Success Story: इंटरव्यूअर ने फोन में डाउनलोड किया ऐप, फिर बरसाए सवाल; ऐसे मिला 1.4 करोड़ का पैकेज

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रांची के कुशाग्र सहाय ने लिंक्डइन से 1.4 करोड़ का पैकेज हासिल किया है। जानिए गूगल से रिजेक्शन के बाद कुशाग्र को कैसे मिली कामयाबी।

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सफलता की कहानियां अक्सर हमें दूर से बहुत चमचमाती हुई नजर आती हैं। जब हम अखबारों में या सोशल मीडिया पर करोड़ों के पैकेज की खबर पढ़ते हैं, तो हमारा दिमाग बस उस भारी-भरकम नंबर पर अटक कर रह जाता है। लेकिन उस एक नंबर के पीछे कितनी रातें जगी हुई होती हैं, कितने रिजेक्शन छिपे होते हैं और कितनी बार इंसान खुद पर शक करता है, यह कोई नहीं देखता। हाल ही में दिग्गज प्रोफेशनल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म लिंक्डइन से 1.4 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड इंटरनेशनल पैकेज हासिल करने वाले कुशाग्र सहाय की कहानी भी बिल्कुल ऐसी ही है। यह सफर रातों-रात मिली किसी कामयाबी का नहीं, बल्कि सालों की ठोस तैयारी और नाकामी से लड़कर वापस उठने का एक शानदार उदाहरण है।

कौन हैं कुशाग्र सहाय?

रांची की जानी-पहचानी सड़कों से निकलकर ग्लोबल टेक इंडस्ट्री तक पहुंचने वाले कुशाग्र ने अपनी जिंदगी के शुरुआती दिन अपने होमटाउन में ही बिताए। स्कूली पढ़ाई के बाद उन्होंने रांची के ही प्रतिष्ठित संस्थान, बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (BIT) मेसरा में कदम रखा और वहां से कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग में बीटेक की डिग्री ली।

लेकिन यह सफर किसी स्मूथ हाइवे जैसा नहीं था। लिंक्डइन का यह ड्रीम ऑफर हाथ लगने से पहले कुशाग्र ने कई कंपनियों के बंद दरवाजे और रिजेक्शन का कड़वा घूंट पिया है। सबसे बड़ा झटका उन्हें तब लगा था, जब वो दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनी गूगल की इंटर्नशिप के लिए इंटरव्यू के बिल्कुल आखिरी राउंड तक पहुंच गए थे। उन्हें लगा था कि मंजिल अब बस एक कदम दूर है, लेकिन बदकिस्मती से उन्हें वह ऑफर नहीं मिल पाया।

इतने करीब आकर खाली हाथ लौटना किसी को भी अंदर से तोड़ सकता है। कुशाग्र भी 'सेल्फ-डाउट' के गहरे भंवर में फंस गए। उन्हें लगने लगा कि शायद उनकी तैयारियों में या उनके अंदर ही कोई बड़ी कमी है। लेकिन हार मान लेना उनकी फितरत नहीं थी। उन्होंने अपनी गलतियों से सीखा और दोगुनी मेहनत के साथ फिर से कोशिश शुरू की। उनकी यही जिद रंग लाई और आखिरकार उन्हें लिंक्डइन में एक बेहतरीन इंटर्नशिप का मौका मिल गया। वहां उन्होंने अपने काम से सबको इतना प्रभावित किया कि वह इंटर्नशिप सीधे एक शानदार प्री-प्लेसमेंट ऑफर में तब्दील हो गई।

इंजीनियरिंग छात्रों को कुशाग्र की सलाह

जब भी किसी फ्रेशर को 1.4 करोड़ का पैकेज मिलता है, तो हर इंजीनियरिंग स्टूडेंट उसी पैकेज का सपना देखने लगता है। लेकिन कुशाग्र का नजरिया इससे बिल्कुल अलग है। वह पूरी बेबाकी से कहते हैं कि छात्रों को सैलरी के इस बड़े आंकड़े के पीछे अंधे होकर नहीं भागना चाहिए।

कुशाग्र समझाते हैं, "आपका अल्टीमेट गोल सिर्फ एक बड़ा सैलरी पैकेज नहीं होना चाहिए। इंटरनेशनल कंपनियों के सीटीसी को लेकर अक्सर लोगों में बहुत गलतफहमी होती है। यह सिर्फ आपके बैंक अकाउंट में आने वाला कैश नहीं होता, बल्कि इसमें दुनिया भर के भत्ते, स्टॉक्स और बेनिफिट्स शामिल होते हैं।"

उनका सीधा सा मंत्र है कि पैसों की बजाय अपने हुनर को तराशने पर फोकस करें। अगर आपके बेसिक्स और फंडामेंटल्स मजबूत हैं, आपके अंदर मुश्किल से मुश्किल प्रॉब्लम्स को सॉल्व करने की काबिलियत है और आप लगातार कुछ नया सीखने की भूख रखते हैं, तो ऐसे करोड़ों के पैकेज वाले दरवाजे आज नहीं तो कल खुद आपके लिए खुल जाएंगे।

प्रैक्टिकल प्रोजेक्ट्स ने कैसे पलटी गेम?

आजकल हर कोई अपने रेज्यूमे में चार-पांच प्रोजेक्ट्स लिख देता है, लेकिन कुशाग्र ने भीड़ से अलग हटकर कुछ ऐसा किया जो असल जिंदगी में काम आए। BIT मेसरा में पढ़ाई के दौरान, उन्होंने सिर्फ थ्योरी पर रट्टा नहीं मारा। उन्होंने अपनी रेसिडेंशियल सोसायटी के लिए एक बकायदा हाउसिंग मैनेजमेंट प्लेटफॉर्म तैयार किया। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने कॉलेज के कंप्यूटर साइंस डिपार्टमेंट की जरूरतों को समझते हुए एक एकेडमिक मैनेजमेंट प्लेटफॉर्म भी कोडिंग के जरिए खड़ा कर दिया।

इंटरव्यू में यही प्रोजेक्ट्स उनके सबसे बड़े हथियार साबित हुए। वहां उनसे यह नहीं पूछा गया कि किताब में क्या लिखा है, बल्कि यह पूछा गया कि इन प्रोजेक्ट्स को बनाने के पीछे उनका 'लॉजिक' क्या था। डेटाबेस कैसे काम कर रहा है? अगर कल को इन एप्लिकेशन्स पर हजारों लोग एक साथ आ जाएं (Scale), तो ये सिस्टम उसे कैसे हैंडल करेगा?

कैसा था लिंक्डइन का वह खौफनाक इंटरव्यू?

लिंक्डइन का इंटरव्यू कोई बच्चों का खेल नहीं था। कुशाग्र बताते हैं कि यह एक लंबी और थका देने वाली प्रक्रिया थी। शुरुआत एक ऑनलाइन कोडिंग टेस्ट से हुई। इसके बाद डेटा स्ट्रक्चर्स और एल्गोरिदम के कई राउंड्स हुए, जहां उनके कोडिंग स्किल्स का कड़ा इम्तिहान लिया गया। फिर कंप्यूटर साइंस के बेसिक्स को परखा गया और आखिर में एक मैनेजरियल राउंड हुआ, जिसमें यह देखा गया कि मुश्किल हालात में उनका बर्ताव कैसा रहता है।

कुशाग्र के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया का सबसे चैलेंजिंग हिस्सा वह था जब उन्हें अपने बनाए गए प्रोजेक्ट्स के पीछे के 'इंजीनियरिंग फैसलों' को डिफेंड करना पड़ा। एक इंटरव्यू के दौरान तो हद ही हो गई जब इंटरव्यूअर ने कुशाग्र का बनाया हुआ ऐप सीधा अपने स्मार्टफोन में डाउनलोड किया, उसे चलाकर देखा, और वहीं बैठे-बैठे ऐप के बैकएंड आर्किटेक्चर, उसकी स्केलेबिलिटी और डेटाबेस की डिजाइनिंग पर सवालों की बौछार कर दी।

इस अनुभव से कुशाग्र ने जो सबसे बड़ी सीख ली, वह हर जॉब ढूंढने वाले के काम आ सकती है: आपके रेज्यूमे में लिखे एक-एक शब्द की आपको 100% जानकारी होनी चाहिए। अगर आपने किसी प्रोजेक्ट का जिक्र किया है, तो आपको उसकी रग-रग का पता होना चाहिए। हवा में तीर चलाने वालों की टेक इंडस्ट्री में कोई जगह नहीं है।

Himanshu Tiwari

लेखक के बारे में

Himanshu Tiwari

शॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।

परिचय एवं अनुभव
हिमांशु तिवारी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। बीते 10 सालों से वह लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस वक्त लाइव हिन्दुस्तान में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और बीते 3 साल से वह इस संस्थान से जुड़े हैं। शिक्षा, करियर, नौकरियों, नीट, जेईई, बैंकिंग, एसएससी और यूपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी और आरपीएससी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी खास पकड़ मानी जाती है। हिमांशु ने साल 2016 में पत्रकारिता की शुरुआत एबीपी न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म से किया। इसके बाद वह इंडिया टीवी और जी न्यूज (डीएनए) जैसे बड़े न्यूज चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी हिस्सा रह चुके हैं। हिमांशु तिवारी सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक सजग पाठक और आजीवन विद्यार्थी हैं, उनकी यही खूबी उनके कार्य में परिलक्षित होती है। उनका मानना है कि इन परीक्षाओं से जुड़ी सही और समय पर जानकारी लाखों युवाओं के भविष्य को दिशा दे सकती है, इसलिए वह इस बीट को सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।

लेखन की सोच और मकसद
हिमांशु के लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ सूचना देना नहीं है, बल्कि पाठक को सोचने की जगह देना भी है। खासकर करियर और शिक्षा के क्षेत्र में वह यह मानते हैं कि एक गलत या अधूरी खबर किसी छात्र की पूरी तैयारी को भटका सकती है। इसलिए उनके लेखन में सरल भाषा, ठोस तथ्य और व्यावहारिक नजरिया हमेशा प्राथमिकता में रहता है। उनकी कोशिश रहती है कि पाठक को सिर्फ खबर की जानकारी ही न हो, बल्कि यह भी समझ आए कि उस खबर का उसके जीवन और भविष्य से क्या रिश्ता है।

शिक्षा और अकादमिक पृष्ठभूमि
हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।

रुचियां और निजी झुकाव
काम से इतर हिमांशु की गहरी रुचि समकालीन इतिहास, समानांतर सिनेमा और दर्शन में रही है। राजनीति और विदेश नीति पर पढ़ना-लिखना उन्हें विशेष रूप से पसंद है। इसी रुचि के चलते उन्होंने दो लोकसभा चुनावों और दर्जनों विधानसभा चुनावों की कवरेज की, जहां राजनीति को उन्होंने बेहद नजदीक से देखा और समझा। चुनावी आंकड़ों की बारीकियां, नेताओं के भाषण, जमीनी मुद्दे और जनता की प्रतिक्रियाएं, इन सभी पहलुओं को समेटते हुए उन्होंने सैकड़ों खबरें और विश्लेषण तैयार किए, जो राजनीतिक प्रक्रिया की गहरी समझ को दर्शाते हैं।

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- शिक्षा, करियर और नौकरियों से जुड़ी खबरों पर विशेष रुचि और निरंतर लेखन
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