अब मनमर्जी नहीं; इस राज्य का नया कानून, प्राइवेट प्री-स्कूलों पर सख्ती, बढ़ेगी जवाबदेही
महाराष्ट्र सरकार प्राइवेट प्री-स्कूलों के लिए नया कानून ला रही है। अब अनिवार्य रजिस्ट्रेशन, 20:1 छात्र-शिक्षक अनुपात और सख्त निगरानी से शिक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता आएगी।

महाराष्ट्र में बचपन की पढ़ाई यानी प्री-प्राइमरी एजुकेशन की दुनिया अब बदलने वाली है। अक्सर देखा जाता है कि गलियों और मोहल्लों में बिना किसी ठोस नियम के प्राइवेट प्री-स्कूल खुल जाते हैं, जहां न तो फीस का कोई पैमाना होता है और न ही शिक्षा की गुणवत्ता का। लेकिन अब महाराष्ट्र सरकार ने इस 'अनगाइडेड' सेक्टर को एक कानूनी दायरे में लाने की तैयारी पूरी कर ली है। राज्य के स्कूली शिक्षा मंत्री दादा भूसे ने विधानसभा में इस बात की पुष्टि की है कि निजी प्री-स्कूलों को रेगुलेट करने के लिए एक नया और सख्त कानून लाया जा रहा है। इसका सीधा मकसद छोटे बच्चों की सुरक्षा, उनके सीखने के तरीके में एकरूपता और स्कूलों की जवाबदेही तय करना है।
रजिस्ट्रेशन हुआ अनिवार्य
सरकार ने साफ कर दिया है कि अब कोई भी प्राइवेट प्री-स्कूल बिना रजिस्ट्रेशन के नहीं चल पाएगा। मंत्री दादा भूसे के मुताबिक, 24 अप्रैल 2025 को जारी एक सर्कुलर के बाद से ही राज्य में प्री-स्कूलों के पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। अब तक लगभग 12,733 निजी प्री-प्राइमरी सेंटर्स ने 'प्री-स्कूल रजिस्ट्रेशन पोर्टल' पर अपना ब्योरा दर्ज करा दिया है। जो स्कूल अभी भी इस प्रक्रिया से बाहर हैं, उन्हें जल्द से जल्द जुड़ने की हिदायत दी गई है। सरकार का मानना है कि इस डिजिटल डेटाबेस से यह पता चल सकेगा कि राज्य में असल में कितने स्कूल चल रहे हैं और वहां बच्चों को क्या सुविधाएं मिल रही हैं।
क्या है प्रस्तावित कानून और नए नियम?
प्रस्तावित कानून के तहत प्री-स्कूलों के लिए कुछ कड़े और जरूरी मानक तय किए जा रहे हैं। नए फ्रेमवर्क की मुख्य बातें कुछ इस प्रकार हैं:
अनिवार्य पंजीकरण: हर प्री-स्कूल को ऑनलाइन पोर्टल पर रजिस्टर होना होगा।
रिन्यूअल की शर्त: यह रजिस्ट्रेशन स्थायी नहीं होगा, बल्कि हर तीन साल में इसे रिन्यू कराना अनिवार्य होगा।
अथॉरिटी की नियुक्ति: सरकार एक खास अथॉरिटी (प्राधिकरण) नियुक्त करेगी, जो इन संस्थानों की निगरानी और सुपरविजन का काम देखेगी।
छात्र-शिक्षक अनुपात: बच्चों पर बेहतर ध्यान देने के लिए 20:1 का अनुपात (20 बच्चों पर एक टीचर) रखने का प्रस्ताव है।
चाइल्ड-सेंटर्ड करिकुलम: पढ़ाई का तरीका किताबी बोझ वाला न होकर बच्चों के मानसिक विकास पर आधारित होगा। खेलकूद के सामान और खिलौनों की उपलब्धता भी अनिवार्य की जाएगी।
सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर
अक्सर छोटे बच्चों के स्कूलों में सुरक्षा और बुनियादी ढांचे को लेकर शिकायतें आती रहती हैं। नए कानून में इस बात पर खास ध्यान दिया गया है कि स्कूल का वातावरण 'चाइल्ड-फ्रेंडली' हो। क्लासरूम से लेकर खेलने की जगह तक, सब कुछ सुरक्षित और आरामदायक होना चाहिए। महाराष्ट्र सरकार इस मामले में दिल्ली के मॉडल और अन्य राज्यों की बेहतरीन प्रैक्टिस को भी ध्यान में रख रही है, ताकि प्राइवेट सेक्टर में भी सरकारी मानकों जैसी गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके।
कब से लागू होगा नया कानून?
शिक्षा मंत्री ने सदन को बताया कि इस कानून का ड्राफ्ट तैयार है। महिला एवं बाल विकास विभाग से सुझाव मिलने के बाद अब इसे 'विधि एवं न्याय विभाग' (Law and Judiciary Department) के पास कानूनी जांच के लिए भेजा गया है। सरकार की कोशिश है कि अगले शैक्षणिक सत्र (Academic Year) की शुरुआत से पहले इसे पूरी तरह लागू कर दिया जाए। इससे न केवल शिक्षा का स्तर सुधरेगा, बल्कि अभिभावकों को भी यह तसल्ली रहेगी कि उनका बच्चा एक सुरक्षित और मान्यता प्राप्त संस्थान में पढ़ रहा है।
लेखक के बारे में
Himanshu Tiwariशॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।
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हिमांशु तिवारी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। बीते 10 सालों से वह लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस वक्त लाइव हिन्दुस्तान में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और बीते 3 साल से वह इस संस्थान से जुड़े हैं। शिक्षा, करियर, नौकरियों, नीट, जेईई, बैंकिंग, एसएससी और यूपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी और आरपीएससी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी खास पकड़ मानी जाती है। हिमांशु ने साल 2016 में पत्रकारिता की शुरुआत एबीपी न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म से किया। इसके बाद वह इंडिया टीवी और जी न्यूज (डीएनए) जैसे बड़े न्यूज चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी हिस्सा रह चुके हैं। हिमांशु तिवारी सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक सजग पाठक और आजीवन विद्यार्थी हैं, उनकी यही खूबी उनके कार्य में परिलक्षित होती है। उनका मानना है कि इन परीक्षाओं से जुड़ी सही और समय पर जानकारी लाखों युवाओं के भविष्य को दिशा दे सकती है, इसलिए वह इस बीट को सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।
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हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।
रुचियां और निजी झुकाव
काम से इतर हिमांशु की गहरी रुचि समकालीन इतिहास, समानांतर सिनेमा और दर्शन में रही है। राजनीति और विदेश नीति पर पढ़ना-लिखना उन्हें विशेष रूप से पसंद है। इसी रुचि के चलते उन्होंने दो लोकसभा चुनावों और दर्जनों विधानसभा चुनावों की कवरेज की, जहां राजनीति को उन्होंने बेहद नजदीक से देखा और समझा। चुनावी आंकड़ों की बारीकियां, नेताओं के भाषण, जमीनी मुद्दे और जनता की प्रतिक्रियाएं, इन सभी पहलुओं को समेटते हुए उन्होंने सैकड़ों खबरें और विश्लेषण तैयार किए, जो राजनीतिक प्रक्रिया की गहरी समझ को दर्शाते हैं।
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