कैसे चार देशों का विचार बना 11 देशों का ताकतवर वैश्विक मंच, कैसे बना ब्रिक्स; क्यों है इतना अहम
ब्रिक्स आज दुनिया के सबसे ताकतवर राजनीतिक मंचों में से एक है। इस बार इस मंच की अगुवाई भारत कर रहा है। कैसे बना ब्रिक्स आइए जानते हैं।

बीते दो दशकों में दुनिया का सियासी और आर्थिक नक्शा बहुत तेजी से बदला है और इस बदलाव के ठीक बीचों-बीच ब्रिक्स (BRICS) भी खड़ा है। साल 2001 में 'गोल्डमैन सैक्स' के एक अर्थशास्त्री ने महज एक शब्द 'BRIC' नाम उछाला था, जिसका मकसद ब्राजील, रूस, भारत और चीन जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की ताकत को दुनिया के सामने लाना था। लेकिन आज यह कोई बोर्डरूम की चर्चा या महज कागजी शब्द नहीं रहा। यह चार महाद्वीपों में फैला एक ऐसा ताकतवर मंच बन चुका है जो ग्लोबल साउथ यानी दुनिया के विकासशील मुल्कों की बुलंद आवाज है। 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का आयोजन हो रहा है, इस बार कमान भारत के हाथों में है।
तेजी से बढ़ता ब्रिक्स का कुनबा
आज ब्रिक्स का दायरा बहुत बड़ा हो चुका है। साल 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने से यह BRIC से BRICS बना और फिर 2024 और 2025 में हुए ऐतिहासिक विस्तार ने इसकी पूरी शक्ल ही बदल दी। मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, यूएई और इंडोनेशिया के शामिल होने के बाद अब ब्रिक्स 11 मुल्कों का एक बेहद मजबूत कुनबा है। अगर इन देशों की ताकत का अंदाजा लगाना हो, तो बस इस आंकड़े पर नजर डाल आप अनुमान लगा सकेंगे कि यह कितने बड़े स्तर का है। दुनिया की 49.5 फीसदी आबादी, 40 फीसदी ग्लोबल जीडीपी और 26 फीसदी अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर आज सिर्फ ब्रिक्स देशों का ही कब्जा है। इसके अलावा 10 नए पार्टनर देश (जैसे मलेशिया, वियतनाम, कजाकिस्तान आदि) भी इस ढांचे का हिस्सा बन चुके हैं, जो एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में इसके बढ़ते दबदबे का सीधा सबूत है। 2008 के आर्थिक संकट ने जब पश्चिमी देशों के बनाए वैश्विक फाइनेंस सिस्टम की कमियां उजागर कीं तब से ही इन देशों ने न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) जैसी संस्थाएं बनाकर खुद को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम किया है।
18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की भारत कर रहा अगुवाई
यह चौथी बार है जब भारत इस महाशक्तिशाली समूह की अध्यक्षता कर रहा है। इससे पहले 2012, 2016 और 2021 में भी भारत ने अपनी लीडरशिप से ब्रिक्स को नई राह दिखाई थी। 2026 की अध्यक्षता का थीम बहुत ही साफ और असरदार है, जिसमें लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण पर जोर दिया गया है। भारत की कोशिश है कि यह संगठन सिर्फ बड़ी-बड़ी कूटनीतिक बातों तक सीमित न रहे, बल्कि जमीनी स्तर पर ऐसे समाधान निकाले जाएं जो सीधे इंसानियत के काम आएं। इस साल भारत की अध्यक्षता में अब तक 25 अलग-अलग शहरों में 350 से ज्यादा बैठकें हो चुकी हैं।
भारत का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड
भारत का ब्रिक्स के साथ सफर हमेशा से कुछ नया गढ़ने का रहा है। 2012 में जब दिल्ली में सम्मेलन हुआ था तो उसी वक्त न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) का आइडिया सामने रखा गया था। 2016 के गोवा समिट में भारत ने आतंकवाद के खिलाफ दुनिया को एक साथ किया और बिम्सटेक (BIMSTEC) देशों को जोड़कर ब्रिक्स का दायरा बढ़ाया। 2021 में, वैक्सीन रिसर्च सेंटर जैसी अहम चीजें भारत की अगुवाई में ही परवान चढ़ीं।
आज जब दुनिया अलग-अलग खेमों में बंटी हुई है, युद्ध, तकनीकी उथल-पुथल और तनाव का माहौल है, तब ब्रिक्स एक ऐसा प्लेटफॉर्म बनकर उभरा है जहां अलग-अलग विचारधाराओं वाले देश भी एक साथ बैठते हैं और तरक्की की बात करते हैं। भारत, एक ऐसे नेता के रूप में, जो सबकी बात सुनता है और बीच का रास्ता निकालने में माहिर है, ब्रिक्स को एक न्यायसंगत और समावेशी वैश्विक व्यवस्था की सबसे बड़ी ढाल बनाने में जुटा है। कुल मिलाकर, 2001 का वह छोटा सा 'BRIC' अब एक विशाल बरगद का पेड़ बन चुका है। नई दिल्ली के भारत मंडपम से जब 11 देशों के राष्ट्राध्यक्ष और 10 पार्टनर देशों के प्रतिनिधि दुनिया को संबोधित करेंगे, तो यह इस बात का सीधा पैगाम होगा कि अब दुनिया का मुस्तकबिल ग्लोबल साउथ ही तय करेगा। भारत, इस पूरी प्रक्रिया का सिर्फ गवाह नहीं बल्कि इसका सबसे बड़ा सूत्रधार है।


