इससे डॉक्टरों की गुणवत्ता कम नहीं होती; NEET PG कटऑफ घटाने पर सुप्रीम कोर्ट में बोली सरकार

Feb 23, 2026 04:56 pm ISTHimanshu Tiwari लाइव हिन्दुस्तान
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केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि NEET PG का कटऑफ घटाने से मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता पर असर नहीं पड़ता, क्योंकि डॉक्टर बनने की योग्यता एमबीबीएस से तय होती है, न कि पीजी प्रवेश परीक्षा से।

इससे डॉक्टरों की गुणवत्ता कम नहीं होती; NEET PG कटऑफ घटाने पर सुप्रीम कोर्ट में बोली सरकार

देश में मेडिकल शिक्षा को लेकर चल रही बहस के बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बड़ा पक्ष रखा है। सरकार ने साफ शब्दों में कहा है कि नीट पीजी का कटऑफ कम करने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि डॉक्टरों का स्तर गिराया जा रहा है। सरकार का कहना है कि यह परीक्षा किसी छात्र की डॉक्टर बनने की योग्यता तय करने के लिए नहीं होती, बल्कि इसका उद्देश्य केवल स्नातकोत्तर यानी MD और MS जैसी सीमित सीटों के लिए छात्रों की आपसी रैंकिंग तय करना होता है।

डॉक्टर बनने की असली परीक्षा MBBS में ही हो जाती है: सरकार

सरकार ने अदालत को बताया कि NEET-PG यह जांचने के लिए नहीं है कि कोई व्यक्ति डॉक्टर बनने लायक है या नहीं। यह योग्यता पहले ही उस समय तय हो जाती है जब छात्र MBBS पूरा करता है। एमबीबीएस के दौरान छात्र साढ़े चार साल की पढ़ाई और एक साल की अनिवार्य इंटर्नशिप करता है। उसे थ्योरी और प्रैक्टिकल दोनों में कम से कम 50 प्रतिशत अंक अलग अलग हासिल करने होते हैं। यानी NEET-PG देने वाले सभी उम्मीदवार पहले से ही प्रशिक्षित और प्रमाणित डॉक्टर होते हैं।

NEET-PG का असली मकसद क्या है

सरकार ने स्पष्ट किया कि यह परीक्षा केवल एक मेरिट सूची बनाने का माध्यम है ताकि उपलब्ध पीजी सीटों का निष्पक्ष बंटवारा किया जा सके। परीक्षा के अंक छात्रों के आपसी प्रदर्शन पर आधारित होते हैं, न कि इस पर कि कोई डॉक्टर इलाज करने में सक्षम है या नहीं।

नए कटऑफ ने छेड़ी बहस

NEET PG 2026 के लिए कटऑफ में बड़ा बदलाव किया गया है। जनरल और ईडब्ल्यूएस वर्ग के लिए कटऑफ 103, सामान्य दिव्यांग श्रेणी के लिए 90 और SC, ST, OBC वर्ग के लिए माइनस 40 तक निर्धारित किया गया है। कटऑफ में इतनी कमी आने के बाद कुछ लोगों ने मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी, जिस पर सरकार ने अदालत में जवाब दिया।

मरीजों की सुरक्षा पर सरकार का तर्क

सरकार ने कहा कि पीजी पढ़ाई के दौरान डॉक्टर स्वतंत्र रूप से काम नहीं करते, बल्कि वरिष्ठ विशेषज्ञों की निगरानी में प्रशिक्षण लेते हैं। तीन साल की इस पढ़ाई के अंत में उन्हें फिर से परीक्षा पास करनी होती है, जिसमें थ्योरी और प्रैक्टिकल दोनों में न्यूनतम 50 प्रतिशत अंक जरूरी होते हैं। इस तरह विशेषज्ञ डॉक्टर बनने से पहले कई स्तरों पर उनकी क्षमता की जांच होती है।

आखिर कटऑफ घटाने की जरूरत क्यों पड़ी

सरकार ने बताया कि देशभर में बड़ी संख्या में पीजी मेडिकल सीटें खाली रह जा रही थीं। 2025-26 सत्र में लगभग 70 हजार सीटें उपलब्ध थीं, जबकि परीक्षा में 2.24 लाख से ज्यादा छात्र शामिल हुए थे। कटऑफ घटाने के बाद एक लाख से ज्यादा अतिरिक्त उम्मीदवार काउंसलिंग के तीसरे चरण के लिए पात्र हो पाए।

पहले भी लिया जा चुका है ऐसा फैसला

यह पहला मौका नहीं है जब कटऑफ कम किया गया हो। 2023 में भी सीटें खाली रहने से बचाने के लिए कटऑफ शून्य तक किया गया था। सरकार ने यह भी कहा कि मेडिकल सीटें सार्वजनिक धन से बनाई जाती हैं। अगर ये सीटें खाली रह जाती हैं तो संसाधनों की बर्बादी होती है और स्वास्थ्य सेवाओं में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी बनी रहती है।

ज्यादा विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार करना है लक्ष्य

सरकार के अनुसार, कटऑफ में बदलाव का उद्देश्य मानकों को गिराना नहीं बल्कि ज्यादा से ज्यादा विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार करना है, ताकि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत हो सके। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि सीटों का आवंटन अब भी मेरिट और छात्रों की पसंद के आधार पर ही किया जाता है।

Himanshu Tiwari

लेखक के बारे में

Himanshu Tiwari

शॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।

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