हार नहीं मानी, टूटकर भी फिर उठे मनुज जिंदल, NDA छोड़ने के बाद ऐसे बने IAS
मनुज जिंदल ने डिप्रेशन, असफलता और भटकाव के दौर से गुजरकर AIR 53 हासिल की। आज मंजुल युवाओं को हिम्मत और संतुलन का मतलब सिखा रहे हैं।

भीड़ में खड़े हर सफल चेहरे की कहानी सीधी नहीं होती। कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो बाहर से चमकती दिखती हैं, लेकिन भीतर संघर्ष, टूटन और खुद को दोबारा गढ़ने की लंबी यात्रा छिपी होती है। मनुज जिंदल की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। आज वह एक सफल आईएएस अधिकारी हैं, लेकिन यहां तक पहुंचने से पहले उन्होंने असफलता, मानसिक दबाव और जीवन की दिशा बदल देने वाले फैसलों का सामना किया।
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में जन्मे मनुज बचपन से ही पढ़ाई में तेज और अनुशासित थे। उनमें देशसेवा का भाव बहुत जल्दी विकसित हो गया था। यही सपना उन्हें देश की प्रतिष्ठित सैन्य संस्था National Defence Academy यानी एनडीए तक ले गया। महज 18 साल की उम्र में उन्होंने एनडीए परीक्षा पास कर ऑल इंडिया रैंक 18 हासिल की। यह उपलब्धि किसी भी युवा के लिए गर्व का क्षण होती है और उनके परिवार के लिए भी यह बेहद खुशी का समय था।
डिप्रेशन से गुजरे थे मनुज
लेकिन जिंदगी हमेशा सीधी रेखा में नहीं चलती। एनडीए में शुरुआती सफलता के बाद मनुज को मानसिक दबाव का सामना करना पड़ा। कठोर प्रशिक्षण और लगातार प्रदर्शन के दबाव ने उनकी मानसिक सेहत को प्रभावित किया। धीरे धीरे वे गंभीर चिंता और अवसाद से जूझने लगे। हालात ऐसे बने कि उन्हें एनडीए छोड़ना पड़ा और मेडिकल आधार पर अनफिट घोषित कर दिया गया। यह उनके जीवन का सबसे कठिन मोड़ था, क्योंकि यहीं उनका पहला सपना खत्म हो गया।
नई सोच के साथ आया आत्मविश्वास
इस घटना ने उन्हें अंदर से झकझोर दिया। अचानक से दिशा बदल जाने के बाद उन्होंने खुद को संभालने के लिए समय लिया। मनुज ने नई शुरुआत का फैसला किया और उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया पहुंचे। वहां उन्होंने अर्थशास्त्र और प्रबंधन की पढ़ाई की। विदेश का माहौल, नई सोच और नए अनुभवों ने उन्हें फिर से आत्मविश्वास दिया।
मन के अंदर था देश सेवा का सपना
पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें वित्तीय क्षेत्र में नौकरी मिली और उन्होंने वैश्विक बैंक Barclays में काम करना शुरू किया। जिंदगी अब स्थिर दिख रही थी। अच्छी नौकरी, विदेश में करियर और सुरक्षित भविष्य। लेकिन दिल के भीतर कहीं न कहीं देश के लिए काम करने का सपना अब भी जिंदा था। वही सपना उन्हें वापस भारत खींच लाया।
भारत लौटने के बाद उन्होंने सिविल सेवा की तैयारी शुरू की। उनके छोटे भाई भी इस परीक्षा की तैयारी कर रहे थे, जिससे उन्हें प्रेरणा मिली। उन्होंने यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा में 2014 में पहला प्रयास दिया, लेकिन सफलता नहीं मिली। यह एक और झटका था।
2015 में उन्होंने दूसरा प्रयास किया। इस बार वे मुख्य परीक्षा तक पहुंचे, लेकिन अंतिम सूची में जगह नहीं बन सकी और रिजर्व लिस्ट में रह गए। यह परिणाम बहुत करीब पहुंचकर रुक जाने जैसा था। कई लोग यहां हार मान लेते, लेकिन मनुज ने इसे अंत नहीं, बल्कि तैयारी का हिस्सा माना।
तीसरे प्रयास में सपना किया साकार
तीसरे प्रयास के लिए उन्होंने अपनी रणनीति पूरी तरह बदल दी। उन्होंने खासतौर पर निबंध और उत्तर लेखन पर काम किया, क्योंकि यही उनकी कमजोरी रही थी। उन्होंने लिखने का अभ्यास किया, सोच को व्यवस्थित करना सीखा और हर उत्तर को एक स्पष्ट संरचना में ढालने की आदत बनाई। धीरे धीरे उनका आत्मविश्वास लौट आया।
साल 2016 में उनकी मेहनत रंग लाई। उन्होंने परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 53 हासिल की और आईएएस सेवा में चयनित हुए। यह सिर्फ एक परीक्षा पास करना नहीं था, बल्कि खुद पर दोबारा विश्वास जीतने का क्षण था।
आईएएस बनने के बाद उन्हें महाराष्ट्र कैडर मिला। उन्होंने जमीनी स्तर पर काम करते हुए प्रशासन को करीब से समझा। ठाणे में जिला परिषद ठाणे के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में उन्होंने ग्रामीण विकास, शिक्षा और स्थानीय योजनाओं के क्रियान्वयन पर ध्यान दिया। महाराष्ट्र में उनकी कार्यशैली को लोगों से जुड़कर काम करने वाला माना जाता है।
मनुज यूट्यूब पर करते हैं अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन
मनुज की खास बात यह है कि उन्होंने अपने संघर्ष को छिपाया नहीं, बल्कि उसे दूसरों की ताकत बना दिया। वह आज भी युवाओं से जुड़कर उन्हें तैयारी के साथ साथ मानसिक संतुलन की अहमियत समझाते हैं। डिजिटल माध्यमों पर भी वह सक्रिय हैं और YouTube के जरिए अभ्यर्थियों को मार्गदर्शन देते हैं। वहां वह बताते हैं कि तैयारी सिर्फ किताबों से नहीं, बल्कि धैर्य, आत्मविश्वास और निरंतरता से बनती है।
उनकी कहानी उन युवाओं के लिए खास है जो असफलता से डरते हैं या रास्ता बदल जाने पर खुद को खोया हुआ महसूस करते हैं। मनुज जिंदल का सफर बताता है कि जीवन में दिशा बदलना हार नहीं होता, बल्कि कई बार वही मोड़ हमें सही जगह तक ले जाता है।



