दिन-रात काम, संडे को भी ड्यूटी... 10 हजार का था वादा, इंटर्न को वेतन मिला तो होश हुए फाख्ता
रेडिट पर एक कॉलेज स्टूडेंट ने इंटर्नशिप का दर्द बयां किया है, जहां ओवरवर्क और लंबे कम्यूट के बावजूद उसे तयशुदा स्टाइपेंड का सिर्फ आधा हिस्सा दिया गया।

आजकल के दौर में इंटर्नशिप को किसी भी शानदार करियर की पहली सीढ़ी माना जाता है। लेकिन क्या हो जब ये सीढ़ी शुरुआत में ही डगमगा जाए? कॉर्पोरेट दुनिया की इस चकाचौंध के पीछे अक्सर एक ऐसी कड़वी सच्चाई भी छिपी होती है, जिसका सामना नए और अनुभवहीन स्टूडेंट्स को करना पड़ता है। ऐसा ही एक ताजा मामला इन दिनों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडिट पर गरमा-गरम बहस का मुद्दा बना हुआ है। एक कॉलेज स्टूडेंट की इंटर्नशिप की कहानी ने इंटरनेट पर लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। बात तब शुरू हुई, जब एक मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव इंटर्न ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि दिन-रात एक करने के बावजूद उसे उसकी मेहनत का पूरा दाम नहीं मिला। इस इंटर्न का दावा है कि उसे तयशुदा रकम का सिर्फ आधा हिस्सा ही दिया गया। अब यह नौजवान इस कश्मकश में फंसा है कि क्या वह इस नौकरी को छोड़ दे, या फिर इस अन्याय को बर्दाश्त करता रहे। आइए इस पूरे मामले को तफसील से समझते हैं।
वादे और हकीकत का फर्क
रेडिट पर अपनी परेशानी को साझा करते हुए इस यूजर ने बताया कि उसने 8 जून 2026 को एक कंपनी में मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव इंटर्न के तौर पर काम शुरू किया था। उस वक्त कंपनी ने उसे हर महीने 10,000 रुपये स्टाइपेंड देने का पक्का वादा किया था। यह स्टूडेंट अपने कॉलेज के चौथे साल की पढ़ाई कर रहा है। उसने अपनी पोस्ट में साफ तौर पर लिखा, "मैंने शुरुआत में ही कंपनी को बता दिया था कि मैं 17 जुलाई तक हफ्ते में सिर्फ तीन दिन ही ऑफिस आ पाऊंगा। कंपनी ने मेरी इस शर्त को बिना किसी ऐतराज के मान भी लिया था।" लेकिन, जैसा कि अक्सर देखने में आता है, वादे और हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क होता है।
ओवरवर्क और संडे को भी रहती थी ड्यूटी
इस तयशुदा शर्त के बावजूद, इंटर्न का कहना है कि उसने लगभग हर दिन काम किया। यहां तक कि कई बार संडे को भी उसे आराम नसीब नहीं हुआ। ऑफिस आने के अलावा उसने घर बैठे रिमोट असाइनमेंट्स भी पूरे किए। उसका दर्द यहीं खत्म नहीं होता। ऑफिस का समय सुबह 10.30 बजे से शाम 6 बजे तक तय था, लेकिन हकीकत कुछ और ही थी। वह अक्सर शाम 7.30 या यहां तक कि रात 9 बजे तक ऑफिस के कामों में उलझा रहता था। उसने बताया, "ऑफिस के घंटे खत्म होने के बाद भी मुझे नए टास्क पकड़ा दिए जाते थे। हद तो तब हो गई जब उन्होंने मेरे रोल से बाहर की जिम्मेदारियां भी मेरे सिर मढ़ दीं।" इन सबके ऊपर, उसे हर दिन 30 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता था, जिसमें उसके रोजाना तीन घंटे सिर्फ आने-जाने में बर्बाद होते थे। ऐसा लग रहा था मानो इंटर्नशिप के नाम पर कोई दिहाड़ी मजदूरी चल रही हो, जहां कोई नई स्किल सीखने को नहीं मिल रही थी, बस थकान ही पल्ले पड़ रही थी।
सैलरी डे पर लगा तगड़ा झटका
असली झटका इस नौजवान को 5 जुलाई को लगा, जब उसके बैंक अकाउंट में स्टाइपेंड क्रेडिट हुआ। उम्मीद 10,000 रुपये की थी, लेकिन खाते में आए सिर्फ 5,000 रुपये। पोस्ट के मुताबिक, जब उसने इस बारे में अपने मैनेजर से सवाल किया, तो उसे एक अजीब सा जवाब मिला। मैनेजर ने कहा कि स्टाइपेंड इसलिए काटा गया है क्योंकि उसने नियमित तौर पर ऑफिस अटेंड नहीं किया था। इंटर्न की दलील थी कि उसने तो हर रोज काम किया है, चाहे वह घर से ही क्यों न हो। कंपनी की खुद की पेमेंट साइकिल के हिसाब से भी, वह कम से कम 7500 रुपये का हकदार था। यह सीधे-सीधे उसकी मेहनत के साथ एक भद्दा मजाक था।
अब इस स्टूडेंट के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। एक तरफ कुछ भी नया न सीख पाने की हताशा है और दूसरी तरफ शारीरिक थकान। उसने लिखा, "अगर वे लोग स्टाइपेंड 2000 रुपये बढ़ा देते हैं, तो मैं शायद रुक जाऊं। वरना मैं इसे छोड़ दूंगा।" लेकिन उसके जेहन में एक बड़ा डर भी बैठा है। रिक्रूटर काफी प्रभावशाली है, और उसे डर है कि कहीं यह शख्स कॉलेज के आने वाले प्लेसमेंट ड्राइव्स में उसके लिए कोई बड़ी रुकावट न पैदा कर दे। यही वो कश्मकश है जिसने उसे रेडिट पर अनजान लोगों से सलाह मांगने पर मजबूर कर दिया।
इंटरनेट की जनता का क्या कहना है?
जैसे ही यह पोस्ट रेडिट पर वायरल हुई, इंटरनेट की जनता ने अपना फैसला सुनाना शुरू कर दिया। ज्यादातर लोगों ने यही सलाह दी कि अगर कंपनी अपने शुरुआती वादे पर खरी नहीं उतरती, तो ऐसी जगह रुकने का कोई फायदा नहीं है। एक यूजर ने कमेंट करते हुए लिखा, "ये कंपनी आखिर कितनी बड़ी है? अगर इसमें 10 से कम लोग काम करते हैं, तो तुरंत छोड़ दो। वो रिक्रूटर तुम्हारा कुछ ज्यादा नहीं बिगाड़ सकता। हो सकता है कॉलेज आने वाली किसी प्लेसमेंट ड्राइव में वो तुम्हें परेशान करे, लेकिन खुद से नौकरी ढूंढ़ना शुरू करो। मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव की भूमिकाएं फ्रेशर्स के लिए हमेशा मौजूद रहती हैं। अपनी मैनेजमेंट से बात करो और सही पैसों की मांग करो। अगर वो मना करते हैं, तो वहां से निकल लो।" एक दूसरे शख्स ने काफी सख्त लहजे में लिखा, "ऐसा लगता है कि इस स्टार्टअप ने तुम्हारे साथ स्कैम किया है। यह इनकी असली फितरत दिखाता है कि ये अपने कर्मचारियों के साथ कैसा सलूक करते हैं। उन्हें ऐसा मत करने दो।"
भविष्य के लिए सलाह देते हुए एक और यूजर ने लिखा, "तुम्हारा करियर अभी शुरू हो रहा है, ऐसे में स्ट्रेस होना लाजमी है। लेकिन पैसे बढ़ाने की गुजारिश करने के बजाय, उन्हें उनका ही वादा याद दिलाओ। तुमने पहले ही बता दिया था कि तुम 3 दिन आओगे, तो तुम्हें पूरा पैसा मिलना ही चाहिए। यह तुम्हारे लिए एक सबक भी है कि आगे से हर चीज लिखित में लेने की आदत डालो। जो तुमने बताया है, उससे यह कोई बहुत बेहतरीन कंपनी नहीं लगती, इसलिए यहां से चुपचाप निकल जाने में तुम्हारा कोई बड़ा नुकसान नहीं है।"
लेखक के बारे में
Himanshu Tiwariशॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।
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हिमांशु तिवारी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। बीते 10 सालों से वह लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस वक्त लाइव हिन्दुस्तान में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और बीते 3 साल से वह इस संस्थान से जुड़े हैं। शिक्षा, करियर, नौकरियों, नीट, जेईई, बैंकिंग, एसएससी और यूपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी और आरपीएससी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी खास पकड़ मानी जाती है। हिमांशु ने साल 2016 में पत्रकारिता की शुरुआत एबीपी न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म से किया। इसके बाद वह इंडिया टीवी और जी न्यूज (डीएनए) जैसे बड़े न्यूज चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी हिस्सा रह चुके हैं। हिमांशु तिवारी सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक सजग पाठक और आजीवन विद्यार्थी हैं, उनकी यही खूबी उनके कार्य में परिलक्षित होती है। उनका मानना है कि इन परीक्षाओं से जुड़ी सही और समय पर जानकारी लाखों युवाओं के भविष्य को दिशा दे सकती है, इसलिए वह इस बीट को सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।
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हिमांशु के लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ सूचना देना नहीं है, बल्कि पाठक को सोचने की जगह देना भी है। खासकर करियर और शिक्षा के क्षेत्र में वह यह मानते हैं कि एक गलत या अधूरी खबर किसी छात्र की पूरी तैयारी को भटका सकती है। इसलिए उनके लेखन में सरल भाषा, ठोस तथ्य और व्यावहारिक नजरिया हमेशा प्राथमिकता में रहता है। उनकी कोशिश रहती है कि पाठक को सिर्फ खबर की जानकारी ही न हो, बल्कि यह भी समझ आए कि उस खबर का उसके जीवन और भविष्य से क्या रिश्ता है।
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हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।
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काम से इतर हिमांशु की गहरी रुचि समकालीन इतिहास, समानांतर सिनेमा और दर्शन में रही है। राजनीति और विदेश नीति पर पढ़ना-लिखना उन्हें विशेष रूप से पसंद है। इसी रुचि के चलते उन्होंने दो लोकसभा चुनावों और दर्जनों विधानसभा चुनावों की कवरेज की, जहां राजनीति को उन्होंने बेहद नजदीक से देखा और समझा। चुनावी आंकड़ों की बारीकियां, नेताओं के भाषण, जमीनी मुद्दे और जनता की प्रतिक्रियाएं, इन सभी पहलुओं को समेटते हुए उन्होंने सैकड़ों खबरें और विश्लेषण तैयार किए, जो राजनीतिक प्रक्रिया की गहरी समझ को दर्शाते हैं।
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