जिस लड़की को परिवार ने बोझ समझा, वही बनी IAS, 3 बार क्रैक किया UPSC; रोंगटे खड़े कर देगी कहानी
गरीबी और तानों को मात देकर श्वेता अग्रवाल ने लगातार तीन बार यूपीएससी परीक्षा पास की और आईएएस अफसर बनकर देश भर के युवाओं के लिए एक बड़ी मिसाल बनीं।

कभी-कभी किस्मत से ज्यादा आपके हौसले इस बात का फैसला करते हैं कि आप जिंदगी में कहां तक जाएंगे। जरा सोचिए एक बच्ची जिसके पैदा होने पर घर के ही बुजुर्गों ने खुश होने के बजाय माता-पिता से कहा हो कि 'या तो लड़का पैदा करो या फिर किसी लड़के को गोद ले लो, क्योंकि खानदान का नाम तो लड़के ही आगे बढ़ाते हैं'। उसी लड़की ने जब कामयाबी की उड़ान भरी, तो पूरे देश में उसका नाम गूंज उठा। हम बात कर रहे हैं श्वेता अग्रवाल की, जिन्होंने समाज के तीखे तानों और गरीबी की मोटी जंजीरों को तोड़कर देश की सबसे कठिन परीक्षा यूपीएससी (UPSC) को एक नहीं, बल्कि लगातार तीन बार पास किया। एक बेहद शानदार और रोंगटे खड़े कर देने वाली श्वेता की यह कहानी हर उस युवा के लिए एक जीती-जागती मिसाल है, जो अपने हालातों से हार मान लेता है। आइए तफसील से जानते हैं भद्रेश्वर के छोटे से कस्बे से निकलकर आईएएस अफसर बनने तक के उनके इस हैरतअंगेज सफर को।
बचपन की बंदिशें के बाद खूब किया संघर्ष
श्वेता की कहानी पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के एक बेहद छोटे और शांत कस्बे भद्रेश्वर से शुरू होती है। उनका जन्म एक रूढ़िवादी मारवाड़ी परिवार में हुआ था। परिवार में 25-30 लोग थे, लेकिन लड़कियों की पढ़ाई को लेकर किसी की सोच बहुत आगे नहीं थी। अमूमन लड़कियों की शादी 18-19 साल की उम्र में कर दी जाती थी। लेकिन श्वेता के माता-पिता ने ठान लिया था कि वे अपनी बेटी को बेहतरीन अंग्रेजी शिक्षा देंगे।
इसके लिए उनके पिता ने कई छोटे-मोटे काम किए। कभी परचून की दुकान तो कभी कुछ और लेकिन जब कोई काम नहीं चला तो उन्होंने दिहाड़ी मजदूर तक का काम किया। एक वक्त ऐसा भी था जब उनके पिता दिन भर में सिर्फ 10 रुपये कमाते थे, ताकि उसमें से 5-6 रुपये बचाकर श्वेता की 165 रुपये महीने की स्कूल फीस भरी जा सके। श्वेता भी बचपन से ही बेहद समझदार थीं। रिश्तेदारों से मिलने वाले शगुन के पैसों की वह कभी चॉकलेट नहीं खाती थीं, बल्कि वो पैसे अपनी मां को लाकर दे देती थीं ताकि स्कूल की फीस जमा हो सके। सात-आठ साल की उम्र में ही उन्हें यह समझ आ गया था कि सिर्फ मन लगाकर पढ़ाई करना ही वह इकलौता जरिया है, जिससे वह अपने माता-पिता के संघर्ष को सार्थक बना सकती हैं।
डेलॉयट की शानदार नौकरी तक
स्कूली पढ़ाई के बाद जब कॉलेज जाने का वक्त आया तो श्वेता को मशहूर सेंट जेवियर्स कॉलेज में दाखिला मिल गया। उनके खानदान में किसी ने भी ग्रेजुएशन नहीं किया था। ऐसे में ताने मिलने लाजमी थे। एक रिश्तेदार ने यहां तक कह दिया, "पढ़-लिखकर आखिर क्या करना है? अंत में तो चौका-बर्तन ही करना है।" लेकिन श्वेता ने इन बातों को दिल पर लेने के बजाय अपनी मेहनत को हथियार बनाया। उन्होंने 2008 में इकोनॉमिक्स में फर्स्ट क्लास से ग्रेजुएशन किया और परिवार की पहली ग्रेजुएट बनीं। इसके बाद उन्होंने एमबीए पूरा किया और दुनिया की जानी-मानी मल्टीनेशनल कंपनी डेलॉयट में शानदार नौकरी हासिल कर ली। लेकिन उनकी मंजिल ये कॉर्पोरेट दफ्तर कतई नहीं था।
डीएम बनने की जिद
बचपन में घर के पास एक पुलिस स्टेशन था जहां खाकी वर्दी देखकर श्वेता काफी आकर्षित होती थीं। वहीं 17 साल की उम्र में एक सरकारी दफ्तर में जब उन्हें अपने एक छोटे से काम के लिए घंटों दर-दर भटकना पड़ा तो गुस्से में उन्होंने वहां के कर्मचारियों से बांग्ला में कहा था, "ऐक दिन आमी डीएम होया एशबो। (एक दिन मैं डीएम बनकर आऊंगी)।"
डेलॉयट में काम करते हुए उन्हें अपना यही सपना बार-बार पुकार रहा था। आखिरकार, उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया और अपनी अच्छी-खासी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। जब उनके मैनेजर ने उन्हें समझाया कि यूपीएससी में हर साल 5 लाख लोग बैठते हैं और सिर्फ 90 आईएएस बनते हैं, तो श्वेता का आत्मविश्वास देखने लायक था। उन्होंने तपाक से कहा, "अगर 90 लोग बनते हैं, तो मैं उन 90 में से एक होऊंगी।" नौकरी छोड़ने के बाद श्वेता ने जमकर तैयारी शुरू की। कोलकाता में एक छोटा सा किराए का कमरा लिया और वहीं डट गईं। खुद खाना बनाना, घर के काम करना और पढ़ाई में जुटे रहना, यही उनकी जिंदगी बन गई। इस दौरान समाज फिर उंगली उठाने लगा कि लड़की 24-25 साल की हो गई है, इसकी शादी क्यों नहीं कर देते। श्वेता कई बार मानसिक रूप से टूट भी जाती थीं लेकिन उनके माता-पिता ने उन पर हमेशा अटूट भरोसा जताया।
लगातार तीन क्रैक की यूपीएससी
2013 में जब यूपीएससी का सिलेबस बदला तब भी श्वेता घबराई नहीं। उन्होंने अपनी पहली परीक्षा दी और 497वीं रैंक के साथ इंडियन रेवेन्यू सर्विस (आईआरएस) में जगह बनाई। लेकिन उनकी भूख अभी शांत नहीं हुई थी। नौकरी के साथ फिर से तैयारी करना आसान नहीं होता, फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। 2015 में उन्होंने दोबारा परीक्षा दी और इस बार 141वीं रैंक के साथ आईपीएस का पद हासिल किया। खाकी वर्दी का उनका बचपन का सपना पूरा हो चुका था। पर दिल के किसी कोने में वो 17 साल वाली लड़की अभी भी डीएम बनने की जिद पाले बैठी थी। अपने इस भीतरी आवाज को शांत करने के लिए उन्होंने 2016 में अपना आखिरी दांव खेला। इस बार जो हुआ वो इतिहास था। श्वेता ने पूरे देश में 19वीं रैंक हासिल की और पश्चिम बंगाल की टॉपर बनीं।


