घर में मराठी, स्कूल में मराठी... फिर भी 80 हजार छात्र फेल; अपनी ही भाषा में क्यों फिसड्डी हो रहे छात्र

Himanshu Tiwari लाइव हिन्दुस्तान
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महाराष्ट्र बोर्ड के शानदार रिजल्ट के बीच एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। इस बार के रिजल्ट में 80 से ज्यादा छात्र अपनी ही मातृभाषा मराठी में पासिंग मार्क्स तक नहीं ला सके।

घर में मराठी, स्कूल में मराठी... फिर भी 80 हजार छात्र फेल; अपनी ही भाषा में क्यों फिसड्डी हो रहे छात्र

महाराष्ट्र स्टेट बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एंड हायर सेकेंडरी एजुकेशन यानी MSBSHSE ने 8 मई को SSC यानी 10वीं बोर्ड परीक्षा 2026 का रिजल्ट जारी किया। पहली नजर में रिजल्ट काफी शानदार दिखाई दिया क्योंकि राज्य का कुल पास प्रतिशत 90.75 फीसदी रहा। लेकिन इसी रिजल्ट के भीतर एक ऐसी बात सामने आई जिसने शिक्षा जगत की चिंता बढ़ा दी। राज्य में 80 हजार से ज्यादा छात्र मराठी भाषा विषय में न्यूनतम पासिंग मार्क्स तक हासिल नहीं कर सके। यानी जो छात्र घर में भी मराठी और स्कूल में भी मराठी बोलते हैं वही अपनी मातृभाषा मराठी के पेपर में फेल हो गए।

16 लाख से ज्यादा छात्रों ने दी परीक्षा

इस साल महाराष्ट्र बोर्ड SSC परीक्षा के लिए करीब 16,14,050 छात्रों ने रजिस्ट्रेशन कराया था। इनमें से 16,00,164 छात्र परीक्षा में शामिल हुए। इसमें रेगुलर, प्राइवेट और रिपीटर सभी तरह के छात्र शामिल थे। इनमें से 14,52,246 छात्र परीक्षा पास करने में सफल रहे। वहीं फ्रेश रेगुलर छात्रों का पास प्रतिशत 92.09 फीसदी दर्ज किया गया। कुल मिलाकर बोर्ड का रिजल्ट मजबूत रहा, लेकिन मराठी विषय के आंकड़ों ने पूरी चर्चा का फोकस बदल दिया।

अपनी ही भाषा में कमजोर क्यों हो रहे छात्र?

एनडीटीवी की रिपोर्ट की मानें तो शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में बच्चों की भाषा पकड़ लगातार कमजोर हुई है। खासकर लिखने की आदत में भारी गिरावट देखने को मिली है। मोबाइल और सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल ने बच्चों की स्पेलिंग और व्याकरण पर असर डाला है। आजकल ज्यादातर बातचीत छोटे मैसेज, शॉर्टकट शब्द और रोमन भाषा में होने लगी है। इसका असर सीधे बच्चों की लिखित भाषा पर दिखाई दे रहा है। कई छात्र मराठी पढ़ तो लेते हैं, लेकिन सही वर्तनी और व्याकरण के साथ लिख नहीं पाते।

अंग्रेजी माध्यम की बढ़ती पकड़ भी बनी वजह

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की तरफ बढ़ते झुकाव ने मातृभाषा की पढ़ाई को कमजोर किया है। कई परिवार अब बच्चों को शुरुआती स्तर से ही अंग्रेजी शिक्षा दिलाना चाहते हैं। ऐसे में मराठी केवल एक विषय बनकर रह गई है, जबकि पहले यह रोजमर्रा की पढ़ाई और संवाद का मुख्य हिस्सा होती थी। इसी वजह से बच्चों की भाषा पर पकड़ पहले जैसी मजबूत नहीं रह गई। खासकर ग्रामर, निबंध लेखन और शुद्ध लेखन वाले सवालों में छात्रों का प्रदर्शन कमजोर बताया जा रहा है।

सोशल मीडिया ने बदली लिखने की आदत

शिक्षकों का कहना है कि छात्रों में कॉपी पर लिखने की आदत तेजी से कम हुई है। अब ज्यादातर बच्चे मोबाइल स्क्रीन पर टाइपिंग के जरिए पढ़ाई और बातचीत करते हैं। इससे हाथ से लिखने की स्पीड, शब्दों की शुद्धता और भाषा की समझ प्रभावित हो रही है। मराठी ही नहीं, कई दूसरी भारतीय भाषाओं में भी यही समस्या धीरे-धीरे देखने को मिल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में मातृभाषाओं की पकड़ और कमजोर हो सकती है।

शिक्षा विशेषज्ञों ने क्या कहा?

शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कई लोगों ने इसे केवल एक परीक्षा का मुद्दा नहीं बल्कि भाषा और संस्कृति से जुड़ी गंभीर चेतावनी बताया है। उनका कहना है कि बच्चों को केवल नंबर लाने तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि मातृभाषा की समझ और लेखन क्षमता पर भी बराबर ध्यान देना जरूरी है। स्कूलों में नियमित लेखन अभ्यास, पढ़ने की आदत और भाषा आधारित एक्टिविटी बढ़ाने की जरूरत बताई जा रही है ताकि बच्चे अपनी मातृभाषा से जुड़ाव बनाए रख सकें।

Himanshu Tiwari

लेखक के बारे में

Himanshu Tiwari

शॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।

परिचय एवं अनुभव
हिमांशु तिवारी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। बीते 10 सालों से वह लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस वक्त लाइव हिन्दुस्तान में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और बीते 3 साल से वह इस संस्थान से जुड़े हैं। शिक्षा, करियर, नौकरियों, नीट, जेईई, बैंकिंग, एसएससी और यूपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी और आरपीएससी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी खास पकड़ मानी जाती है। हिमांशु ने साल 2016 में पत्रकारिता की शुरुआत एबीपी न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म से किया। इसके बाद वह इंडिया टीवी और जी न्यूज (डीएनए) जैसे बड़े न्यूज चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी हिस्सा रह चुके हैं। हिमांशु तिवारी सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक सजग पाठक और आजीवन विद्यार्थी हैं, उनकी यही खूबी उनके कार्य में परिलक्षित होती है। उनका मानना है कि इन परीक्षाओं से जुड़ी सही और समय पर जानकारी लाखों युवाओं के भविष्य को दिशा दे सकती है, इसलिए वह इस बीट को सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।

लेखन की सोच और मकसद
हिमांशु के लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ सूचना देना नहीं है, बल्कि पाठक को सोचने की जगह देना भी है। खासकर करियर और शिक्षा के क्षेत्र में वह यह मानते हैं कि एक गलत या अधूरी खबर किसी छात्र की पूरी तैयारी को भटका सकती है। इसलिए उनके लेखन में सरल भाषा, ठोस तथ्य और व्यावहारिक नजरिया हमेशा प्राथमिकता में रहता है। उनकी कोशिश रहती है कि पाठक को सिर्फ खबर की जानकारी ही न हो, बल्कि यह भी समझ आए कि उस खबर का उसके जीवन और भविष्य से क्या रिश्ता है।

शिक्षा और अकादमिक पृष्ठभूमि
हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।

रुचियां और निजी झुकाव
काम से इतर हिमांशु की गहरी रुचि समकालीन इतिहास, समानांतर सिनेमा और दर्शन में रही है। राजनीति और विदेश नीति पर पढ़ना-लिखना उन्हें विशेष रूप से पसंद है। इसी रुचि के चलते उन्होंने दो लोकसभा चुनावों और दर्जनों विधानसभा चुनावों की कवरेज की, जहां राजनीति को उन्होंने बेहद नजदीक से देखा और समझा। चुनावी आंकड़ों की बारीकियां, नेताओं के भाषण, जमीनी मुद्दे और जनता की प्रतिक्रियाएं, इन सभी पहलुओं को समेटते हुए उन्होंने सैकड़ों खबरें और विश्लेषण तैयार किए, जो राजनीतिक प्रक्रिया की गहरी समझ को दर्शाते हैं।

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