दो बार फेल, नौकरी छोड़ी, समाज के ताने सुने… मयंक ने 5वें प्रयास में UPSC में मारी बाजी
mayank purohit upsc success story : राजस्थान के फलोदी के मयंक पुरोहित ने IIT से पढ़ाई और कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर UPSC की तैयारी की। पांच प्रयासों, असफलताओं और संघर्ष के बाद उन्होंने आखिरकार 33वीं रैंक हासिल की है।

mayank purohit upsc success story : राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके फलोदी में सपने अक्सर धीरे-धीरे आकार लेते हैं। हाल ही में जोधपुर से अलग होकर जिला बने इस छोटे शहर से निकले मयंक पुरोहित का सफर भी कुछ ऐसा ही रहा। साधारण परिवार, सीमित संसाधन और लंबा संघर्ष, लेकिन इरादे इतने मजबूत कि हर असफलता के बाद फिर खड़े हो गए। मयंक का परिवार आज भी उसी सादगी से जुड़ा हुआ है। घर में दादा-दादी, माता-पिता, छोटा भाई और अब उनकी पत्नी भी हैं। खास बात यह रही कि शादी के कुछ समय बाद ही उनका सबसे बड़ा प्रयास सफल होता दिखा। उन्होंने यूपीएससी में 33वीं रैंक हासिल की। जब उनसे मजाक में पूछा गया कि क्या पत्नी उनके लिए लकी साबित हुईं, तो वे मुस्कुराकर बोले, “हां, ऐसा कह सकते हैं।” आइए जानते हैं मयंक के यूपीएससी के सफर के बारे में…
फलोदी से जोधपुर और फिर IIT तक की कहानी
मयंक की शुरुआती पढ़ाई फलोदी में हुई, लेकिन वहां अंग्रेजी माध्यम के अच्छे स्कूल नहीं थे। इसी वजह से उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए जोधपुर जाना पड़ा। यही उनके जीवन का पहला बड़ा बदलाव था। इसके बाद वे कोटा पहुंचे, जहां उन्होंने 11वीं और 12वीं की पढ़ाई के साथ इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी की। मेहनत रंग लाई और उनका चयन आईआईटी धनबाद में हो गया। वहां उन्होंने माइनिंग मशीनरी इंजीनियरिंग की पढ़ाई की।
कॉलेज खत्म होने के बाद मयंक ने बड़ी कंपनी में टेक्नोलॉजिस्ट के तौर पर दो साल नौकरी भी की। बाहर से सब ठीक दिख रहा था, लेकिन अंदर कहीं न कहीं संतुष्टि नहीं थी। वे नौकरी के साथ UPSC की तैयारी करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन चीजें संभल नहीं पा रही थीं। आखिरकार उन्होंने बड़ा फैसला लिया और नौकरी छोड़ दी।
पांच प्रयास और हर बार नया संघर्ष
मयंक का UPSC सफर सीधा और आसान नहीं था। यह सफर पांच प्रयासों तक चला। पहले प्रयास में वे प्रीलिम्स भी पास नहीं कर पाए। बाद में एक और बार ऐसा हुआ। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। धीरे-धीरे उनकी तैयारी मजबूत होती गई। उन्होंने तीन बार प्रीलिम्स निकाला, तीन बार मेंस लिखा और दो बार इंटरव्यू तक पहुंचे। इसी दौरान उनका चयन भारतीय वन सेवा यानी भारतीय वन सेवा में भी हुआ। इस अनुभव ने उन्हें प्रशासन और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को समझने में काफी मदद की। उनकी कहानी सिर्फ प्रयासों की गिनती नहीं है, बल्कि हर असफलता के बाद खुद को दोबारा तैयार करने की कहानी है।
कम किताबें, ज्यादा स्पष्टता वाली तैयारी
मयंक की तैयारी का तरीका बाकी कई अभ्यर्थियों से अलग था। उन्होंने बहुत ज्यादा संसाधनों के पीछे भागने के बजाय सीमित चीजों को बार-बार पढ़ने पर ध्यान दिया। प्रीलिम्स में उन्होंने पॉलिटी, इकोनॉमी, पर्यावरण और भूगोल जैसे ज्यादा वेटेज वाले विषयों को मजबूत किया। उनका मानना था कि बेसिक सवालों में गलती नहीं होनी चाहिए। वे पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों को तैयारी का सबसे अहम हिस्सा मानते हैं। करेंट अफेयर्स के लिए अखबार उनकी पहली पसंद रहे, जबकि रिवीजन के लिए कोचिंग सामग्री का इस्तेमाल किया। उनकी सबसे खास ताकत थी लॉजिकल गेसिंग। यानी जिन सवालों का जवाब पूरी तरह नहीं पता, वहां समझदारी से विकल्प चुनना।
मेंस और उत्तर लेखन ने बदली दिशा
मयंक मानते हैं कि असली खेल मेंस परीक्षा में होता है। नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने सबसे ज्यादा फोकस उत्तर लेखन पर किया। वे बताते हैं कि प्रीलिम्स और मेंस के बीच का समय सबसे अहम होता है। इसी दौरान उन्होंने लगातार लिखने की प्रैक्टिस की और एथिक्स पेपर पर खास मेहनत की। उनका ऑप्शनल विषय फिजिक्स था, जिसे वे काफी तकनीकी मानते हैं। उनके अनुसार इसमें बार-बार डेरिवेशन याद करना और न्यूमेरिकल्स की प्रैक्टिस जरूरी होती है।
इंटरव्यू में कैसे हुए सवाल
जब मयंक इंटरव्यू तक पहुंचे, तब तक UPSC का अनिश्चित स्वभाव उनके लिए नया नहीं रहा था। इंटरव्यू में उनसे अमेरिका की टैरिफ नीति से लेकर भारत के वन क्षेत्र तक कई मुद्दों पर सवाल पूछे गए। उनकी वन सेवा की पृष्ठभूमि भी चर्चा में रही। इसके अलावा राजस्थान, पर्यटन और उनके डीएएफ यानी डिटेल एप्लिकेशन फॉर्म से जुड़े सवाल भी पूछे गए। मयंक के मुताबिक इंटरव्यू किसी डराने वाली प्रक्रिया जैसा नहीं था। यह ज्यादा एक बातचीत थी, जिसमें आपकी समझ, संतुलन और सोच को परखा जाता है।
गांव और किसानों के लिए काम करना चाहते हैं
अगर मयंक IAS सेवा में जाते हैं, तो उनकी प्राथमिकता जमीन से जुड़े मुद्दे रहेंगे। खासकर कृषि क्षेत्र। वे कहते हैं कि परिवार और आसपास के माहौल में उन्होंने किसानों की समस्याएं करीब से देखी हैं। इसलिए वे चाहते हैं कि सरकारी योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि लोगों तक सही तरीके से पहुंचें। उनकी दिलचस्पी प्रशासन में तकनीक के बेहतर इस्तेमाल को लेकर भी है ताकि आम लोगों को सेवाएं जल्दी और आसानी से मिल सकें।
सबसे मुश्किल था बार-बार खुद को संभालना
UPSC की तैयारी में सिर्फ पढ़ाई ही चुनौती नहीं होती। मयंक के लिए सामाजिक दबाव और असफलता के बाद दोबारा शुरुआत करना भी बेहद कठिन रहा। स्थिर नौकरी छोड़ने के फैसले को हर कोई समझ नहीं पाया। कई बार सवाल उठे, कई बार खुद पर भी संदेह हुआ। इंडियन मास्टरमाइंड को दिए इंटरव्यू में वे कहते हैं, “अलग-अलग स्टेज पर फेल होना अपने आप में बड़ी चुनौती है। हर बार फिर से खुद को तैयार करने में लगभग एक साल लग जाता है।”
अभ्यर्थियों को क्या सीख देते हैं मयंक
मयंक का मानना है कि UPSC में रणनीति साफ होनी चाहिए। उनके मुताबिक प्रीलिम्स सिर्फ छंटनी करता है, असली नंबर मेंस में बनते हैं और इंटरव्यू अंतिम प्रभाव छोड़ता है। इसलिए उत्तर लेखन पर सबसे ज्यादा ध्यान देना चाहिए। वे अभ्यर्थियों को सलाह देते हैं कि टॉपर्स की कॉपियां जरूर देखें, लिखने का तरीका समझें और तैयारी को जरूरत से ज्यादा उलझाएं नहीं। क्योंकि इस परीक्षा में हर चीज आपके नियंत्रण में नहीं होती, लेकिन निरंतरता जरूर होती है।
लेखक के बारे में
Himanshu Tiwariशॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।
परिचय एवं अनुभव
हिमांशु तिवारी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। बीते 10 सालों से वह लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस वक्त लाइव हिन्दुस्तान में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और बीते 3 साल से वह इस संस्थान से जुड़े हैं। शिक्षा, करियर, नौकरियों, नीट, जेईई, बैंकिंग, एसएससी और यूपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी और आरपीएससी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी खास पकड़ मानी जाती है। हिमांशु ने साल 2016 में पत्रकारिता की शुरुआत एबीपी न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म से किया। इसके बाद वह इंडिया टीवी और जी न्यूज (डीएनए) जैसे बड़े न्यूज चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी हिस्सा रह चुके हैं। हिमांशु तिवारी सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक सजग पाठक और आजीवन विद्यार्थी हैं, उनकी यही खूबी उनके कार्य में परिलक्षित होती है। उनका मानना है कि इन परीक्षाओं से जुड़ी सही और समय पर जानकारी लाखों युवाओं के भविष्य को दिशा दे सकती है, इसलिए वह इस बीट को सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।
लेखन की सोच और मकसद
हिमांशु के लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ सूचना देना नहीं है, बल्कि पाठक को सोचने की जगह देना भी है। खासकर करियर और शिक्षा के क्षेत्र में वह यह मानते हैं कि एक गलत या अधूरी खबर किसी छात्र की पूरी तैयारी को भटका सकती है। इसलिए उनके लेखन में सरल भाषा, ठोस तथ्य और व्यावहारिक नजरिया हमेशा प्राथमिकता में रहता है। उनकी कोशिश रहती है कि पाठक को सिर्फ खबर की जानकारी ही न हो, बल्कि यह भी समझ आए कि उस खबर का उसके जीवन और भविष्य से क्या रिश्ता है।
शिक्षा और अकादमिक पृष्ठभूमि
हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।
रुचियां और निजी झुकाव
काम से इतर हिमांशु की गहरी रुचि समकालीन इतिहास, समानांतर सिनेमा और दर्शन में रही है। राजनीति और विदेश नीति पर पढ़ना-लिखना उन्हें विशेष रूप से पसंद है। इसी रुचि के चलते उन्होंने दो लोकसभा चुनावों और दर्जनों विधानसभा चुनावों की कवरेज की, जहां राजनीति को उन्होंने बेहद नजदीक से देखा और समझा। चुनावी आंकड़ों की बारीकियां, नेताओं के भाषण, जमीनी मुद्दे और जनता की प्रतिक्रियाएं, इन सभी पहलुओं को समेटते हुए उन्होंने सैकड़ों खबरें और विश्लेषण तैयार किए, जो राजनीतिक प्रक्रिया की गहरी समझ को दर्शाते हैं।
विशेषज्ञताएं
- शिक्षा, करियर और नौकरियों से जुड़ी खबरों पर विशेष रुचि और निरंतर लेखन
- नीट, जेईई और राज्यवार बोर्ड परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों, बदलावों और परिणामों पर गहन फोकस
- UPSC, UPPSC, MPPSC, BPSC, RPSC और JPSC जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी, पैटर्न और नीतिगत पहलुओं पर पैनी नजर
- अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और विदेश नीति से जुड़े विषयों का विश्लेषणात्मक लेखन
- राजनीति, चुनावी आंकड़ों और जमीनी मुद्दों पर सरल और तथ्यपरक एक्सप्लेनर तैयार करने का अनुभव


