NEET Success Story: दादा चलाते हैं रिक्शा, पोते आदित्य ने पास की NEET परीक्षा; बनेगा गांव का पहला डॉक्टर
NEET UG 2026 Success Story: रिक्शा चालक के पोते आदित्य ने तमाम मुश्किलों को पार कर नीट परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 946 हासिल की है। वह अपने पूरे गांव के इतिहास में पहले डॉक्टर बनने जा रहे हैं।

Rickshaw Puller Grandson Aditya Secures NEET AIR 946: सफलता पाने के लिए बड़ी सुख-सुविधाओं की नहीं, बल्कि मन में कुछ कर गुजरने की सच्ची लगन और दिन-रात की कड़ी मेहनत की जरूरत होती है। इस बात को दुनिया के सामने पूरी मजबूती से साबित कर दिखाया है एक बेहद साधारण और गरीब परिवार के होनहार छात्र आदित्य ने। आदित्य ने देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली चिकित्सा प्रवेश परीक्षा, नीट यूजी (NEET UG 2026) में न सिर्फ सफलता हासिल की है, बल्कि ऑल इंडिया रैंक (AIR) 946 लाकर एक नया इतिहास रच दिया है। इस शानदार प्रदर्शन के साथ ही आदित्य अब अपने पूरे गांव में पहले डॉक्टर बनने जा रहे हैं।
एक फटे हुए टेंट के नीचे बीता आदित्य का बचपन, दादा चलाते हैं रिक्शा
आदित्य की सफलता की यह कहानी जितनी प्रेरणादायक है, उसके पीछे का संघर्ष उतना ही कठिन रहा है। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि रहने के लिए एक पक्का मकान तक नसीब नहीं था। एक पुराने और फटे हुए टेंट के नीचे रहकर आदित्य ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। परिवार की आजीविका का एकमात्र सहारा उनके बुजुर्ग दादा हैं, जो आज भी दिन-भर सड़कों पर रिक्शा चलाकर चंद रुपये कमा पाते हैं। पिता की दिहाड़ी मजदूरी और दादा के रिक्शे से होने वाली बेहद सीमित आय में जहां दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल था, वहां नीट जैसी परीक्षा की तैयारी की सोचना भी एक बड़े सपने जैसा था।
आदित्य ने बिहार स्कूल एग्जामिनेशन बोर्ड (BSEB) से 10वीं की परीक्षा पास की। इसके बाद उन्होंने मुजफ्फरपुर के आरडीएस (RDS) कॉलेज से 12वीं (इंटरमीडिएट) की परीक्षा में 87 प्रतिशत अंक हासिल किए।
संसाधनों की कमी को नहीं बनने दिया अपनी कमजोरी
जहां आज के समय में छात्र नीट की तैयारी के लिए बड़े शहरों में जाकर लाखों रुपये की कोचिंग लेते हैं, AC कमरों में पढ़ते हैं और महंगी टेस्ट सीरीज खरीदते हैं, वहीं आदित्य ने कड़कड़ाती ठंड और चिलचिलाती गर्मी के बीच उसी फटे टेंट में बैठकर पढ़ाई की। जब बिजली चली जाती, तो वे मोबाइल की स्क्रीन की रोशनी में किताबें पलटते थे। आदित्य के पास न तो महंगे गैजेट्स थे और ना ही कोई गाइडेंस देने वाला। लेकिन उनके मन में एक ही संकल्प था—अपनी पढ़ाई के दम पर अपने परिवार को इस तंगहाली से बाहर निकालना और अपने दादा के संघर्षों को एक गौरवपूर्ण मुकाम देना।
पूरे गांव के लिए उम्मीद की नई किरण बने आदित्य
जैसे ही नीट का रिजल्ट आया और आदित्य की ऑल इंडिया रैंक 946 और कैटेगरी रैंक 295 के बारे में पता चला, पूरे गांव में जश्न का माहौल बन गया। जिस गांव में आज तक कोई ठीक से उच्च शिक्षा भी हासिल नहीं कर पाया था, वहां से अब एक लड़का डॉक्टर बनने जा रहा है। गांव वालों के लिए यह एक ऐतिहासिक और गर्व का पल है।
आदित्य की यह प्रेरक कहानी देश के उन लाखों छात्र-छात्राओं के लिए सीख है जो सुख-सुविधाओं की कमी या पैसों की तंगी के आगे घुटने टेक देते हैं। आदित्य ने साबित कर दिया है कि यदि आपके इरादे फौलादी हों, तो एक फटा हुआ टेंट भी आपकी कामयाबी का गवाह बन सकता है।


