निखिल कामत ने बताया इडियट, क्या 2026 में MBA करना महज बर्बादी है? अंकुर वारिकू ने बताया सच

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क्या साल 2026 में एमबीए करना बेवकूफी है या यह आपके करियर को नई उड़ान देगा? जानिए अंकुर वारिकू ने एमबीए करियर को लेकर क्या कहा।

निखिल कामत ने बताया इडियट, क्या 2026 में MBA करना महज बर्बादी है? अंकुर वारिकू ने बताया सच

अगर आप 25 साल के हैं और जिंदगी में कुछ बड़ा करने के सपने देख रहे हैं, और लाखों रुपये का कर्ज लेकर एक एमबीए कॉलेज में दाखिला लेते हैं। तो आपके लिए यह जरूरी खबर है। क्योंकि ऐसा करने वाले वालों को देश का एक नामी अरबपति 'इडियट' कहता है। सुनने में थोड़ा अजीब और कड़वा लग सकता है लेकिन जिरोधा के को-फाउंडर निखिल कामत ने हाल ही में अपने एक पॉडकास्ट में कुछ ऐसा ही कहा है। कामत ने खुद 12वीं तक की पढ़ाई भी पूरी नहीं की और आज दुनिया के सबसे अमीर लोगों में शुमार हैं, उनका मानना है कि आज के दौर में एमबीए करना एक बड़ी बेवकूफी है। मगर क्या यह पूरी सच्चाई है? क्या वाकई 2026 में एमबीए की डिग्री महज रद्दी का एक टुकड़ा बन चुकी है? मशहूर आंत्रप्रेन्योर और करियर मेंटॉर अंकुर वारिकू ने इस कड़वे सच से पूरी तरह पर्दा उठाया है। उन्होंने एक वीडियो में एमबीए की जमीनी हकीकत, प्लेसमेंट के गिरते स्तर और एआई के बढ़ते खौफ पर खुलकर बात की है।

लाखों का कर्ज लेकर करनी पड़ती है पढ़ाई?

अंकुर वारिकू अपनी ही टीम की एक 25 साल की लड़की का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि वह सालाना करीब 25 लाख रुपये कमा रही है। वह अपने काम को एन्जॉय करती है, जब चाहे ट्रैवल करती है, और उसे पूरी फ्लेक्सिबिलिटी मिली हुई है। लेकिन इसके बावजूद वो आईएसबी (ISB) से एमबीए करने के सपने देख रही है। वारिकू कहते हैं कि अगर वो या उसके जैसा कोई भी युवा आज के समय में टॉप कॉलेज से एमबीए करने जाता है तो उसे 45 लाख रुपये का भारी-भरकम लोन लेना पड़ेगा। इसके साथ ही, पढ़ाई के दौरान एक साल की पूरी सैलरी का नुकसान भी उठाना होगा। डिग्री पूरी करने के बाद हर महीने 30 से 40 हजार रुपये की भारी ईएमआई का बोझ सिर पर आ गिरेगा। भले ही बाद में 50 लाख का पैकेज मिल जाए, लेकिन उस पैकेज की कीमत आपकी पर्सनल लाइफ, सुकून और वर्क-लाइफ बैलेंस चुकाएगा। जिस आजादी के साथ आप आज काम कर रहे हैं, वो सब खत्म हो जाएगी।

एमबीए का गिरता हुआ क्रे

आजकल एमबीए का क्रेज पहले जैसा कतई नहीं रहा। अगर हम साफ-साफ आंकड़ों पर नजर डालें तो 2024 में जहां लगभग 3.3 लाख छात्रों ने कैट परीक्षा के लिए रजिस्टर किया था, वहीं 2025 में ये आंकड़ा तेजी से गिरकर 2.9 लाख पर आ गया। ऐसा नहीं है कि लोगों ने पढ़ना छोड़ दिया है, लेकिन अब युवाओं का इस डिग्री से मोहभंग हो रहा है। 2011 से लेकर अब तक के रुझान को देखें, तो कैट की रजिस्ट्रेशन में हर साल बमुश्किल 1% का ही इजाफा हुआ है। युवा और प्रोफेशनल्स अब ये समझने लगे हैं कि सिर्फ एक डिग्री के ठप्पे के लिए लाखों का रिस्क लेना कोई समझदारी का सौदा नहीं है।

एआई का खौफ

अखबारों और सोशल मीडिया पर छपने वाली खबरें अक्सर आपको गुमराह करती हैं। 'आईआईएम (IIM) में हाईएस्ट पैकेज डबल हो गया' या '100% प्लेसमेंट का रिकॉर्ड' जैसी हेडलाइंस असलियत का सिर्फ एक छोटा सा और चमकीला हिस्सा हैं। अगर आप गहराई में जाएंगे तो पता चलेगा कि देश के सबसे बेहतरीन इंस्टीट्यूट्स में भी मीडियन सैलरी या तो वहीं रुकी हुई है या महंगाई दर के हिसाब से असल में घट गई है। टियर-2 के बहुत से आईआईएम में तो 100% प्लेसमेंट भी नहीं हो पा रही है और छात्रों को मजबूरी में प्लेसमेंट से बाहर होने का रास्ता चुनना पड़ता है। इसके पीछे एक बहुत बड़ा विलेन, या यूं कहें कि एआई गेम-चेंजर है। पहले जिन बड़े मैनेजमेंट रोल्स में एक्सेल शीट, पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन और रिसर्च के काम के लिए दर्जनों फ्रेशर्स को हायर किया जाता था, आज वो सारा काम एआई चुटकियों में कर रहा है। कंसल्टिंग, इन्वेस्टमेंट बैंकिंग और प्रोडक्ट मैनेजमेंट जैसी टॉप-टियर नौकरियां भी तेजी से ऑटोमेट हो रही हैं। बड़ी कंपनियां अब बहुत सारे स्मार्ट लोगों की फौज खड़ी करने के बजाय, कुछ चुनिंदा ऐसे लोग चाहती हैं जो एआई का सही इस्तेमाल करके कई लोगों के बराबर का काम अकेले कर सकें।

अंकुर वारिकू के मुताबिक, अगर आप किसी छोटे-मोटे या टियर-2 कॉलेज से एमबीए करने का सोच रहे हैं, तो रुकिए और दोबारा विचार कीजिए। ऐसे कॉलेजों में 10 से 15 लाख रुपये का भारी-भरकम लोन लेकर पढ़ाई करना एक बेहद खतरनाक जाल है। इसके बाद जब आप मार्केट में नौकरी ढूंढने निकलते हैं, तो 3 से 5 लाख की नौकरी के लिए भी धक्के खाने पड़ते हैं। फिर जवानी का एक लंबा वक्त सिर्फ लोन चुकाने में गुजर जाता है। वहीं, स्टार्टअप्स की सोच भी अब पूरी तरह बदल चुकी है। उन्हें अब सूट-बूट पहनने वाले पारंपरिक एमबीए ग्रैजुएट्स की जरूरत नहीं है। अंकुर की मानें तो उन्हें 'हसलर्स' चाहिए, ऐसे लोग जो जमीन पर उतरकर काम कर सकें जिन्हें प्रैक्टिकल काम का तजुर्बा हो।

तो फिर आखिर रास्ता क्या है?

अंकुर वारिकू की सलाह यहां एकदम साफ है। अगर आपको देश के टॉप 10 या 15 संस्थानों (जैसे आईआईएम-अहमदाबाद, आईआईएम-बैंगलोर, आईआईएम-कलकत्ता, आईएसबी, एफएमएस) में दाखिला मिल जाता है, तो बिना कुछ सोचे-समझे चले जाइए। भले ही वहां से आपको तुरंत तगड़ा रिटर्न न दिखे, लेकिन वहां जो शानदार नेटवर्क मिलेगा, जो ग्लोबल एक्सपोजर मिलेगा, और जिन बेहतरीन दिमाग वाले लोगों के साथ आप वक्त गुजारेंगे, वो आपकी जिंदगी और सोचने का नजरिया पूरी तरह बदल कर रख देगा।

लेकिन, अगर आपको टॉप 15 के बाहर किसी भी ऐरे-गैरे कॉलेज में एडमिशन मिल रहा है, तो वो डिग्री महज एक कागज का टुकड़ा साबित होगी। अंकुर की मानें तो आज की इंडस्ट्री सिर्फ स्किल्स मांगती है। कोई बूटकैंप जॉइन कीजिए, इंटर्नशिप कीजिए, डेटा एनालिटिक्स या सेल्स का शॉर्ट-टर्म कोर्स करके खुद को अपस्किल बनाइए। अगर भविष्य में किसी बहुत बड़े पद के लिए एमबीए की सख्त जरूरत पड़ी ही, तो कंपनियां खुद आपके एग्जीक्यूटिव एमबीए का खर्च उठाने के लिए तैयार बैठी हैं। इसलिए, महज एक दिखावे के ठप्पे के लिए अपनी उम्र और पैसा बर्बाद न करें, बल्कि अपनी काबीलियत को निखारने पर जोर दें।

Himanshu Tiwari

लेखक के बारे में

Himanshu Tiwari

शॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।

परिचय एवं अनुभव
हिमांशु तिवारी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। बीते 10 सालों से वह लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस वक्त लाइव हिन्दुस्तान में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और बीते 3 साल से वह इस संस्थान से जुड़े हैं। शिक्षा, करियर, नौकरियों, नीट, जेईई, बैंकिंग, एसएससी और यूपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी और आरपीएससी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी खास पकड़ मानी जाती है। हिमांशु ने साल 2016 में पत्रकारिता की शुरुआत एबीपी न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म से किया। इसके बाद वह इंडिया टीवी और जी न्यूज (डीएनए) जैसे बड़े न्यूज चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी हिस्सा रह चुके हैं। हिमांशु तिवारी सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक सजग पाठक और आजीवन विद्यार्थी हैं, उनकी यही खूबी उनके कार्य में परिलक्षित होती है। उनका मानना है कि इन परीक्षाओं से जुड़ी सही और समय पर जानकारी लाखों युवाओं के भविष्य को दिशा दे सकती है, इसलिए वह इस बीट को सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।

लेखन की सोच और मकसद
हिमांशु के लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ सूचना देना नहीं है, बल्कि पाठक को सोचने की जगह देना भी है। खासकर करियर और शिक्षा के क्षेत्र में वह यह मानते हैं कि एक गलत या अधूरी खबर किसी छात्र की पूरी तैयारी को भटका सकती है। इसलिए उनके लेखन में सरल भाषा, ठोस तथ्य और व्यावहारिक नजरिया हमेशा प्राथमिकता में रहता है। उनकी कोशिश रहती है कि पाठक को सिर्फ खबर की जानकारी ही न हो, बल्कि यह भी समझ आए कि उस खबर का उसके जीवन और भविष्य से क्या रिश्ता है।

शिक्षा और अकादमिक पृष्ठभूमि
हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।

रुचियां और निजी झुकाव
काम से इतर हिमांशु की गहरी रुचि समकालीन इतिहास, समानांतर सिनेमा और दर्शन में रही है। राजनीति और विदेश नीति पर पढ़ना-लिखना उन्हें विशेष रूप से पसंद है। इसी रुचि के चलते उन्होंने दो लोकसभा चुनावों और दर्जनों विधानसभा चुनावों की कवरेज की, जहां राजनीति को उन्होंने बेहद नजदीक से देखा और समझा। चुनावी आंकड़ों की बारीकियां, नेताओं के भाषण, जमीनी मुद्दे और जनता की प्रतिक्रियाएं, इन सभी पहलुओं को समेटते हुए उन्होंने सैकड़ों खबरें और विश्लेषण तैयार किए, जो राजनीतिक प्रक्रिया की गहरी समझ को दर्शाते हैं।

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- राजनीति, चुनावी आंकड़ों और जमीनी मुद्दों पर सरल और तथ्यपरक एक्सप्लेनर तैयार करने का अनुभव

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