MBBS : एमबीबीएस के बीच में लड़की ने लिया 2 साल का ब्रेक, अयोग्य होने पर कोर्ट ने दी बड़ी राहत, क्या है नियम
हाईकोर्ट ने साफ किया है कि एमबीबीएस की पढ़ाई में वास्तविक कारणों से लिया गया ब्रेक छात्र की शैक्षणिक योग्यता का पैमाना नहीं माना जा सकता और इसे MBBS की निर्धारित समय-सीमा की गणना में शामिल नहीं किया जाना चाहिए।

देश में मेडिकल शिक्षा की देखरेख करने वाली संस्था एनएमसी यानी नेशनल मेडिकल कमिशन के नियम के मुताबिक एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे छात्रों को अपना फर्स्ट ईयर दाखिले के चार साल के भीतर पास करना होता है। लेकिन अगर किसी विद्यार्थी को कुछ उचित वजहों से फर्स्ट ईयर के दौरान पढ़ाई से लंबा ब्रेक लेना पढ़ जाए तो क्या होगा। इस संबंध में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने हाली ही में एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी छात्र ने पैसों की तंगी या गंभीर स्वास्थ्य समस्या या अन्य वास्तविक और मजबूरी वाले कारणों से पढ़ाई बीच में छोड़ी है तो उस अवधि को एमबीबीएस फर्स्ट ईयर प्रोफेशनल परीक्षा पास करने की 4 साल की सीमा में नहीं जोड़ा जा सकता।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने कहा कि वाजिब कारणों से अगर कोई छात्र ब्रेक लेता है कि तो उस समय को 'ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन रेगुलेशंस 2019' (GMER) के तहत कोर्स की पहली प्रोफेशनल परीक्षा पास करने के लिए तय 4 साल की समय-सीमा की गिनती में शामिल नहीं किया जा सकता। जस्टिस न्यापति विजय की एकल पीठ ने कहा कि मेडिकल शिक्षा नियमों की ऐसी व्याख्या नहीं की जा सकती जिससे मजबूरी में पढ़ाई छोड़ने वाले छात्र बिना किसी शैक्षणिक कमी के ही अयोग्य घोषित हो जाएं। यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने एक MBBS छात्रा को अपना कोर्स जारी रखने की इजाजत दी। कोर्ट ने माना कि रेगुलेशंस का शाब्दिक अर्थ निकालने से उन स्टूडेंट्स को बिना वजह अयोग्य ठहराया जा सकता है, जिनके अस्थायी ब्रेक का उनकी एकेडमिक काबिलियत या क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता।
क्या है एनएमसी का नियम
'ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन रेगुलेशंस, 2019' के रेगुलेशन 7.7 और 11.2.7(a)(2) के तहत स्टूडेंट को एडमिशन के चार साल के अंदर और ज्यादा से ज्यादा चार कोशिशों में पहली प्रोफेशनल MBBS परीक्षा पास करनी होती है।
क्या है मामला
याचिकाकर्ता की बेटी ने 2020-21 शैक्षणिक सत्र में डॉ. एनटीआर यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज से संबद्ध मेडिकल कॉलेज में MBBS कोर्स में दाखिला लिया था। लेकिन एडमिशन के बाद परिवार अचानक गंभीर आर्थिक संकट में पड़ गया। पैसों की तंगी के कारण उसे करीब दो वर्ष से अधिक समय तक पढ़ाई से ब्रेक लेना पड़ा। बाद में विश्वविद्यालय ने नवंबर 2024 में उसे दोबारा पढ़ाई शुरू करने की इजाजत दे दी। लेकिन जब उसने 2025 की फर्स्ट प्रोफेशनल MBBS परीक्षा में बैठने की अनुमति मांगी तो विश्वविद्यालय ने यह कहते हुए मना कर दिया कि प्रवेश के चार वर्ष पूरे हो चुके हैं और वह जीएमईआर 2019 नियम के तहत परीक्षा देने की पात्र नहीं है।
कोर्ट ने छात्रा को दी बड़ी राहत
हाईकोर्ट ने कहा कि मेडिकल शिक्षा नियमों का मकसद उन छात्रों की पहचान करना है जो पढ़ाई में कमजोर होने के चलते तय समय में परीक्षा पास नहीं कर पाते। लेकिन यदि किसी छात्र ने आर्थिक कठिनाई या स्वास्थ्य जैसी वास्तविक मजबूरी के कारण पढ़ाई रोकी है, तो इसका उसकी शैक्षणिक क्षमता या काबिलियत से कोई संबंध नहीं है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सामान्य परिस्थितियों में कोई भी छात्र नीट यूजी ( NEET UG Exam ) जैसी कठिन परीक्षा पास करके MBBS में दाखिला लेने के बाद स्वेच्छा से पढ़ाई बीच में नहीं छोड़ेगा। कोर्ट की राय में ऐसे जायज वजह वाले मामलों में ब्रेक की अवधि को चार साल की अवधि की गिनती में शामिल नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि ब्रेक की अवधि का स्टूडेंट की काबिलियत या क्षमता और रेगुलेशंस के मकसद से कोई लेना-देना नहीं है।
कानून को शब्दश: न लिया जाए
कोर्ट ने कहा कि अगर ऊपर बताए गए रेगुलेशंस को शाब्दिक अर्थ में समझा जाए, तो इससे उन स्टूडेंट्स को अयोग्य ठहराया जा सकता है जिन्होंने मजबूरन पढ़ाई से ब्रेक लिया है, और ऐसा नज़रिया रेगुलेशंस को अतार्किक बना देगा। जब भी किसी रेगुलेशन या कानून को समझा जाता है, तो अतार्किकता से बचना चाहिए और उसे संवैधानिक रूप से सही बनाने के लिए तार्किकता को ध्यान में रखना चाहिए।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि पढ़ाई में यह गैप सिर्फ आर्थिक तंगी की वजह से आया था और इसका छात्रा की पढ़ाई-लिखाई की काबिलियत से कोई लेना-देना नहीं था। चूंकि यूनिवर्सिटी ने खुद उन्हें कोर्स फिर से शुरू करने की इजाजत दी थी इसलिए गैप की अवधि को तय चार साल की समय-सीमा में नहीं गिना जाना चाहिए था। यूनिवर्सिटी और नेशनल मेडिकल कमीशन ने तर्क दिया कि रेगुलेशन 7.7 अनिवार्य है और गैप की अवधि भी तय चार साल की अवधि का ही हिस्सा मानी जाएगी, जिससे छात्रा कोर्स जारी रखने के लिए अयोग्य हो जाती है।
यूनिवर्सिटी के तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि रेगुलेशन का मकसद, जैसा कि रेगुलेशन 2 में बताया गया है, ऐसे छात्रों की पहचान करना है जो पढ़ाई में पिछड़ रहे हैं और तय समय-सीमा के भीतर MBBS कोर्स पूरा नहीं कर पा रहे हैं। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई में गैप लिया था, जिसका उनकी पढ़ाई-लिखाई की काबिलियत पर कोई असर नहीं पड़ा था। साथ ही रेगुलेशन का शाब्दिक अर्थ निकालने से ऐसे छात्र गलत तरीके से अयोग्य हो जाएंगे जो मजबूरियों की वजह से अपनी पढ़ाई छोड़ देते हैं।
छात्रा के एग्जाम में आए अच्छे अंक
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि अपने अंतरिम आदेश के तहत छात्रा परीक्षा में शामिल हुई थी, अच्छे अंकों के साथ फर्स्ट प्रोफेशनल MBBS परीक्षा पास की थी और कोर्स के दूसरे साल को पूरा करने के करीब थी। कोर्ट ने माना कि इस स्टेज पर उन्हें पढ़ाई जारी रखने का मौका न देना गलत होगा। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए विश्वविद्यालय का फैसला रद्द कर दिया और छात्रा को MBBS की पढ़ाई जारी रखने का अधिकार दिया।


