
NEET : MBBS में दाखिला लेने गए छात्र को ऑफिस में किया बंद, BAMS पात्र को चिपकाई महंगी MBBS सीट, जांच के आदेश
महाराष्ट्र में मेडिकल कॉलेजों में दाखिले को लेकर काफी शिकायतें सामने आ रही हैं। एक छात्र ने आरोप लगाया है उसे मेडिकल कॉलेज के ऑफिस में शाम तक बंद रखा गया। फोन ले लिया गया। और भी कई स्टूडेंटस की शिकायतें सामने आई हैं।
नीट यूजी 2025 परीक्षा में 720 में से 420 अंक, राज्य में 13978 वीं रैंक और एससी कैटेगरी रैंक 855 , गौरव मांजरेकर (बदला हुआ नाम) को लग रहा था काउंसलिंग के दूसरे या तीसरे राउंड में उसे एमबीबीएस सीट मिल ही जाएगी। 19 साल का यह लड़का जब सिंधुदुर्ग के एसएसपीएम मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने गया तो उसे लगा यही वो जगह है जहां उसका डॉक्टर बनने का ख्वाब हकीकत में बदलेगा। लेकिन उसका सपना जब चकनाचूर हो गया है जब उसे फोन छीनकर मेडिकल कॉलेज ऑफिस में बंद कर दिया गया। इस बदसलूकी के बाद सिस्टम में उसका भरोसा हिल गया।

टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित खबर के मुताबिक गौरव को नीट यूजी स्टेट काउंसलिंग के दोनों राउंड में एक ही कॉलेज अलॉट किया गया था। हर बार मेडिकल कॉलेज ने हॉस्टल और मेस सुविधाओं के लिए 9.2 लाख रुपये की फीस मांगी। लेकिन जब उसने आधिकारिक फीस रेगुलेटरी अथॉरिटी (एफआए) की वेबसाइट देखी, तो वहां सिर्फ 50000 रुपये का फीस पेमेंट का जिक्र था। एडमिशन के समय एफआरए की ओर से यही स्वीकृत राशि थी। जब वह 50 हजार रुपये का डिमांड ड्राफ्ट लेकर मेडिकल कॉलेज पहुंचा तो कॉलेज के अधिकारियों ने उसे कथित तौर पर 8.7 लाख रुपये का चेक देने के लिए मजबूर किया। उसने बताया कि उसे कहा गया, 'कोई भी बाहर खड़ा नहीं रह सकता। यहां यही नियम है।'
सीईटी के नियमों के उलट है मेडिकल कॉलेजों का व्यवहार
महाराष्ट्र सीईटी सेल के नियम साफ कहते हैं कि हॉस्टल की सुविधा लेना अनिवार्य नहीं, ऑप्शनल है। लेकिन जब गौरव ने लिखित रूप से फीस का ब्रेकअप मांगा, तो अधिकारियों ने देने से इनकार कर दिया और उसे किसी भी तरह का सबूत रिकॉर्ड करने पर रोक दी। दोपहर बाद स्थिति और भयावह हो गई। टीओआई की रिपोर्ट के मुताबिक छात्र ने बताया, 'शाम 4.30 बजे तक हमें ऑफिस में बैठाया रखा गया, फोन ले लिए गए और सीईटी सेल को एक ईमेल भेजने के लिए मजबूर किया गया। ईमेल में लिखा गया था कि व्यक्तिगत कारणों से दाखिला नहीं लेना चाहता।' इसके बाद ही हमें जाने दिया गया।'
जांच के लिए समिति गठित
जब सिंधुदुर्ग से निकला तो गौरव ने एक और ईमेल भेजा। इस बार उसने बताया कि पिछला ईमेल दबाव में भेजा गया था। सीईटी सेल के अधिकारियों ने कहा कि वे गौरव के सभी ईमेल देखेंगे और आगे की कार्रवाई तय करेंगे। गौरव की शिकायत के बाद राज्य द्वारा नियुक्त दो सदस्यीय समिति 2025-26 के मेडिकल दाखिलों में कथित अनियमितताओं की जांच के लिए एसएसपीएम मेडिकल कॉलेज का दौरा करेगी। इस समिति में कोल्हापुर स्थित राजर्षि छत्रपति शाहू राजकीय मेडिकल कॉलेज की डॉ. अनीता परितकर और डॉ. प्रदीप रजत शामिल हैं। उन्हें जांच के बाद राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है।
खबर के मुताबिक एसएसपीएम मेडिकल कॉलेज की डीन डॉ. वंदना गावपांडे ने इस मामले पर कोई जवाब नहीं दिया है। गौरव की यह कोई अकेली कहानी नहीं है। अमरावती के एक निजी कॉलेज में सीट पाने वाले एक अन्य मेडिकल अभ्यर्थी ने कहा कि उसे गेट के अंदर भी नहीं जाने दिया गया।
बीएएमएस में दाखिला चाह रही लड़की को जबरन महंगी एमबीबीएस सीट
लातूर की बीएएमएस अभ्यर्थी को लग रहा था कि उसे अब दाखिला मिल ही जाएगा, और आगे धक्के नहीं खाने पड़ेंगे। वह अपनी बीएएमएस सीट पहले ही पक्की कर चुकी थी, अपने मूल दस्तावेज जमा कर चुकी थी और अपना रिटेंशन फॉर्म जमा कर चुकी थी, लेकिन एमबीबीएस के लिए तीसरी इंस्टीट्यूशनल कोटा (आईक्यू) सूची में अपना नाम देखकर वह दंग रह गई। उसने सीईटी सेल को लिखा, 'मैंने केवल राज्य कोटे के तहत आवेदन किया था, लेकिन ऐसा लगता है कि किसी ने बिना मेरी जानकारी के आईक्यू कोटे के विकल्प भर दिए हैं और मेरी ओर से 5,000 रुपये का भुगतान कर दिया है। मैं आईक्यू कोटे के तहत दाखिला नहीं लेना चाहती। इसलिए, मैं आपसे निवेदन करती हूं कि मेरा बीएएमएस दाखिला आगे भी जारी रखें और इस बात की जांच करें कि आईक्यू कोटे के विकल्प कैसे और किसने भरे, और इस मामले में उचित कार्रवाई करें।'
छात्रा का कहना है कि उसके बाद एमबीबीएस सीट की फीस चुकाने का कोई साधन नहीं है, मैनेजमेंट या इंस्टीट्यूशनल कोटे के तहत ली जाने वाली तीन गुना राशि की तो बात ही छोड़ दीजिए, उसे सबसे ज्यादा डर उस बीएएमएस सीट को खोने का था जिसे उसने हक से हासिल किया था। उसने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, "जब मैंने अपना रिटेंशन फॉर्म भरा तो कॉलेज ने मुझसे मेरी लॉगिन जानकारी मांगी और मुझे लगा कि यह प्रक्रिया का हिस्सा है। जब मामला सीईटी सेल तक पहुचा, तो अधिकारियों ने इसे उम्मीदवार की ओर से एक गलती बताकर खारिज कर दिया।'
क्या कहते हैं काउंसलर
हालांकि स्टूडेंट काउंसलर सचिन बांगड़ इससे सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा, "मामले की फ़ोरेंसिक जांच से यह स्पष्ट हो जाएगा कि उनकी ओर से फॉर्म किसने भरा था। यह सिर्फ इस छात्रा के मामले में नहीं है। इंस्टीट्यूशनल कोटे के तहत सीटें आवंटित किए गए इतने सारे छात्र दाखिला क्यों नहीं ले रहे हैं? जाहिर है, ऐसे छात्र हैं जिनकी इन सीटों में कोई दिलचस्पी नहीं है।' उन्होंने आगे कहा कि जिन आईपी एड्रेस से ये फ़ॉर्म भरे गए थे और 5,000 रुपये की फ़ीस जमा करने के लिए जिन खातों का इस्तेमाल किया गया था, उनकी फॉरेंसिक साइबर जाच से "मामले का खुलासा होगा।
3 राउंड के बाद भी सीटें खाली
इंस्टीट्यूशनल कोटे के तहत दाखिले के 3 राउंड के बाद भी सीटें खाली रहीं। मंगलवार तीसरे दौर का आखिरी दिन था और राज्य भर से कॉलेजों द्वारा अपने गेट बंद रखने और छात्रों के बाहर फंसे रहने की खबरें आईं। अभिभावकों की प्रतिनिधि सुधा शेनॉय ने कहा, 'सिंधुदुर्ग स्थित एसएसपीएम और पालघर स्थित वेदांता जैसे कुछ मेडिकल कॉलेज इस चीज को लेकर बदनाम हैं - सीईटी सेल द्वारा उम्मीदवारों को सीटें आवंटित किए जाने के बावजूद वे छात्रों को कैंपस के अंदर आने को लेकर परेशान करते रहते हैं।'
कितनी सीटें खालीं
राउंड 3 के बाद राज्य में एमबीबीएस की 387 सीटें खाली रह गई हैं। इनमें 350 प्राइवेट और 37 सरकारी हैं। बीडीएस की 508 सीटें खाली हैं जिसमें 26 सरकारी और 482 प्राइवेट हैं।





