न छात्र, न बेरोजगार युवा... अब मास्टरजी-मैडमजी सड़क पर, 6 दिन से किस बात पर डटे हजारों शिक्षक

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ओडिशा के गांधी मार्ग पर हजारों शिक्षक-कर्मचारी छठे दिन भी पेंशन, अनुदान और भर्ती जैसी पुरानी मांगों को लेकर डटे रहे और सरकार से ठोस कार्रवाई की मांग की।

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शिक्षकों का प्रोटेस्ट (प्रतीकात्मक तस्वीर)

देश में इन दिनों प्रोटेस्ट की एक अलग ही लहर चल रही है। कहीं छात्र पेपर लीक को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं, तो कहीं नौकरी की आस लगाए बैठे युवा भर्ती न होने से नाराज हैं। ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में मास्टरजी और मैडम ने विरोध का झंडा बुलंद किया है। छात्रों का आंदोलन अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि हजारों शिक्षक और गैर-शिक्षक कर्मचारी अपनी बरसों पुरानी मांगों को लेकर मैदान में कूद पड़े हैं। यह अलग बात है कि इस बार मुद्दा पेपर लीक का नहीं, बल्कि पेंशन, अनुदान और नौकरी की सुरक्षा का है।

टाइम्स नाउ की रिपोर्ट के मुताबिक, भुवनेश्वर के गांधी मार्ग पर बीते छह दिनों से हजारों शिक्षक और गैर-शिक्षक कर्मचारी डेरा जमाए बैठे हैं। दिन में चिलचिलाती गर्मी और रात में मूसलाधार बारिश, कुछ भी इन आंदोलनकारियों का हौसला नहीं तोड़ पाया है। यह प्रदर्शन 'ओडिशा स्कूल-कॉलेज टीचर्स एंड एम्प्लॉइज कोऑर्डिनेशन कमेटी' के बैनर तले हो रहा है, और आंदोलनकारियों ने साफ कह दिया है कि जब तक सरकार उनकी मांगें नहीं मानती, वे यहां से टस से मस नहीं होंगे।

"जब तक सरकार हमारी मांगें नहीं मानती, हम यहां से नहीं हटेंगे" का नारा बीते छह दिनों से गांधी मार्ग की फिजा में गूंज रहा है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्होंने कई बार सरकार को अपनी परेशानियां लिखकर बताईं, बातचीत के दौर भी हुए, मगर नतीजा सिफर ही रहा। उनकी सबसे अहम मांग यह है कि सभी पात्र स्कूलों को तुरंत अनुदान जारी किया जाए और अनुदान-प्राप्त स्कूलों व कॉलेजों को सरकार अपने अधीन ले ले। इसके अलावा पुरानी पेंशन योजना लागू करने, सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पेंशन और अन्य लाभ देने, तथा सेवा शर्तों में एकरूपता लाने की मांग भी जोर-शोर से उठाई जा रही है।

संविदा शिक्षकों की अलग ही पीड़ा

इस आंदोलन में एक तबका ऐसा भी है जिसकी मांगें बाकियों से थोड़ी अलग हैं। साल 2004 से 2013 के बीच संविदा के आधार पर नियुक्त हुए शिक्षक अब छह नोशनल इंक्रीमेंट और वरिष्ठता का लाभ मांग रहे हैं। इनका कहना है कि बरसों नौकरी करने के बावजूद इन्हें वह दर्जा नहीं मिला, जिसके ये हकदार हैं। इसी कड़ी में ग्रेड पे की गड़बड़ियां दूर करने और स्कूल-कॉलेजों में खाली पड़े पदों पर तुरंत भर्ती करने की मांग भी शामिल है। प्रदर्शनकारी कर्मचारियों के मुताबिक, पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ न मिलने की वजह से कई रिटायर्ड कर्मचारी आर्थिक तंगी झेल रहे हैं। इन्होंने सरकार से गुज़ारिश की है कि इस मसले पर जल्द कदम उठाए जाएं ताकि उन्हें उनका हक़ मिल सके। गौरतलब है कि यह आंदोलन 16 अगस्त से शुरू हुआ, जिसे प्रदर्शनकारियों ने 'डिमांड डे' के तौर पर मनाया था। शिक्षकों और कर्मचारियों ने चेतावनी दी है कि जब तक सरकार उनकी मांगों पर ठोस कदम नहीं उठाती यह आंदोलन थमने वाला नहीं है।

जारी है प्रदर्शन

इस पूरे प्रदर्शन में महिला शिक्षकों और कर्मचारियों की भागीदारी भी कम नहीं रही। बड़ी संख्या में महिलाएं इस आंदोलन का हिस्सा बनी हैं, और उन्होंने सरकार के महिला सम्मान व सशक्तिकरण के दावों पर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि अपने हक और रोजी-रोटी से जुड़ी मांगों के लिए महिला कर्मचारियों को दिन-रात सड़क पर रहना पड़ रहा है, जो कहीं न कहीं सरकार के इन्हीं दावों की पोल खोलता है। फिलहाल गांधी मार्ग पर प्रदर्शन जारी है, और सबकी निगाहें अब राज्य सरकार के जवाब पर टिकी हैं। प्रदर्शनकारियों ने साफ कर दिया है कि जब तक उनकी लंबे समय से लटकी मांगों पर ठोस आश्वासन और कार्रवाई नहीं होती, वे आंदोलन वापस नहीं लेंगे। अब देखना यह है कि सरकार इस बार सिर्फ कमेटी बनाकर मामला टालती है, या फिर वाकई कोई ठोस फैसला लेती है।

Himanshu Tiwari

लेखक के बारे में

Himanshu Tiwari

शॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।

परिचय एवं अनुभव
हिमांशु तिवारी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। बीते 10 सालों से वह लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस वक्त लाइव हिन्दुस्तान में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और बीते 3 साल से वह इस संस्थान से जुड़े हैं। शिक्षा, करियर, नौकरियों, नीट, जेईई, बैंकिंग, एसएससी और यूपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी और आरपीएससी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी खास पकड़ मानी जाती है। हिमांशु ने साल 2016 में पत्रकारिता की शुरुआत एबीपी न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म से किया। इसके बाद वह इंडिया टीवी और जी न्यूज (डीएनए) जैसे बड़े न्यूज चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी हिस्सा रह चुके हैं। हिमांशु तिवारी सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक सजग पाठक और आजीवन विद्यार्थी हैं, उनकी यही खूबी उनके कार्य में परिलक्षित होती है। उनका मानना है कि इन परीक्षाओं से जुड़ी सही और समय पर जानकारी लाखों युवाओं के भविष्य को दिशा दे सकती है, इसलिए वह इस बीट को सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।

लेखन की सोच और मकसद
हिमांशु के लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ सूचना देना नहीं है, बल्कि पाठक को सोचने की जगह देना भी है। खासकर करियर और शिक्षा के क्षेत्र में वह यह मानते हैं कि एक गलत या अधूरी खबर किसी छात्र की पूरी तैयारी को भटका सकती है। इसलिए उनके लेखन में सरल भाषा, ठोस तथ्य और व्यावहारिक नजरिया हमेशा प्राथमिकता में रहता है। उनकी कोशिश रहती है कि पाठक को सिर्फ खबर की जानकारी ही न हो, बल्कि यह भी समझ आए कि उस खबर का उसके जीवन और भविष्य से क्या रिश्ता है।

शिक्षा और अकादमिक पृष्ठभूमि
हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।

रुचियां और निजी झुकाव
काम से इतर हिमांशु की गहरी रुचि समकालीन इतिहास, समानांतर सिनेमा और दर्शन में रही है। राजनीति और विदेश नीति पर पढ़ना-लिखना उन्हें विशेष रूप से पसंद है। इसी रुचि के चलते उन्होंने दो लोकसभा चुनावों और दर्जनों विधानसभा चुनावों की कवरेज की, जहां राजनीति को उन्होंने बेहद नजदीक से देखा और समझा। चुनावी आंकड़ों की बारीकियां, नेताओं के भाषण, जमीनी मुद्दे और जनता की प्रतिक्रियाएं, इन सभी पहलुओं को समेटते हुए उन्होंने सैकड़ों खबरें और विश्लेषण तैयार किए, जो राजनीतिक प्रक्रिया की गहरी समझ को दर्शाते हैं।

विशेषज्ञताएं
- शिक्षा, करियर और नौकरियों से जुड़ी खबरों पर विशेष रुचि और निरंतर लेखन
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- UPSC, UPPSC, MPPSC, BPSC, RPSC और JPSC जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी, पैटर्न और नीतिगत पहलुओं पर पैनी नजर
- अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और विदेश नीति से जुड़े विषयों का विश्लेषणात्मक लेखन
- राजनीति, चुनावी आंकड़ों और जमीनी मुद्दों पर सरल और तथ्यपरक एक्सप्लेनर तैयार करने का अनुभव

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