IIT खड़गपुर से पढ़ाई, छोड़ी ISRO की नौकरी, खुद का रॉकेट बना रचा इतिहास; अब TIME100 Next 2026 में शामिल
साल 2007 में पवन ने पहले ही प्रयास में IIT-JEE परीक्षा पास कर IIT खड़गपुर में दाखिला हासिल किया। यहां से उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डुअल बीटेक-एमटेक (BTech-MTech) डिग्री पूरी की।

कहते हैं कि जहां चाह है वहीं राह है। यह लाइन भारत की पहली प्राइवेट स्पेस कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस के को-फाउंडर और सीईओ पवन कुमार चंदाना पर बिल्कुल परफेक्ट बैठती है। इस वक्त वो चर्चे में हैं। दरअसल, पवन कुमार चंदाना को टाइम मैगजीन की प्रतिष्ठित TIME100 Next 2026 लिस्ट में जगह मिली है।
पवन चंदाना को ‘भारत का एलन मस्क’ कहा जाता है। उन्होंने इसरो (ISRO) में रॉकेट पर काम करने से लेकर हैदराबाद से एक ऑर्बिटल लॉन्च कंपनी खड़ी करने तक का सफर तय किया है। बताते चलें कि 18 जुलाई 2026 को स्काईरूट का विक्रम-1 रॉकेट भारतीय धरती से सफलतापूर्वक ऑर्बिट में पहुंचने वाला पहला निजी तौर पर विकसित भारतीय रॉकेट बना। इसमें चंदाना की अहम भूमिका थी। चलिए आज हम आपको उनकी सक्सेस स्टोरी के बारे में बताते हैं।
कौन हैं पवन कुमार चंदाना
पवन कुमार चंदाना का जन्म वर्ष 1991 में तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। बचपन से ही उन्हें मशीनों और तकनीक को समझने का शौक था, लेकिन शुरुआती दिनों में वो पढ़ाई में कमजोर थे। स्कूल के समय एक परीक्षा में उन्हें गणित में सिर्फ 51 अंक मिले थे। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही छात्र आगे चलकर भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र में इतिहास रचने वाला बनेगा।
आईआईटी खड़गपुर से से पढ़ाई
पवन के पिता चाहते थे कि उनका बेटा ऊंचाइयों तक पहुंचे। इसी सोच के साथ उन्होंने उन्हें IIT-JEE की कोचिंग दिलाई। यहीं से उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया। गणित और विज्ञान की पढ़ाई के दौरान इन विषयों में उनकी दिलचस्पी काफी बढ़ गई और धीरे-धीरे उनका प्रदर्शन भी बेहतर होता गया। साल 2007 में पवन ने पहले ही प्रयास में IIT-JEE परीक्षा पास कर IIT खड़गपुर में दाखिला हासिल किया। यहां से उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डुअल बीटेक-एमटेक (BTech-MTech) डिग्री पूरी की। जहां उनके कई सहपाठी आकर्षक पैकेज वाली नौकरियों और विदेश में करियर बनाने की राह पर निकल पड़े, वहीं पवन का सपना रॉकेट और अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में कुछ नया करने का था।
ISRO से एंटरप्रेन्योरशिप तक
2012 में चंदाना कैंपस से ही साइंटिस्ट के तौर पर इसरो (ISRO) में शामिल हुए। कम सैलरी के बावजूद, उन्होंने वहीं से रिटायर होने का सपना देखा क्योंकि उन्हें तिरुवनंतपुरम के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर में अपना काम बहुत पसंद था। उन्होंने वहां लगभग छह साल तक काम किया और GSLV Mk-III (भारत का सबसे भारी लॉन्च व्हीकल), GSLV Mk-II के लिए S-200 सॉलिड बूस्टर में योगदान दिया। ISRO के स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SSLV) के लिए डिप्टी प्रोजेक्ट मैनेजर के तौर पर काम किया। 2016 में उन्हें इसरो में इंटरनल इनोवेशन अवॉर्ड मिला।
बनाई अपनी स्पेस टेक कंपनी
उनके मन में भारत में एक स्पेस-टेक कंपनी बनाने का विचार आया। इसके बाद पवन और उनके दोस्त नागा भरत ढाका ने नौकरी छोड़कर जून 2018 में हैदराबाद में स्काईरूट एयरोस्पेस की नींव रखी। उनका मिशन है कि अंतरिक्ष तक पहुंच को इतना आसान बनाया जाए, जितना कोई कैब बुक करना होता है।
वहीं, आईआईटी खड़गपुर के ही पूर्व छात्र बंसल ने उनके विजन पर भरोसा किया और उनके वेंचर में 1.5 मिलियन डॉलर का निवेश किया। हालांकि जल्द ही कोविड 19 महामारी आ गई जिससे सीरीज ए फंडिंग जुटाना मुश्किल हो गया। जब उनका सपना नामुमकिन लगने लगा, तो रिन्यूएबल एनर्जी की बड़ी कंपनी ग्रीनको (Greenko) के फाउंडर्स ने आर्थिक मदद के लिए हाथ बढ़ाया।
जुलाई 2020 में, उनकी कंपनी रॉकेट इंजन का टेस्ट करने वाली पहली प्राइवेट भारतीय कंपनी बनी। इस इंजन का नाम 'रमन-1' था, जो एक क्रायोजेनिक इंजन था और नोबेल पुरस्कार विजेता सी.वी. रमन के नाम पर रखा गया था। साल 2021 भारतीय स्पेस उद्योग के लिए बड़ा बदलाव लेकर आया। केंद्र सरकार ने पहली बार निजी कंपनियों के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र के दरवाजे खोले। इस मौके का सबसे बड़ा फायदा स्काईरूट एयरोस्पेस को मिला। चंदाना की स्काईरूट एयरोस्पेस ISRO के साथ समझौता ज्ञापन साइन करने वाली पहली प्राइवेट कंपनी बनी और बाद में भारत की सबसे बड़ी डीप-टेक फंडिंग ($51 मिलियन) हासिल की।
अब TIME100 Next में नाम
बता दें कि विक्रम-1 की सफलता के बाद पवन चंदना को अब TIME100 Next 2026 में जगह मिली है। यह TIME की ऐसी सूची है, जिसमें दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों के उभरते नेताओं और प्रभावशाली लोगों को शामिल किया जाता है, जो आने वाले समय को आकार दे रहे हैं।


