पिता को उठा ले गए थे नक्सली, 200 रुपये में चलाते थे खर्च; अब बजा विदेश में डंका
''भूखा रहना मंजूर था, लेकिन पढ़ाई छोड़ना नहीं'' यह शब्द हैं बिहार के गयाजी के रहने वाले रफीक उर रहमान खान की, जिनको उज्बेकिस्तान सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने शिक्षक के पद पर बहाल किया है। वो पिछले कई सालों से उज्बेकिस्तान के छात्रों को लैंग्वेज की शिक्षा दे रहे हैं।

''भूखा रहना मंजूर था, लेकिन पढ़ाई छोड़ना नहीं'' यह शब्द हैं बिहार के गयाजी के रहने वाले रफीक उर रहमान खान की, जिनको उज्बेकिस्तान सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने शिक्षक के पद पर बहाल किया है। वो पिछले कई सालों से उज्बेकिस्तान के छात्रों को लैंग्वेज की शिक्षा दे रहे हैं। कभी नक्सलियों के साए में जिए रफीक उर रहमान खान की कहानी काफी दिलचस्प और संघर्षभरा रहा है।
नक्सलियों ने कर दी थी नाना की हत्या
रफीक उर रहमान खान बेहद साधारण परिवार से आते हैं। आर्थिक रूप से बहुत मजबूत नहीं थे। वहीं क्षेत्र का वातावरण ऐसा था, जहां हर सुबह उठने पर यही भय होता कि आज न जाने किसकी जान जाने की सूचना मिल जाएगी। छह साल की उम्र तक रफीक उर रहमान खान ने जिंदगी के कई कठिन और दर्दनाक पहलू देख लिए थे। बिहार के जोलाह बीघा गांव में डर, हिंसा और खून-खराबे ने लोगों का जीवन प्रभावित कर रखा था। नक्सली दिनदहाड़े भी खुलेआम घूमते थे। साल 2000 में नक्सलियों ने उनके नाना राजा खान की हत्या कर दी थी। उसी दिन उनके पिता शफीक उर रहमान खान को भी अगवा कर बांध दिया गया और प्रताणित किया। इस घटना ने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया था।
पिता ने गयाजी शहर में रखा
रफीक बताते हैं कि हम तीन भाई हैं। हम लोग इस घटना के बाद गलत रास्ते पर नहीं चलें, इसलिए हमें गांव में तब तक आने नहीं दिया गया, जब तक के उस गांव से निकल कर सिलदाहा में घर नहीं बनाया। हम तीनों भाइयों को पिता ने गयाजी शहर में रखा था।
26 साल मेहनत का फल
26 साल बाद रफीक ने कड़ी मेहनत और संघर्ष के दम पर बड़ी सफलता हासिल की। उन्हें उज्बेकिस्तान के शिक्षा मंत्रालय में शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिली। बेटे की इस कामयाबी पर पिता शाफिक उर रहमान खान भी खुश हैं। उनके पिता बताते हैं कि 90 के दशक में जब अभिवाजित बिहार था, तब तो मेरे गांव जोल्ह बिगहा से नक्सली मुझे अपहरण करके लेकर चले गए थे, लेकिन शायद भगवान ने मेरी मृत्यु का समय तय नहीं किया था। इसलिए मेरी जान किसी तरह क्षेत्र के कुछ लोगों की पहल से बच गई।
रफीक उर रहमान खान कहते हैं कि हमारी गरीबी का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि जब पहली बार मैंने ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी खरीदी थी तो पिता को 5 महीने तक पैसे जमा करने पड़े थे। तब एक जनून था कि सिर्फ पढ़ाई करनी है।
200 रुपये में चलाना पड़ता था खर्च
रफीक उर रहमान खान की सफलता के पीछे संघर्ष की लंबी कहानी है। वे बताते हैं कि पढ़ाई के दौरान उनके पिता मजदूरी और खेती से जो भी कमाते थे, उसमें से हर महीने करीब 200 रुपये भेजते थे। इसी रकम से फीस जमा करनी होती थी और खाने-पीने का खर्च भी चलाना पड़ता था। कई बार हालात इतने कठिन हो जाते थे कि रात बिना भोजन के गुजारनी पड़ती थी। ऐसे समय में जब हिम्मत टूटने लगती, तब पिता का संघर्ष और उम्मीदों भरा चेहरा उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता था।
पढ़ाई-लिखाई
बिहार के गया जिले के इमामगंज क्षेत्र स्थित सिलदहा गांव के रहने वाले रफीक ने शुरुआती शिक्षा गांव से करीब चार किलोमीटर दूर स्थित स्कूल में प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने हाई स्कूल की पढ़ाई इमामगंज और शेरघाटी से पूरी की। इंटरमीडिएट और स्नातक की शिक्षा उन्होंने गया शहर में रहकर हासिल की, जबकि परास्नातक (एमए) की पढ़ाई के लिए दिल्ली का रुख किया।
खर्चा निकालने के लिए ट्यूशन पढ़ाया
दिल्ली पहुंचने के बाद रफीक ने अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए कोचिंग संस्थानों में पढ़ाना शुरू किया। यहीं से उनके शिक्षक बनने की यात्रा को नई दिशा मिली। उन्होंने करीब 20 सालों तक दिल्ली और गया में कोचिंग तथा ट्यूशन पढ़ाया, जिससे उन्हें शिक्षण क्षेत्र का व्यापक अनुभव मिला।
उज्बेकिस्तान में काम करने का मिला अवसर
इसी अनुभव और भाषा पर मजबूत पकड़ के कारण उन्हें ब्रिटिश काउंसिल और नाटो से जुड़े शिक्षा कार्यक्रम के तहत उज्बेकिस्तान में काम करने का अवसर मिला। वहां की सरकार के साथ हुए समझौते के तहत वे भाषा शिक्षक और विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत हैं। वे न केवल छात्रों को पढ़ाते हैं, बल्कि सप्ताह में दो बार शिक्षकों के लिए भी विशेष प्रशिक्षण सत्र आयोजित करते हैं। इसके बदले उन्हें डॉलर में वेतन मिलता है। पढ़ाई नहीं छोड़ी और लगातार मेहनत करते रहे। आज उनकी उपलब्धि पूरे इलाके के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है।
लेखक के बारे में
Dheeraj Palसंक्षिप्त विवरण:
धीरज पाल को पत्रकारिता के क्षेत्र में 7 साल का अनुभव है। लाइव हिन्दुस्तान में काम करते हुए इन्हें 4 साल हो गए हैं। धीरज एजुकेशन रिपोर्टर के तौर पर काम कर चुके हैं। अपने करियर के दौरान धीरज ने राजनीति समाचार, एजुकेशन बीट के लिए ग्राउंड रिपोर्टिंग भी की है।
शैक्षणिक पृष्ठभूमि
धीरज ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए इन मीडिया स्टडीज और राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज से जनसंचार एवं पत्रकारिता से परास्नातक की पढ़ाई की। धीरज पाल ने अपने पत्रकारिता कर की शुरुआत एपीएन न्यूज चैनल से की। इसके बाद उन्होंने लोकमत न्यूज हिंदी और एनडीटीवी जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम किया। हिंदुस्तान लाइव में यूपी बोर्ड से लेकर उन्होंने लोकसभा चुनाव कवर करने साथ-साथ खेल जैसे बीट पर काम किया। अब इनका एकमात्र उद्देश्य करियर और एजुकेशन से जुड़ी रुचिगत, सरल, प्रमाणिक और पाठक-हितैषी रूप में प्रस्तुत करना है।
व्यक्तिगत रुचियां
उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के निवासी धीरज पाल को पत्रकारिता और ज्योतिषीय अध्ययन के साथ-साथ घूमने, किताबें पढ़ने और क्रिकेट खेलने का शौक है।
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