MBBS : एमबीबीएस प्रवेश परीक्षा में नकल का कलंक झेल रही डॉक्टर को 14 साल बाद मिलेगी डिग्री, कोर्ट से बड़ी राहत
गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा है कि केवल किसी लंबित आपराधिक मामले के आधार पर किसी की ऑरिजनल एमबीबीएस डिग्री बेमियादी समय तक नहीं रोकी जा सकती जब तक उसके खिलाफ दोष सिद्ध न हो जाए।

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने उस महिला डॉक्टर को बड़ी राहत दी है जिसे मेडिकल प्रवेश परीक्षा में नकल के आरोप के चलते मेडिकल कॉलेज ने 14 सालों से एमबीबीएस की ऑरिजनल डिग्री नहीं दी है। इस महिला डॉक्टर ने एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद नियमानुसार इंटर्नशिप पूरी की और फिर डॉक्टरी करने के लिए उसे मेडिकल काउंसिल में रजिस्ट्रेशन भी मिल गया। लेकिन मेडिकल एंटेंस में नकल के केस में फंसे होने के चलते उसे आज तक मेडिकल कॉलेज ने उसकी ऑरिजनल डिग्री नहीं सौंपी। डॉक्टर के पक्ष में फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि किसी मेडिकल ग्रेजुएट का ऑरिजिनल एमबीबीएस पास सर्टिफिकेट सिर्फ इसलिए अनिश्चित काल के लिए नहीं रोका जा सकता क्योंकि उसके एडमिशन से जुड़ा क्रिमिनल केस अभी भी लंबित है और उसे दोषी नहीं ठहराया गया है।
2012 में इंटर्नशिप के साथ एमबीबीएस कोर्स पूरा किया था
लाइव-लॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस बुडी हबुंग ने यह आदेश वालिया मुर्शिदा हुडा की ओर से असम राज्य, नेशनल मेडिकल कमीशन, असम मेडिकल काउंसिल, असम मेडिकल कॉलेज (डिब्रूगढ़) के प्रिंसिपल और डिब्रूगढ़ यूनिवर्सिटी के खिलाफ दायर याचिका पर दिया। वालिया मुर्शिदा हुडा का एडमिशन असम मेडिकल कॉलेज, डिब्रूगढ़ में 13 अन्य छात्रों के साथ एमबीबीएस कोर्स में हुआ था। उन्होंने 2011 में अपना एमबीबीएस कोर्स पूरा किया और जनवरी 2012 में अपनी एक साल की इंटर्नशिप भी पूरी कर ली।
हालांकि सीबीआई जांच के बाद दाखिला प्रक्रिया से जुड़ा एक क्रिमिनल केस उनके खिलाफ दर्ज किया गया था। यह केस अभी भी लंबित था। अभियोजन पक्ष के 42 गवाहों में से केवल 10 से ही पूछताछ हुई थी और किसी को दोषी नहीं ठहराया गया था।
रजिस्ट्रेशन के लिए भी जाना पड़ा था कोर्ट
इसी लंबित केस की वजह से उन्हें शुरू में रेगुलर रजिस्ट्रेशन नहीं दिया गया जिसके बाद वह गुवाहाटी हाईकोर्ट गईं। 2016 में कोर्ट ने अधिकारियों को 2010 में जारी सरकारी आदेश के अनुसार उनके रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया। इसके बाद उन्हें उसी साल असम काउंसिल ऑफ मेडिकल रजिस्ट्रेशन से फ़ाइनल रजिस्ट्रेशन मिल गया। कोर्स पूरा करने और रजिस्ट्रेशन मिलने के बावजूद उन्हें उनका ऑरिजिनल फाइनल एमबीबीएस पास सर्टिफिकेट नहीं दिया गया।
अन्य छात्रों को क्यों दी एमबीबीएस डिग्री
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि दो अन्य छात्र जुतितारा दास और अविरल वत्सा भी उनकी जैसी स्थिति में थे लेकिन उन्हें पहले ही उनके ऑरिजिनल सर्टिफिकेट मिल चुके थे। उन्होंने कहा कि सिर्फ उनका सर्टिफिकेट रोकना गलत है और समान व्यवहार के आधार पर भी सवाल उठाए।
कोर्ट ने क्या कहा
जस्टिस हबुंग ने कहा कि उनके फाइनल एमबीबीएस पास सर्टिफिकेट को रोकने का एकमात्र कारण उनके एडमिशन की सीबीआई जांच से जुड़ा लंबित आपराधिक मामला लग रहा था। कोर्ट ने देखा कि अधिकारियों ने खुद माना था कि वैसी ही स्थिति वाले अन्य उम्मीदवारों को उनके सर्टिफिकेट पहले ही दिए जा चुके थे।
लंबित आपराधिक केस के चलते डिग्री न देना गलत
हाईकोर्ट ने कहा कि लंबित आपराधिक केस किसी का सर्टिफिकेट अनिश्चित काल तक रोकने का सही आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने बताया कि याचिकाकर्ता ने अपना MBBS कोर्स और जरूरी इंटर्नशिप पूरी कर ली थी और उन्हें संबंधित अथॉरिटी से रजिस्ट्रेशन भी मिल चुका था।
केस के अंतिम नतीजे पर निर्भर होगी योग्यता
साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ किया कि चूंकि आपराधिक केस अभी भी चल रहा है इसलिए दोनों पक्षों के अधिकार केस के अंतिम नतीजे पर निर्भर करेंगे।
दो महीने के अंदर ओरिजिनल फाइनल MBBS पास सर्टिफिकेट दें
कोर्ट ने डिब्रूगढ़ के असम मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल को निर्देश दिया कि वे ऑर्डर की सर्टिफाइड कॉपी मिलने के दो महीने के अंदर याचिकाकर्ता को ओरिजिनल फाइनल MBBS पास सर्टिफिकेट जारी करें और उन्हें सौंप दें। अथॉरिटीज से यह भी कहा गया कि वे रेगुलेटरी बॉडी के पास उनके रजिस्ट्रेशन की जानकारी अपडेट करें। हालांकि कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि उनके क्वालिफिकेशन का सर्टिफिकेट और मान्यता, आपराधिक केस में होने वाले अंतिम फ़ैसले पर निर्भर करेगी।
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