मालिकों के साथ पार्टनरशिप करती थी। OYO उनके कमरों को स्टैंडर्ड बनाता, साफ-सफाई सुधारता, स्टाफ ट्रेनिंग देता और फिर अपने ब्रांड नाम से उन्हें चलाता। यही मॉडल लोगों को पसंद आने लगा क्योंकि पहली बार बजट होटल्स में भी भरोसा मिलने लगा था।
कॉलेज छोड़ा, लेकिन दुनिया ने पहचान दी
रितेश की सोच और मेहनत ने जल्द ही दुनिया का ध्यान खींचा। उन्हें प्रतिष्ठित थेल फेलोशिफ मिली, जिसके तहत 1 लाख डॉलर दिए गए ताकि वो कॉलेज छोड़कर अपने स्टार्टअप पर फोकस कर सकें। यह सम्मान पाने वाले वो पहले भारतीय बने थे। इसके बाद सिकोइया कैपिटल और सॉफ्टबैंक जैसी बड़ी कंपनियों ने OYO में निवेश किया और कंपनी तेजी से बढ़ने लगी।
कुछ सालों में बन गई बड़ी कंपनी
धीरे-धीरे OYO भारत से निकलकर दूसरे देशों तक पहुंच गई। लाखों लोग इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने लगे और हजारों होटल इसके साथ जुड़ गए। रितेश अग्रवाल का नाम देश के सबसे युवा सेल्फ मेड अरबपतियों में गिना जाने लगा। Forbes 30 Under 30 Asia की लिस्ट में भी उन्हें जगह मिली।
लेकिन सफलता का रास्ता हमेशा आसान नहीं था
कंपनी जितनी तेजी से बढ़ी, चुनौतियां भी उतनी बड़ी होती गईं। कई जगह होटल पार्टनर्स ने शिकायतें कीं, इंटरनेशनल मार्केट में दिक्कतें आईं और कोरोना महामारी ने पूरी होटल इंडस्ट्री को झटका दे दिया। OYO को कई बदलाव करने पड़े। लेकिन रितेश ने हार नहीं मानी और कंपनी को नए तरीके से संभालने की कोशिश जारी रखी।
Shark Tank India तक पहुंचा सफर
एक समय था जब रितेश खुद निवेशकों के सामने अपना आइडिया लेकर जाते थे। आज वही रितेश Shark Tank India में नए स्टार्टअप्स को जज और फंड करते नजर आते हैं। यह सफर सिर्फ पैसे कमाने की कहानी नहीं है। यह उस सोच की कहानी है जिसमें एक साधारण परेशानी के अंदर भी बड़ा मौका दिखाई देता है।
करियर के लिए क्या सीख मिलती है?
रितेश अग्रवाल की कहानी बताती है कि बड़ा आइडिया हमेशा बड़ी लैब या बड़े कॉलेज से नहीं आता। कई बार रोजमर्रा की छोटी परेशानियां ही सबसे बड़े बिजनेस की शुरुआत बन जाती हैं। अगर किसी समस्या को ध्यान से देखा जाए और उसे हल करने की हिम्मत हो, तो वही चीज जिंदगी बदल सकती है। एक छोटे शहर का लड़का, जिसने खराब होटल देखकर सवाल पूछा था, आज करोड़ों लोगों की ट्रैवल आदत बदल चुका है।
लेखक के बारे में
Himanshu Tiwariशॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।
परिचय एवं अनुभव
हिमांशु तिवारी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। बीते 10 सालों से वह लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस वक्त लाइव हिन्दुस्तान में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और बीते 3 साल से वह इस संस्थान से जुड़े हैं। शिक्षा, करियर, नौकरियों, नीट, जेईई, बैंकिंग, एसएससी और यूपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी और आरपीएससी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी खास पकड़ मानी जाती है। हिमांशु ने साल 2016 में पत्रकारिता की शुरुआत एबीपी न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म से किया। इसके बाद वह इंडिया टीवी और जी न्यूज (डीएनए) जैसे बड़े न्यूज चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी हिस्सा रह चुके हैं। हिमांशु तिवारी सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक सजग पाठक और आजीवन विद्यार्थी हैं, उनकी यही खूबी उनके कार्य में परिलक्षित होती है। उनका मानना है कि इन परीक्षाओं से जुड़ी सही और समय पर जानकारी लाखों युवाओं के भविष्य को दिशा दे सकती है, इसलिए वह इस बीट को सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।
लेखन की सोच और मकसद
हिमांशु के लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ सूचना देना नहीं है, बल्कि पाठक को सोचने की जगह देना भी है। खासकर करियर और शिक्षा के क्षेत्र में वह यह मानते हैं कि एक गलत या अधूरी खबर किसी छात्र की पूरी तैयारी को भटका सकती है। इसलिए उनके लेखन में सरल भाषा, ठोस तथ्य और व्यावहारिक नजरिया हमेशा प्राथमिकता में रहता है। उनकी कोशिश रहती है कि पाठक को सिर्फ खबर की जानकारी ही न हो, बल्कि यह भी समझ आए कि उस खबर का उसके जीवन और भविष्य से क्या रिश्ता है।
शिक्षा और अकादमिक पृष्ठभूमि
हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।
रुचियां और निजी झुकाव
काम से इतर हिमांशु की गहरी रुचि समकालीन इतिहास, समानांतर सिनेमा और दर्शन में रही है। राजनीति और विदेश नीति पर पढ़ना-लिखना उन्हें विशेष रूप से पसंद है। इसी रुचि के चलते उन्होंने दो लोकसभा चुनावों और दर्जनों विधानसभा चुनावों की कवरेज की, जहां राजनीति को उन्होंने बेहद नजदीक से देखा और समझा। चुनावी आंकड़ों की बारीकियां, नेताओं के भाषण, जमीनी मुद्दे और जनता की प्रतिक्रियाएं, इन सभी पहलुओं को समेटते हुए उन्होंने सैकड़ों खबरें और विश्लेषण तैयार किए, जो राजनीतिक प्रक्रिया की गहरी समझ को दर्शाते हैं।
विशेषज्ञताएं
- शिक्षा, करियर और नौकरियों से जुड़ी खबरों पर विशेष रुचि और निरंतर लेखन
- नीट, जेईई और राज्यवार बोर्ड परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों, बदलावों और परिणामों पर गहन फोकस
- UPSC, UPPSC, MPPSC, BPSC, RPSC और JPSC जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी, पैटर्न और नीतिगत पहलुओं पर पैनी नजर
- अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और विदेश नीति से जुड़े विषयों का विश्लेषणात्मक लेखन
- राजनीति, चुनावी आंकड़ों और जमीनी मुद्दों पर सरल और तथ्यपरक एक्सप्लेनर तैयार करने का अनुभव


