PhD : कई सालों से पीएचडी में अटके 644 छात्रों का एडमिशन रद्द, UGC नियम के चलते फैसला, सीटें कर रखी थीं ब्लॉक
यूजीसी नियमों को ध्यान में रखते हुए मुंबई विश्वविद्यालय ने रिचर्स करने की समय सीमा पार करने वाले 644 पीएचडी छात्रों का दाखिला रद्द कर दिया है। विश्वविद्यालय का तर्क है कि इन शोधार्थियों के कारण सीटें ब्लॉक हो रही थीं।

मुंबई विश्वविद्यालय ने सितंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच एक चरणबद्ध प्रक्रिया के तहत 644 पीएचडी शोधार्थियों का दाखिला रद्द कर दिया है। ये पीएचडी छात्र विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की ओर से पीएचडी करने के लिए तय की गई अधिकतम समय सीमा में अपनी रिसर्च पूरी नहीं कर पाए। विश्वविद्यालय का कहना है कि यह कोई अचानक की गई या फिर सभी शोधार्थियों पर एक साथ की गई कार्रवाई नहीं है। बल्कि प्रत्येक मामले की व्यक्तिगत तौर पर समीक्षा की गई और उन्हें नियमों पर खरा न उतरे पाए जाने पर पंजीकरण रद्द किया गया। एक ही शैक्षणिक सत्र में इतने बड़े पैमाने पर पीएचडी पंजीकरण रद्द किए जाने का यह पहला मामला है।
10-10 साल से पीएचडी कर रहे छात्र, सीटें कर रखी ब्लॉक
पीएचडी से जिन स्टूडेंट्स का नाम काटा गया है, उनमें कई 10 साल से अधिक समय से इसी कोर्स में हैं। उनकी पीएचडी बिल्कुल भी आगे नहीं बढ़ सकी है। मुंबई मिरर की रिपोर्ट के मुताबिक अधिकारियों ने बताया है कि लंबे समय तक पीएचडी में अटके शोधार्थियों की वजह से सीटें ब्लॉक हो गई थीं और गाइड नए शोधार्थियों को दाखिला नहीं दे पा रहे थे, जिससे डॉक्टरेट दाखिला प्रक्रिया में बाधा पैदा हो रही थी।
स्टूडेंट्स से कई शिकायतें मिली थीं जिन्होंने पीएचडी एंट्रेंस टेस्ट पास कर लिया था, लेकिन उन्हें एक या दो साल तक गाइड अलॉट नहीं किए गए थे। अधिकारी ने बताया कि कई डिपार्टमेंट ने यह भी कहा है कि उनकी फैकल्टी नए पीएचडी छात्रों को स्वीकार नहीं कर सकती क्योंकि गाइड में सुपरविजन में पहले से ही कई स्टूडेंट्स पीएचडी कर रहे हैं। इन शोधार्थियों की पीएचडी आगे ही नहीं बढ़ पा रही है। कुछ छात्र तो 10-10 साल से पीएचडी कर रहे हैं। इन स्टूडेंट्स ने पीएचडी सीटें ब्लॉक कर रखी हैं।
यूजीसी ( UGC ) के नियम के मुताबिक कितने सालों में पीएचडी करनी होती है
रिपोर्ट के मुताबिक यूजीसी नियम कहते हैं कि पीएचडी तीन से छह वर्ष के भीतर पूरी की जानी चाहिए, जबकि अधिकतम अवधि आठ वर्ष है। महिलाओं और दिव्यांग उम्मीदवारों को अधिकतम 10 वर्ष तक का विस्तार दिया जा सकता है। गाइड को लेकर भी नियम है। एक प्रोफेसर अधिकतम आठ, एसोसिएट प्रोफेसर छह और असिस्टेंट प्रोफेसर चार शोधार्थियों को सुपरवाइज कर सकते हैं। विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि शोध अनुशासन बहाल करने के लिए यूजीसी के ढांचे के भीतर यह कार्रवाई की गई। उन्होंने कहा, 'यह प्रत्येक मामले के आधार पर की गई प्रक्रियात्मक कार्रवाई थी, कोई अचानक सामूहिक निर्णय नहीं।'जिन 644 स्टूडेंट्स का रजिस्ट्रेशन अब कैंसिल कर दिया गया है, वे इन लिमिट को पार कर चुके थे।
छात्रों ने जताई नाराजगी
इस निर्णय के बाद प्रभावित शोधार्थियों में असंतोष देखा जा रहा है। कई छात्रों ने आर्थिक कठिनाइयों, पारिवारिक परिस्थितियों का हवाला दिया। एक शोधार्थी ने कहा, 'मैं कामकाजी छात्र हूं, पारिवारिक समस्याएं थीं और विवाद के कारण मुझे अपना गाइड बदलना पड़ा। यह अन्याय है।'
शिक्षाविदों ने उठाए सवाल
वरिष्ठ शिक्षाविदों ने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में पीएचडी रजिस्ट्रेशन रद्द कर देना सिस्टम की विफलता को दर्शाता है। डॉ. ए.डी. सावंत, जो एमयू के पूर्व प्रो-वाइस चांसलर रहे हैं, ने इस संख्या को बहुत तादाद बताते हुए निगरानी तंत्र पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा, 'क्या स्टेटस रिपोर्ट की नियमित समीक्षा हुई? गाइड और विभागीय पैनल क्या कर रहे थे?' उन्होंने सुझाव दिया कि अटेंडेंस की निगरानी, समय-समय पर मूल्यांकन और सशर्त विस्तार की व्यवस्था सख्ती से लागू की जानी चाहिए। एक अन्य वरिष्ठ संकाय सदस्य ने कहा कि समय पर समीक्षा और चेतावनी दी जाती तो इतने बड़े पैमाने पर रद्दीकरण से बचा जा सकता था।
विश्वविद्यालय ने यूजीसी अनुपालन का हवाला दिया
एमयू ने कहा कि पीएचडी में विस्तार केवल संतोषजनक प्रगति के आधार पर शोध सलाहकार समिति और गाइड की सिफारिश पर ही दिया जाता है। यूजीसी नियम महिलाओं और दिव्यांग उम्मीदवारों को अतिरिक्त दो वर्ष का विस्तार प्रदान करते हैं, जिससे अधिकतम अवधि 10 वर्ष हो जाती है।
विश्वविद्यालय ने कहा कि जो पंजीकरण यूजीसी मानदंडों के अनुरूप नहीं थे, उनकी समीक्षा उसकी अकादमिक परिषद द्वारा की गई। जिन शोधार्थियों की विस्तार अवधि समाप्त नहीं हुई है या जिन्होंने अंतिम सिनॉप्सिस जमा कर दिया है, उन्हें 31 मार्च 2026 तक शोध प्रबंध जमा करने का अंतिम अवसर दिया गया है।
शोधार्थी का आरोप
52 वर्षीय बौद्ध भिक्षु और शोधार्थी भदंत विमांसा ने आरोप लगाया कि उनका पंजीकरण जानबूझकर निशाना बनाया गया। बड़े स्तर पर रद्दीकरण उनके खिलाफ कार्रवाई को छिपाने के लिए किया गया। उन्होंने कहा, 'मुझे कैंपस से बाहर करने की कोशिश में 8 नवंबर 2025 को मेरा पीएचडी पंजीकरण रद्द कर दिया गया। मेरा हॉस्टल कमरा सील कर दिया गया और मैं अगस्त से परिसर में विरोध कर रहा हूं।' उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन ने उन्हें और उनके समर्थकों को पहुंच से वंचित किया।
महाराष्ट्र राज्य अल्पसंख्यक आयोग ने 18 फरवरी को एमयू के कालिना परिसर में सुनवाई की और विश्वविद्यालय को 10 दिनों के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
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