
NCERT की नई किताब से कई चैप्टरों के ‘गायब’ होने पर सरकार ने दी सफाई, राज्यों के पास विकल्प क्या
नई किताबों को लेकर मिले फीडबैक के बाद NCERT ने 7 अगस्त को एक विशेषज्ञ समिति बनाने का फैसला किया है। इस समिति में नामी संस्थानों के विशेषज्ञ और संबंधित विषय के प्रोफेसर होंगे।
NCERT की क्लास 8 सोशल साइंस की नई किताब इन दिनों सुर्खियों में है। वजह है इसमें टीपू सुल्तान, हैदर अली और 1700 के दशक के एंग्लो-मैसूर युद्धों का जिक्र न होना। संसद में सवाल उठने पर केंद्र सरकार ने साफ किया कि राज्यों को आजादी है कि वे अपने हिसाब से क्षेत्रीय इतिहास और शख्सियतों को अपनी पाठ्यपुस्तकों में शामिल कर सकते हैं।

टीओआई की रिपोर्ट की मानें तो राज्यसभा में शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने बताया कि शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची में आती है। ऐसे में NCERT का फ्रेमवर्क एक राष्ट्रीय आधार देता है, लेकिन राज्य सरकारें चाहें तो NCERT की किताबें अपनाने, उनमें बदलाव करने या अपनी किताबें तैयार करने के लिए स्वतंत्र हैं। उन्होंने कहा, “राज्य सरकारें अपने क्षेत्र के ऐतिहासिक किरदारों और घटनाओं को ज्यादा विस्तार से कवर कर सकती हैं।”
विशेषज्ञ समिति करेगी समीक्षा
गौरतलब है कि नई किताबों को लेकर मिले फीडबैक के बाद NCERT ने 7 अगस्त को एक विशेषज्ञ समिति बनाने का फैसला किया है। इस समिति में नामी संस्थानों के विशेषज्ञ और संबंधित विषय के प्रोफेसर होंगे, जबकि समिति का संयोजक NCERT के पाठ्यक्रम विभाग का प्रमुख होगा। यह समिति सबूतों के आधार पर सामग्री और पढ़ाने के तरीकों पर विचार करके अपनी सिफारिशें जल्द देगी।
NCERT के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “NEP 2020 के तहत तैयार किए गए नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क के अनुसार किताबें बनाई गई हैं। हमें कुछ किताबों की सामग्री पर सुझाव मिले हैं, इसलिए समिति बनाई जा रही है, जो स्थापित प्रक्रिया के तहत समीक्षा करेगी।”
नए पाठ्यक्रम में बदलाव
यह पहली बार है जब दिल्ली सल्तनत, मुगल, मराठा और औपनिवेशिक काल के पूरे अध्याय को क्लास 8 में रखा गया है। पहले इनका कुछ हिस्सा क्लास 7 में पढ़ाया जाता था। नई किताब में अकबर के शासन को “क्रूरता” और “सहिष्णुता” का मिश्रण बताया गया है, बाबर को “निर्दयी विजेता” और औरंगजेब को “सैन्य शासक” कहा गया है जिसने गैर-मुसलमानों पर फिर से टैक्स लगाया था।
सरकार का कहना है कि यह बदलाव नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फॉर स्कूल एजुकेशन 2023 की सिफारिशों के अनुरूप है और राज्यों को पर्याप्त गुंजाइश दी गई है कि वे अपने स्थानीय इतिहास को पढ़ाने में पीछे न रहें। अब नज़रें विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो तय करेगी कि क्या किताब में और बदलाव या जोड़ने की ज़रूरत है।





