OBC आरक्षण मामले में 60 UPSC अभ्यर्थियों को सुप्रीम कोर्ट से राहत, CSE परीक्षा पास होने के बाद भी नहीं दी गई थी नियुक्ति
सुप्रीम कोर्ट ने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के 60 अभ्यर्थियों को ओबीसी आरक्षण मामले में बड़ी राहत दी है। इन अभ्यर्थियों को 2016 में सिविल सेवा परीक्षा उतीर्ण होने के बाद भी गलत तरीके से क्रीमी लेयर बताकर नियुक्ति देने से इनकार कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के 60 अभ्यर्थियों को ओबीसी आरक्षण मामले में बड़ी राहत दी है। इन अभ्यर्थियों को 2016 में सिविल सेवा परीक्षा पास होने के बाद भी गलत तरीके से क्रीमी लेयर बताकर नियुक्ति देने से इनकार कर दिया था। आरक्षण के मुद्दे पर महत्वपूर्ण फैसला पारित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ माता-पिता के वेतन और आय के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में क्रीमी लेयर तय नहीं की जा सकती। शीर्ष अदालत ने कहा कि माता-पिता या अभिभावक के पद और सामाजिक स्थिति को दरकिनार कर सिर्फ आय के आधार पर क्रीमी लेयर तय करना कानून की नजर में सही नहीं है।
UPSC CSE परीक्षा पास की पर नियुक्ति नहीं दी गई
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और आर. महादेवन की पीठ ने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ओबीसी श्रेणी के करीब 60 अभ्यर्थियों को राहत देते हुए यह फैसला दिया। इन अभ्यर्थियों को 2016 में सिविल सेवा परीक्षा पास होने के बाद भी गलत तरीके से क्रीमी लेयर बताकर नियुक्ति देने से इनकार कर दिया था। विभिन्न उच्च न्यायालयों के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की अपील खारिज करते हुए, शीर्ष अदालत ने 65 पन्नों के अपने फैसले में कहा कि क्रीमी लेयर का निर्धारण करते समय वर्ष 1993 के मूल दिशा-निर्देशों के अनुसार पद की स्थिति और अन्य कारकों को भी ध्यान में रखना होगा।
सिर्फ आय के आधार पर तय नहीं की जा सकती कि ओबीसी क्रीमी लेयर
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि किसी अभ्यर्थी की स्थिति सिर्फ आय के आधार पर तय नहीं की जा सकती कि वह ओबीसी में क्रीमी लेयर की श्रेणी में आता है या नॉन-क्रीमी लेयर में। जस्टिस महादेवन द्वारा लिखे फैसले में कहा गया कि क्रीमी लेयर को आरक्षण के दायरे से बाहर करने का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि ओबीसी के भीतर सामाजिक रूप से आगे बढ़े हुए लोग वास्तव में पिछड़े लोगों के लिए बने फायदों का लाभ न उठा पाएं।
स्वत: आरक्षण के लाभ से बाहर नहीं रख सकते
शीर्ष अदालत ने कहा कि ग्रुप सी और डी के सरकारी कर्मचारी, जिनका वेतन समय के साथ बढ़ता है, उन्हें आरक्षण लाभों से स्वतः बाहर नहीं रखा जाता है। पीठ ने यह भी कहा कि इस तरह का व्यवहार से संविधान के अनुच्छेद-14 और 16 के तहत समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है।
साथ ही कहा कि इसका यह मकसद एक ही सामाजिक वर्ग के बराबर दर्जा पाने वाले लोगों के बीच बनावटी फर्क पैदा करना नहीं है। फैसले में कहा कि जाति भले ही ऐतिहासिक रूप से पिछड़ेपन का संकेत हो, लेकिन इसे पिछड़ेपन का अकेला कारण नहीं माना जा सकता। पीठ ने कहा कि पिछड़े वर्गों में क्रीमी लेयर को बाहर करना सिर्फ पॉलिसी की पसंद का मामला नहीं है, बल्कि यह एक संवैधानिक जरूरत है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण का लाभ उन लोगों तक पहुंचे जो सही मायने में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं।
अतिरिक्त पद बनाए जा सकते हैं
कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया कि प्रभावित अभ्यर्थियों के दावों और आपत्तियों की इस फैसले के अनुसार फिर से समीक्षा की जाए। कोर्ट ने यह भी कहा है कि जरूरत पड़ने पर उन्हें समायोजित करने के लिए अतिरिक्त पद भी बनाए जा सकते हैं। कोर्ट ने पूरी प्रक्रिया छह महीने के अंदर पूरी करने के निर्देश दिए हैं।
क्या है मामला
सिविल सेवा परीक्षा के कई छात्रों ने ओबीसी नॉन-क्रीमी लेयर श्रेणी के तहत आरक्षण का दावा किया था। कार्मिक विभाग ने माता-पिता के वेतन के आधार पर उन्हें क्रीमी लेयर का माना और आरक्षण का लाभ देने से इनकार कर दिया था। इनमें से अधिकांश के माता-पिता सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, बैंकों या इसी तरह के संस्थानों के कार्यरत थे। इस मामले में सरकार के फैसले के खिलाफ छात्रों ने पहले केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण और बाद में हाईकोर्ट गए। इस मामले में दिल्ली, केरल और मद्रास हाईकोर्ट ने छात्रों के हक में फैसला दिया था। इसके खिलाफ केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की थी।
ओबीसी छात्रों के दावों पर विचार करने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग को इस फैसले में बताए गए सिद्धांतों के अनुसार प्रतिवादी उम्मीदवारों और मामले में हस्तक्षेप करने वाले छात्रों के दावों पर विचार करने का निर्देश दिया। पीठ ने इन ओबीसी उम्मीदवारों के माता-पिता की नौकरी से होने वाली आय को शामिल किए बिना क्रीमी लेयर टेस्ट लागू करने का आदेश दिया है। इसके लिए छह माह का वक्त दिया है। पीठ ने कहा कि यह देखते हुए कि सरकार ने पहले एक संसदीय कमेटी के सामने संकेत दिया था कि प्रभावित उम्मीदवारों को शामिल करने के लिए अतिरिक्त पद बनाए जा सकते हैं, कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि जहां जरूरी हो, वहां ऐसे पद सृजित किए जाएं।
8 लाख से अधिक वार्षिक आय वाले क्रीमी लेयर में
क्रीमी लेयर शब्द का इस्तेमाल ओबीसी समुदाय के उन लोगों के लिए किया जाता है, जो आर्थिक व सामाजिक रूप से काफी समृद्ध हो चुके हैं। क्रीमी लेयर अवधारणा की शुरुआत 1992 के प्रसिद्ध इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार मामले के बाद हुई थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण को तो बरकरार रखा था, लेकिन संपन्न वर्ग को इससे बाहर रखने का आदेश दिया था। इसके बाद 1993 में सरकार ने इसे लागू करने के नियम बनाए थे। वर्तमान नियमों के अनुसार, यदि किसी ओबीसी परिवार की वार्षिक आय 8 लाख रुपये से अधिक है, तो उसे क्रीमी लेयर में माना जाता है। ऐसे उम्मीदवार सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के हकदार नहीं होते।
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Pankaj Vijayपंकज विजय| वरिष्ठ पत्रकार
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