‘UPSC नहीं चुनता तो रिक्शा चलाता’, बचपन के अपमान को बनाया ताकत; 22 की उम्र में बना IAS अफसर

By Prachi
लाइव हिन्दुस्तान
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IAS Govind Jaiswal Success Story: उत्तर प्रदेश के वाराणसी के रहने वाले गोविंद जायसवाल की, जिन्होंने साल 2006 की यूपीएससी (UPSC) परीक्षा में अपने पहले ही प्रयास में ऑल इंडिया 48वीं रैंक हासिल कर आईएएस (IAS) बनने का गौरव प्राप्त किया

IAS Govind Jaiswal

UPSC Success Story of Govind Jaiswal: यह कहानी है एक ऐसे जांबाज की, जिसने अभावों को अपनी ताकत बनाया, जिसने समाज के तानों को अपने संकल्प की आग में झोंक दिया और देश की सबसे कठिन परीक्षा में इतिहास रच दिया। यह संघर्ष गाथा है उत्तर प्रदेश के वाराणसी के रहने वाले गोविंद जायसवाल की, जिन्होंने साल 2006 की यूपीएससी (UPSC) परीक्षा में अपने पहले ही प्रयास में ऑल इंडिया 48वीं रैंक हासिल कर आईएएस (IAS) बनने का गौरव प्राप्त किया। उनकी यह यात्रा आज देश के उन करोड़ों युवाओं के लिए सबसे बड़ी प्रेरणा है जो गरीबी या अंग्रेजी न जानने को अपनी कमजोरी मान लेते हैं।

गरीबी में बीता बचपन और मां का साया उठना

गोविंद जायसवाल का बचपन बेहद तंगहाली और कठिन परिस्थितियों के बीच बीता। वाराणसी के अलईपुरा इलाके में उनका पांच लोगों का परिवार महज 10x12 की एक छोटी सी कोठरी में रहता था। उनके पिता नारायण एक पैर में गहरी चोट होने के बावजूद रिक्शा चलाकर किसी तरह घर का खर्च चलाते थे। गोविंद के जीवन में दुखों का पहाड़ तब टूटा, जब वे महज 7वीं कक्षा में थे और उनकी मां का ब्रेन हेमरेज के कारण आकस्मिक निधन हो गया। मां के इलाज में जमा-पूंजी खर्च हो जाने से परिवार पूरी तरह कर्ज और भयंकर आर्थिक तंगी में डूब गया।

11 साल की उम्र का वो अपमान, जिसने बदल दी जिंदगी

गोविंद जब 11 साल के थे, तब वे अपने एक अमीर दोस्त के घर खेलने गए थे। वहां दोस्त के पिता ने जब यह जाना कि गोविंद के पिता रिक्शा चलाते हैं, तो उन्होंने गोविंद को बेहद खरी-खोटी सुनाई, उनका अपमान किया और घर से बाहर निकाल दिया। उस मासूम उम्र में गोविंद को यह बात समझ नहीं आई कि गरीबी के कारण ऐसा व्यवहार क्यों किया गया। जब उन्होंने एक बुजुर्ग से पूछा कि समाज में सबसे बड़ा और सम्मानजनक पद कौन सा होता है, तो उन्हें जवाब मिला—आईएएस (IAS) अधिकारी। बस उसी दिन, उस 11 साल के बच्चे ने ठान लिया कि वह बड़ा होकर प्रशासनिक अधिकारी ही बनेगा। वह अपमान उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गया।

"ऑटो चलाओ" के ताने और पिता का ऐतिहासिक त्याग

पड़ोसी और समाज के लोग अक्सर गोविंद और उनके पिता को ताने मारते थे कि पढ़ाई-लिखाई से क्या होगा, गोविंद को ऑटो रिक्शा चला लेना चाहिए और बहनों को दूसरों के घरों में बर्तन मांजने भेज देना चाहिए। लेकिन गोविंद चुपचाप मेहनत करते रहे। ग्रेजुएशन के बाद जब गोविंद ने सिविल सेवा की तैयारी की इच्छा जताई, तो उनके दिव्यांग पिता ने अटूट विश्वास दिखाया। पिता ने अपने जीवन की आखिरी उम्मीद—अपनी जमीन का इकलौता टुकड़ा और अपने 14 रिक्शे बेच दिए, ताकि वे बेटे को पढ़ाई के लिए दिल्ली भेज सकें।

दिल्ली का संघर्ष: ट्यूशन पढ़ाया और भूखे सोए

दिल्ली पहुंचने के बाद गोविंद जानते थे कि उनके पास असफल होने या दूसरे प्रयास का कोई विकल्प नहीं है। वहां तंग कमरों और बिजली की कटौती के बीच उन्होंने 18 से 20 घंटे पढ़ाई की। पैसे बचाने के लिए उन्होंने बच्चों को गणित की ट्यूशन पढ़ाई और कई बार एक वक्त का खाना तक छोड़ दिया और भूखे सोए। हिंदी माध्यम होने के कारण कुछ लोगों ने उनके चयन पर संदेह जताया, लेकिन गोविंद का मानना था कि भाषा कभी आपकी योग्यता की बाधा नहीं बन सकती, बशर्ते आपके भीतर आत्मविश्वास हो।

"अगर मैं यूपीएससी का रास्ता नहीं चुनता, तो मुझे भी रिक्शा ही चलाना पड़ता"

साल 2006 में जब यूपीएससी का परिणाम आया, तो महज 22 साल की उम्र में गोविंद जायसवाल ने पहले ही प्रयास में 48वीं रैंक हासिल कर देश को चौंका दिया। जैसे ही परिणाम आया, पूरे बनारस में जश्न का माहौल था। गोविंद ने अपनी सफलता के बाद कहा था, "अगर मैं यूपीएससी का रास्ता नहीं चुनता, तो मुझे भी रिक्शा ही चलाना पड़ता।" अपनी पहली सैलरी मिलते ही गोविंद ने जो सबसे पहला काम किया, वह था—वर्षों से दर्द झेल रहे अपने पिता के पैरों का बेहतरीन और सही इलाज करवाना। गोविंद जायसवाल की यह कहानी साबित करती है कि अगर इरादे फौलादी हों, तो किस्मत को भी अपना रास्ता बदलना पड़ता है।

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शॉर्ट बायो: प्राची लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में कंटेंट प्रोड्यूसर हैं। पिछले 2 वर्षों से वे करियर, शिक्षा और सरकारी नौकरियों से जुड़े विषयों पर लिख रही हैं। मुश्किल खबरों को आसान भाषा में पाठकों तक पहुंचाना उनकी विशेषता है। वे 2024 से लाइव हिन्दुस्तान की करियर टीम का हिस्सा हैं।

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