क्या 9वीं की किताब से हटा दी गई संविधान की प्रस्तावना? NCERT ने खुद बताया सच

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एनसीईआरटी ने 9वीं कक्षा की किताब से प्रस्तावना और 'सेक्युलर' जैसे शब्द हटाए जाने की खबरों को भ्रामक बताया है। नए सिलेबस के तहत ये विषय अब अलग-अलग कक्षाओं में बांटे गए हैं।

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बीते कुछ दिनों से शिक्षा जगत और सियासी गलियारों में एक खबर ने खासी हलचल मचा रखी है। सोशल मीडिया से लेकर अखबारों तक में यह चर्चा जोरों पर थी कि नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (एनसीईआरटी) ने कक्षा 9 की सामाजिक विज्ञान की नई किताब से संविधान की प्रस्तावना और 'धर्मनिरपेक्ष' (सेक्युलर) जैसे अहम शब्दों को पूरी तरह से हटा दिया है। इन दावों के सामने आते ही बहस का दौर शुरू हो गया। हर कोई यह सवाल पूछ रहा था कि आखिर हमारे बच्चों की किताबों से इन बुनियादी बातों को क्यों गायब किया जा रहा है? लेकिन, अब इस पूरे विवाद पर एनसीईआरटी के सूत्रों ने अहम जानकारी दी है। उन्होंने साफ कर दिया है कि ये सारी खबरें पूरी तरह से भ्रामक हैं और सच्चाई इससे कोसों दूर है।

दरअसल, कई मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा जोर-शोर से किया गया कि 9वीं कक्षा की सोशल साइंस की किताब में एक तरफ जहां आपातकाल के दौर पर एक नया हिस्सा जोड़ा गया है, वहीं संविधान की प्रस्तावना वाले पूरे चैप्टर को ही गायब कर दिया गया है। इतना ही नहीं, यह भी कहा जा रहा था कि पिछली किताबों में जिन 'सेक्युलर' (धर्मनिरपेक्ष) और 'सोशलिस्ट' (समाजवादी) शब्दों को विस्तार से समझाया गया था, उनका नई किताब में कहीं जिक्र तक नहीं है। इन दावों ने उन शिक्षाविदों की चिंता बढ़ा दी थी जो मानते हैं कि स्कूली स्तर पर ही बच्चों को इन संवैधानिक मूल्यों की जानकारी मिलना बेहद जरूरी है।

प्रस्तावना को हटाए जाने का दावा गलत

समाचार एजेंसी एएनआई ने एनसीईआरटी से जुड़े उच्च सूत्रों के हवाले से इस मसले पर तस्वीर बिल्कुल साफ की है। सूत्रों का कहना है कि संविधान की प्रस्तावना को हटाए जाने का दावा एकदम गलतफहमी पैदा करने वाला है। असल में, किताबों से कुछ भी हटाया नहीं गया है। सच्चाई यह है कि नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क (एनसीएफ) के तहत सिलेबस को एक नए और बेहतर तरीके से डिजाइन किया गया है। इसका बुनियादी मकसद बच्चों पर एक ही क्लास में पढ़ाई का भारी-भरकम बोझ डालने के बजाय, अहम विषयों को अलग-अलग कक्षाओं में बांटना है। इस तरह बच्चे चीजों को सिर्फ रटने के बजाय उन्हें गहराई से समझ सकेंगे।

छात्रा ज्यादा गहराई और परिपक्वता के साथ पढ़ सकेंगे: एनसीईआरटी

अगर बात प्रस्तावना की करें, तो एनसीईआरटी के सूत्रों ने इस बात पर खास जोर दिया है कि संविधान की प्रस्तावना आज भी सभी कक्षाओं की नई किताबों के शुरुआती पन्नों पर शान से छपी हुई है। चाहे वह सोशल साइंस की किताब हो या कोई और, प्रस्तावना को वहां से बिल्कुल नहीं हटाया गया है। जहां तक इसके विस्तार से अध्ययन की बात है, तो सिलेबस के नए ढांचे के तहत प्रस्तावना पर एक विस्तृत थीम अब 10वीं कक्षा के सिलेबस का हिस्सा बना दी गई है। यानी बच्चे अब इसके बारे में 10वीं में ज्यादा गहराई और परिपक्वता के साथ पढ़ सकेंगे।

'सेक्युलर' और 'सोशलिस्ट' जैसे शब्दों पर उठे विवाद को लेकर भी स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट की गई है। अधिकारियों का कहना है कि धर्मनिरपेक्षता, न्याय, स्वतंत्रता और समाजवाद जैसे संवैधानिक मूल्यों को 6ठीं से 8वीं कक्षा के बीच ही बच्चों को पढ़ा दिया जाता है। खासतौर पर 7वीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की किताब में इन मुद्दों को काफी अच्छे से शामिल किया गया है। इसके बाद, जब बच्चा 10वीं क्लास में पहुंचता है, तो इन विषयों को और भी ज्यादा बारीकी और तफ्सील के साथ पढ़ाया जाएगा। इसका सीधा सा मतलब यह है कि पढ़ाई का क्रम अब ज्यादा तार्किक हो गया है।

इस पूरे बदलाव के पीछे की सोच को समझाते हुए एनसीईआरटी ने बताया कि नई किताबें सोशल साइंस के अलग-अलग विषयों को आपस में जोड़कर पढ़ाने के मकसद से तैयार की गई हैं। इतिहास, भूगोल और नागरिक शास्त्र को अब अलग-अलग खानों में बांटकर देखने के बजाय, एक समग्र नजरिए से पेश किया जा रहा है। ऐसे में नई किताबों की तुलना पुरानी किताबों से पन्ना-दर-पन्ना करना बिल्कुल भी जायज नहीं है। पुरानी किताबों का नजरिया अलग था और नई किताबों का कंटेंट और पढ़ाने का तरीका दोनों ही काफी अलग और आधुनिक हैं।

कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह है कि हमारे संविधान के जो भी मूल स्तंभ हैं, उन्हें सिलेबस से बाहर नहीं किया गया है। बस उन्हें पढ़ाने का तरीका और कक्षाएं बदल गई हैं। एनसीईआरटी की इस सफाई के बाद उम्मीद है कि सिलेबस को लेकर उठ रहे सारे सवालों पर फिलहाल विराम लग जाएगा और अभिभावकों के साथ-साथ छात्रों की भी चिंता दूर होगी। शिक्षा में बदलाव एक सतत प्रक्रिया है, और अगर यह बदलाव बच्चों की नींव मजबूत करने की दिशा में है, तो इसे एक सकारात्मक नजरिए से ही देखा जाना चाहिए।

Himanshu Tiwari

लेखक के बारे में

Himanshu Tiwari

शॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।

परिचय एवं अनुभव
हिमांशु तिवारी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। बीते 10 सालों से वह लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस वक्त लाइव हिन्दुस्तान में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और बीते 3 साल से वह इस संस्थान से जुड़े हैं। शिक्षा, करियर, नौकरियों, नीट, जेईई, बैंकिंग, एसएससी और यूपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी और आरपीएससी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी खास पकड़ मानी जाती है। हिमांशु ने साल 2016 में पत्रकारिता की शुरुआत एबीपी न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म से किया। इसके बाद वह इंडिया टीवी और जी न्यूज (डीएनए) जैसे बड़े न्यूज चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी हिस्सा रह चुके हैं। हिमांशु तिवारी सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक सजग पाठक और आजीवन विद्यार्थी हैं, उनकी यही खूबी उनके कार्य में परिलक्षित होती है। उनका मानना है कि इन परीक्षाओं से जुड़ी सही और समय पर जानकारी लाखों युवाओं के भविष्य को दिशा दे सकती है, इसलिए वह इस बीट को सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।

लेखन की सोच और मकसद
हिमांशु के लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ सूचना देना नहीं है, बल्कि पाठक को सोचने की जगह देना भी है। खासकर करियर और शिक्षा के क्षेत्र में वह यह मानते हैं कि एक गलत या अधूरी खबर किसी छात्र की पूरी तैयारी को भटका सकती है। इसलिए उनके लेखन में सरल भाषा, ठोस तथ्य और व्यावहारिक नजरिया हमेशा प्राथमिकता में रहता है। उनकी कोशिश रहती है कि पाठक को सिर्फ खबर की जानकारी ही न हो, बल्कि यह भी समझ आए कि उस खबर का उसके जीवन और भविष्य से क्या रिश्ता है।

शिक्षा और अकादमिक पृष्ठभूमि
हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।

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काम से इतर हिमांशु की गहरी रुचि समकालीन इतिहास, समानांतर सिनेमा और दर्शन में रही है। राजनीति और विदेश नीति पर पढ़ना-लिखना उन्हें विशेष रूप से पसंद है। इसी रुचि के चलते उन्होंने दो लोकसभा चुनावों और दर्जनों विधानसभा चुनावों की कवरेज की, जहां राजनीति को उन्होंने बेहद नजदीक से देखा और समझा। चुनावी आंकड़ों की बारीकियां, नेताओं के भाषण, जमीनी मुद्दे और जनता की प्रतिक्रियाएं, इन सभी पहलुओं को समेटते हुए उन्होंने सैकड़ों खबरें और विश्लेषण तैयार किए, जो राजनीतिक प्रक्रिया की गहरी समझ को दर्शाते हैं।

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