
NEET PG: प्राइवेट मेडिकल कॉलेज माफियाओं को फायदा होगा, नीट पीजी कटऑफ घटाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका,दिए ये तर्क
नीट पीजी कट ऑफ कम करने के खिलाफ याचिका में कहा गया है कि यह कदम प्राइवेट मेडिकल कॉलेज माफियाओं को फायदा पहुंचाता है। यह कदम साफ तौर पर मेडिकल सीटों की नीलामी का रास्ता खोल रहा है, जहां मेरिट की जगह पैसे ले लेंगे। मरीजों की सेहत से खिलवाड़ होगा।
नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस इन मेडिकल साइंसेज द्वारा नीट-पीजी 2025-26 के लिए क्वालिफाइंग कट-ऑफ पर्सेंटाइल कम किए जाने के खिलाफ शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। याचिका में कहा कि पोस्टग्रेजुएशन मेडिकल शिक्षा के लिए क्वालिफाइंग मानकों में कमी न सिर्फ मनमाना है बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है। डॉ. सौरभ कुमार और डॉ. लक्ष्य मित्तल एवं अन्य की ओर से दाखिल याचिका में दावा किया गया कि दाखिले के मानकों को कम करने से मरीजों की सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और मेडिकल पेशे की अखंडता को खतरा है। इसमें कहा गया कि चिकित्सा कोई सामान्य पेशा नहीं है, यह सीधे तौर पर मानव जीवन, शारीरिक अखंडता और गरिमा से जुड़ा है। राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड ने पीजी मेडिकल की खाली सीटों को भरने के लिए क्वालिफाइंग कट ऑफ में कमी की है।
याचिका में कहा गया कि कट ऑफ कम करना योग्यता को एक मानदंड खत्म करने के समान है। यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट (UDF) के प्रेसिडेंट डॉ. लक्ष्य मित्तल ने कहा, 'हमने सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल दायर की है, जिसमें नीट पीजी कट ऑफ को घटाकर 800 में से -40 मार्क्स करने के चौंकाने वाले फैसले को चुनौती दी गई है। यह फैसला अचानक लिया गया नहीं लगता। यह एक पूरी प्लानिंग और एक ऐसे सिस्टम का हिस्सा लगता है जो प्राइवेट मेडिकल कॉलेज माफियाओं को फायदा पहुंचाता है। यह कदम साफ तौर पर मेडिकल सीटों की नीलामी का रास्ता खोल रहा है, जहां मेरिट की जगह पैसे ले लेंगे। नेगेटिव मार्क्स वाले डॉक्टरों को पीजी ट्रेनिंग में शामिल होने देना न सिर्फ मेरिट को खत्म करता है, बल्कि मरीजों की सुरक्षा के लिए भी खतरा है। मेडिकल एजुकेशन के स्टैंडर्ड में यह गिरावट मंजूर नहीं है और इसीलिए हमने मेरिट, नैतिकता और मरीजों की जान बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।'
एफएआईएमए के चीफ पैट्रन रोहन कृष्णन ने कहा, 'देरी से काउंसलिंग, बॉन्ड ट्रैप और करोड़ों रुपये की प्राइवेट फीस के कारण पीजी सीटें खाली हैं, मेरिट की कमी के कारण नहीं। स्टैंडर्ड कम करने से पॉलिसी की नाकामी ठीक नहीं होगी। आज कम काबिलियत काम मतलब कल मरीजो के लिए खतरा। यह मेरिट का मुद्दा नहीं है, यह पॉलिसी की नाकामी है। बार-बार देरी से मिड-रैंकर्स ज़्यादा फीस वाली प्राइवेट सीटों के बजाय इंतजार करने पर मजबूर हो रहे हैं। गलत काउंसलिंग टाइमलाइन है। मनमानी बॉन्ड पॉलिसी। गैर-यूनिफॉर्म, अवैज्ञानिक स्टेट बॉन्ड डॉक्टरों को PG सीटों से दूर भगा रहे हैं।
क्लिनिकल पीजी सीटों की कीमत करोड़ों रुपये है। ज़्यादातर डॉक्टरों की पहुंच से बाहर है। अगर ज़्यादातर खाली सीटें नॉन-क्लिनिकल थीं, तो सभी ब्रांचों में कट-ऑफ क्यों कम किया गया, जिसमें क्लिनिकल स्पेशियलिटी भी शामिल हैं जो मरीज़ों की ज़िंदगी पर असर डालती हैं। –40 / 800 स्कोर करने वाले डॉक्टर पहले से ही MBBS-रजिस्टर्ड प्रैक्टिशनर हैं। यह MBBS ट्रेनिंग और इवैल्यूएशन सिस्टम के बारे में क्या कहता है। खाली सीटों के लिए पॉलिसी में सुधार की ज़रूरत है — काबिलियत कम करने की नहीं।

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Pankaj Vijayपंकज विजय| वरिष्ठ पत्रकार
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