न कॉल्स, न कोई टेंशन; भारतीय महिला ने बताया नीदरलैंड का वर्क कल्चर, सुनकर हर कोई जाना चाहेगा विदेश
एक भारतीय महिला ने नीदरलैंड्स और भारत के वर्क कल्चर का फर्क बताया है, जहां डच लोग वर्क-लाइफ बैलेंस, परिवार और मेंटल हेल्थ को काम से ज्यादा अहमियत देते हैं। महिला का यह पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

आज के इस भागदौड़ भरे दौर में जब भी कोई पेशेवर इंसान विदेश में नौकरी करने का सपना देखता है, तो उसके पीछे सिर्फ मोटी सैलरी या एक शानदार लाइफस्टाइल ही इकलौती वजह नहीं होती। कई लोगों के लिए यह दफ्तर की उस घुटन भरा कल्चर से बाहर निकलने का एक सीधा रास्ता भी होता है, जहां लॉग आउट करने का कोई तय समय ही नहीं है। भारत में जहां 9 से 5 की नौकरी अक्सर 9 से 9 में बदल जाती है और वीकेंड पर भी चैन नहीं मिलता, वहीं दुनिया के कुछ देश ऐसे भी हैं जहां वर्क-लाइफ बैलेंस को किसी किताब का ज्ञान नहीं, बल्कि जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है। हाल ही में नीदरलैंड्स में रह रही एक भारतीय महिला ने दोनों देशों के वर्क कल्चर का एक ऐसा ही दिलचस्प और आंखें खोलने वाला अनुभव सोशल मीडिया पर शेयर किया है, जिसने इंटरनेट पर एक नई बहस छेड़ दी है।
वायरल वीडियो में खुले डच वर्क कल्चर के राज
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर प्रीति नाम की एक भारतीय मूल की महिला ने अपना निजी अनुभव साझा किया है। प्रीति इन दिनों नीदरलैंड्स में रहकर काम कर रही हैं। उन्होंने एक वीडियो के जरिए उन बड़ी बातों की एक लिस्ट शेयर की, जो नीदरलैंड्स के दफ्तरों को भारत के वर्क कल्चर से बिल्कुल अलग और शायद बेहतर बनाते हैं। उनका यह वीडियो देखते ही देखते वायरल हो गया और बहुत सारे भारतीय प्रोफेशनल्स उनकी बातों से सहमति जताते हुए नजर आए। वहीं, कई लोग इस बात को लेकर भी उत्सुक दिखे कि आखिर इस खूबसूरत और सुकून भरे देश में नौकरी कैसे पाई जा सकती है।
सबसे बड़ा और अहम फर्क जो प्रीति ने वहां महसूस किया, वह है वर्क-लाइफ बैलेंस' का असल सम्मान। हम अक्सर देखते हैं कि भारत में दफ्तर का समय खत्म होने के बाद भी बॉस के वॉट्सऐप मैसेज या क्लाइंट के ईमेल आते रहते हैं, और न चाहते हुए भी आपको उनका जवाब देना ही पड़ता है। लेकिन नीदरलैंड्स में ऐसा बिल्कुल नहीं है। प्रीति अपने पोस्ट के कैप्शन में बड़े ही साफ शब्दों में लिखती हैं, "यहां वर्क-लाइफ बैलेंस की सच में इज्जत की जाती है। जब मेरे काम का दिन खत्म हो जाता है, तो बस खत्म। उसके बाद कोई यह उम्मीद नहीं करता कि आप ऑनलाइन रहेंगे या काम की ईमेल चेक करेंगे।"
परिवार और मानसिक स्वास्थ्य को सबसे ऊपर रखना
डच वर्क कल्चर में इंसान और उसके परिवार को काम से ऊपर रखा जाता है। भारत में कई बार छुट्टी लेने या बच्चों के लिए अचानक समय निकालने पर दफ्तर में आपको अजीब नजरों से देखा जाता है या इसे आपके काम के प्रति 'कमिटमेंट' की कमी मान लिया जाता है। इसके एकदम उलट, प्रीति बताती हैं, "यहां परिवार सबसे पहले आता है। अगर आपको अपने बच्चों को स्कूल से पिक करने जाना है या पैरेंटल लीव (माता-पिता बनने पर मिलने वाली छुट्टी) लेनी है, तो कोई आपको जज नहीं करता। यह यहां बहुत ही आम और सामान्य बात है।" मानसिक स्वास्थ्य यानी मेंटल हेल्थ, जिसे हमारे कॉर्पोरेट जगत में अक्सर सिर्फ एचआर की एक कागजी औपचारिकता मान कर नजरअंदाज कर दिया जाता है, उसे नीदरलैंड्स में बहुत ही ज्यादा गंभीरता से लिया जाता है। अगर कोई कर्मचारी मानसिक रूप से थका हुआ महसूस कर रहा है, तो उसे ब्रेक लेने का पूरा हक है। फ्लेक्सिबल वर्किंग के इंतजाम वहां के सिस्टम में बहुत गहराई से रचे-बसे हैं।
लंबे घंटों से ज्यादा स्मार्ट वर्क पर जोर
काम करने के तरीके में भी वहां जमीन-आसमान का फर्क है। वहां कर्मचारियों से यह उम्मीद बिल्कुल नहीं की जाती कि वे बस दफ्तर की कुर्सियां तोड़ें और लंबी-लंबी शिफ्ट करें। प्रीति के मुताबिक, "नीदरलैंड्स में ज्यादा देर तक काम करने से ज्यादा तरजीह 'स्मार्ट तरीके से काम करने' को दी जाती है।" इसके अलावा दफ्तर की मीटिंग्स को लेकर भी डच लोग काफी सख्त और पाबंद होते हैं। मीटिंग्स अपने तय समय पर शुरू होती हैं और बिल्कुल सही समय पर खत्म भी हो जाती हैं, ताकि किसी का वक्त बर्बाद न हो। इसके साथ ही, कर्मचारियों को पेड हॉलिडे (सवेतन छुट्टियां) लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है ताकि वे तरोताजा महसूस कर सकें। सबसे अच्छी बात जो कई भारतीय कर्मचारियों को हैरान कर सकती है, वह है भरोसा। वहां के मैनेजर अपने एम्प्लॉइज के सिर पर हर वक्त सवार नहीं रहते (यानी माइक्रो-मैनेजमेंट नहीं करते), बल्कि उन पर भरोसा जताते हैं। कर्मचारियों को इस बात पर आंका जाता है कि उनका प्रदर्शन और आउटपुट कैसा है, न कि इस बात पर कि वे कितनी देर तक अपनी डेस्क पर बैठे रहे।
इंटरनेट पर उमड़े सवाल और लोगों की प्रतिक्रियाएं
प्रीति ने अपनी पोस्ट के आखिर में लोगों से पूछा था, "क्या आपने दोनों देशों में काम किया है? आपने सबसे बड़ा फर्क क्या महसूस किया है?" इस सवाल और उनकी रील के वायरल होने के बाद कमेंट सेक्शन में सवालों, बहसों और लोगों के निजी अनुभवों की मानो एक बाढ़ सी आ गई। कई भारतीय यूजर्स, जो अक्सर यहां के थका देने वाले वर्क कल्चर से जूझते हैं, उन्होंने विदेशों में नौकरी पाने के तरीके पूछने शुरू कर दिए। एक यूजर ने कमेंट करते हुए पूछा, "मुझे वीजा स्पॉन्सर्ड जॉब कैसे मिल सकती है, कृपया कोई रास्ता बताएं?" वहीं एक अन्य शख्स ने प्रीति के काम के बारे में जानने की इच्छा जताते हुए पूछा, "मैम, आप किस प्रोफेशन में हैं?" एक तीसरे यूजर ने प्रीति की एक-एक बात से पूरी तरह सहमति जताते हुए बस इतना लिखा, "हां, आपकी बात से मैं पूरी तरह सहमत हूं।"
लेखक के बारे में
Himanshu Tiwariशॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।
परिचय एवं अनुभव
हिमांशु तिवारी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। बीते 10 सालों से वह लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस वक्त लाइव हिन्दुस्तान में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और बीते 3 साल से वह इस संस्थान से जुड़े हैं। शिक्षा, करियर, नौकरियों, नीट, जेईई, बैंकिंग, एसएससी और यूपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी और आरपीएससी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी खास पकड़ मानी जाती है। हिमांशु ने साल 2016 में पत्रकारिता की शुरुआत एबीपी न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म से किया। इसके बाद वह इंडिया टीवी और जी न्यूज (डीएनए) जैसे बड़े न्यूज चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी हिस्सा रह चुके हैं। हिमांशु तिवारी सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक सजग पाठक और आजीवन विद्यार्थी हैं, उनकी यही खूबी उनके कार्य में परिलक्षित होती है। उनका मानना है कि इन परीक्षाओं से जुड़ी सही और समय पर जानकारी लाखों युवाओं के भविष्य को दिशा दे सकती है, इसलिए वह इस बीट को सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।
लेखन की सोच और मकसद
हिमांशु के लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ सूचना देना नहीं है, बल्कि पाठक को सोचने की जगह देना भी है। खासकर करियर और शिक्षा के क्षेत्र में वह यह मानते हैं कि एक गलत या अधूरी खबर किसी छात्र की पूरी तैयारी को भटका सकती है। इसलिए उनके लेखन में सरल भाषा, ठोस तथ्य और व्यावहारिक नजरिया हमेशा प्राथमिकता में रहता है। उनकी कोशिश रहती है कि पाठक को सिर्फ खबर की जानकारी ही न हो, बल्कि यह भी समझ आए कि उस खबर का उसके जीवन और भविष्य से क्या रिश्ता है।
शिक्षा और अकादमिक पृष्ठभूमि
हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।
रुचियां और निजी झुकाव
काम से इतर हिमांशु की गहरी रुचि समकालीन इतिहास, समानांतर सिनेमा और दर्शन में रही है। राजनीति और विदेश नीति पर पढ़ना-लिखना उन्हें विशेष रूप से पसंद है। इसी रुचि के चलते उन्होंने दो लोकसभा चुनावों और दर्जनों विधानसभा चुनावों की कवरेज की, जहां राजनीति को उन्होंने बेहद नजदीक से देखा और समझा। चुनावी आंकड़ों की बारीकियां, नेताओं के भाषण, जमीनी मुद्दे और जनता की प्रतिक्रियाएं, इन सभी पहलुओं को समेटते हुए उन्होंने सैकड़ों खबरें और विश्लेषण तैयार किए, जो राजनीतिक प्रक्रिया की गहरी समझ को दर्शाते हैं।
विशेषज्ञताएं
- शिक्षा, करियर और नौकरियों से जुड़ी खबरों पर विशेष रुचि और निरंतर लेखन
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- अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और विदेश नीति से जुड़े विषयों का विश्लेषणात्मक लेखन
- राजनीति, चुनावी आंकड़ों और जमीनी मुद्दों पर सरल और तथ्यपरक एक्सप्लेनर तैयार करने का अनुभव


