'बदलिए काम के कायदे', रात 9 बजे की मीटिंग को जेन-जी की ना, पोस्ट वायरल
लिंक्डइन पर एक जेन जी कर्मचारी की कहानी वायरल हो रही है जिसने रात 9 बजे की अर्जेंट मीटिंग में शामिल होने से साफ मना कर दिया

आजकल के दफ्तरों का माहौल कुछ ऐसा हो गया है कि कब दिन ढल जाता है और कब रात के 9 बज जाते हैं पता ही नहीं चलता। अक्सर कंपनियों में काम करने वाले लोग इस बात से वाकिफ होंगे कि कैसे एक छोटी सी अर्जेंट मीटिंग आपके पूरी शाम का सुकून छीन सकती है। लेकिन आजकल की नई पीढ़ी जिसे हम 'जेन जी' कहते हैं, उन्होंने इस पुराने और थकाऊ सिस्टम को चुनौती देना शुरू कर दिया है। वो अब चुपचाप ओवरटाइम करने या अपनी पर्सनल लाइफ को दांव पर लगाने के मूड में बिल्कुल नजर नहीं आते। इसी कड़ी में लिंक्डइन पर एक पोस्ट इन दिनों खूब वायरल हो रही है।
यह पूरा मामला तब सामने आया जब संचित गोयल नाम के एक यूजर ने लिंक्डइन पर एक घटना का जिक्र किया। उनकी पोस्ट के मुताबिक, एक मैनेजर ने अपनी टीम की एक युवा कर्मचारी को रात 9 बजे एक मीटिंग के लिए इनवाइट भेजा। आमतौर पर ऐसे मौकों पर कर्मचारी न चाहते हुए भी डर या दबाव में लैपटॉप खोलकर बैठ जाते हैं। लेकिन इस लड़की ने जो किया, उसने सबको हैरान कर दिया। जब उसे बताया गया कि यह एक बहुत ही 'जरूरी मीटिंग' है, तो उसने बड़ी बेबाकी से जवाब दिया कि अगर चर्चा वाकई इतनी अहम है, तो इसे ऑफिस के तय समय के दौरान ही रखा जाना चाहिए था।
मैनेजर को दिया जवाब
बात यहीं खत्म नहीं हुई। मैनेजर ने उसे यह कहकर मनाने की कोशिश की कि टीम के बाकी सभी लोग कॉल पर जुड़ चुके हैं। इस पर उस कर्मचारी का जवाब और भी सटीक था। उसने कहा कि बाकी सब लोग पहले से ही काम के बोझ तले बर्नआउट यानी मानसिक और शारीरिक रूप से टूटे होने के शिकार हो चुके हैं, और वह खुद को उस हालत में पहुंचने से बचाना चाहती है।
मैनेजर ने फिर से जोर देते हुए कहा कि "अरे, यह तो बस एक मीटिंग की ही बात है।" लेकिन कर्मचारी अपनी बात पर अड़ी रही। उसका मानना था कि बर्नआउट रातों-रात नहीं होता। देखा जाए तो इसकी शुरुआत ऐसे ही छोटे-छोटे अपवादों से होती है, जो धीरे-धीरे हमारी रूटीन बन जाते हैं और फिर हमें पता भी नहीं चलता कि कब हमारी पर्सनल लाइफ पूरी तरह से खत्म हो गई। इतना कहने के बाद, उसने शाम 6 बजे ही अपना सिस्टम बंद कर दिया और वह उस रात 9 बजे वाली मीटिंग में शामिल नहीं हुई।
इस घटना को शेयर करते हुए संचित गोयल ने बहुत ही पते की बात लिखी, "बर्नआउट होने के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले ही अपनी सीमाएं तय कर लेना ज्यादा बेहतर है।"
जैसे ही यह पोस्ट इंटरनेट पर आई, यह तेजी से वायरल हो गई। इस पोस्ट ने उन तमाम प्रोफेशनल्स की दुखती रग पर हाथ रख दिया जो अक्सर ऑफिस के घंटों के बाद भी काम करने के लिए मजबूर होते हैं। लोगों को लगा कि इस युवा कर्मचारी का जवाब दरअसल उस नई सोच का हिस्सा है, जहां नौजवान अपने काम और निजी जिंदगी के बीच एक सही बैलेंस बनाना चाहते हैं।
सोशल मीडिया पर लोगों का रिएक्शन
इस पूरे वाकये पर इंटरनेट कई धड़ों में बंटा हुआ नजर आया। जहां कुछ लोगों ने उस लड़की की हिम्मत की दाद दी, तो वहीं कुछ ने इसे करियर के लिए नुकसानदायक भी बताया। एक यूजर ने कमेंट करते हुए लिखा, "सही सीमाएं तय करने से आप बर्नआउट से बचते हैं, लेकिन जिम्मेदारी लेने से ही नतीजे मिलते हैं। सबसे बेहतरीन वर्कप्लेस वही होते हैं जहां काम के घंटों के बाद काम करना कोई मजबूरी नहीं, बल्कि एक अपवाद हो। साथ ही, जहां कर्मचारी और बॉस एक-दूसरे के समय की बराबर इज्जत करें।"
एक अन्य यूजर का नजरिया थोड़ा अलग था। उनका मानना था कि मामला सिर्फ अपनी बाउंड्रीज सेट करने का नहीं है, बल्कि आप उसे कैसे सामने रखते हैं, यह ज्यादा मायने रखता है। उन्होंने लिखा, "अपनी सीमाएं तय करना बहुत जरूरी है, लेकिन आपका लहजा (टोन) भी बहुत मायने रखता है। अपने सुकून को बचाने और मैनेजमेंट की नजर में गैर-जिम्मेदार दिखने के बीच बहुत ही बारीक सी लाइन होती है।"
समर्थन में आए लोग
हालांकि, ज्यादातर लोग इस कर्मचारी के साथ खड़े नजर आए। एक शख्स ने खुशी जताते हुए लिखा, "सच कहूं तो, ‘फिर इसे काम के घंटों के दौरान शेड्यूल करें’, यह जवाब सुनने में बहुत ही आसान लगता है, लेकिन कुछ दफ्तरों में इसे बोल पाना किसी क्रांति से कम नहीं है।" एक और यूजर ने कहा, “इस सोच से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। अपनी सीमाएं तय करने का मतलब यह नहीं है कि आप अपने काम के प्रति कमिटेड नहीं हैं। बल्कि सच तो यह है कि लंबे समय तक बेहतर काम करने के लिए ऐसा करना बहुत जरूरी है।”
कुछ लोगों ने किया विरोध
लेकिन जैसा कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, कुछ लोग इस कदम से सहमत नहीं थे। एक यूजर ने तंज कसते हुए टिप्पणी की, "मुझे नहीं लगता कि अब उसे इतनी जल्दी कोई प्रमोशन मिलने वाला है। यह कुछ समय की जीत जरूर हो सकती है, लेकिन लंबे वक्त में यह उसके करियर के लिए एक बड़ा झटका साबित होगा।" इन सबके बीच, कई लोगों ने इसे काम के माहौल में आ रहे एक बड़े बदलाव के तौर पर देखा। एक इंटरनेट यूजर ने लिखा, "जेन ज़ी वाकई में वर्कप्लेस के डायनामिक्स को काफी हद तक बदल रही है, और मैं इस बदलाव को देखकर बहुत खुश हूं।"
लेखक के बारे में
Himanshu Tiwariशॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।
परिचय एवं अनुभव
हिमांशु तिवारी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। बीते 10 सालों से वह लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस वक्त लाइव हिन्दुस्तान में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और बीते 3 साल से वह इस संस्थान से जुड़े हैं। शिक्षा, करियर, नौकरियों, नीट, जेईई, बैंकिंग, एसएससी और यूपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी और आरपीएससी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी खास पकड़ मानी जाती है। हिमांशु ने साल 2016 में पत्रकारिता की शुरुआत एबीपी न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म से किया। इसके बाद वह इंडिया टीवी और जी न्यूज (डीएनए) जैसे बड़े न्यूज चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी हिस्सा रह चुके हैं। हिमांशु तिवारी सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक सजग पाठक और आजीवन विद्यार्थी हैं, उनकी यही खूबी उनके कार्य में परिलक्षित होती है। उनका मानना है कि इन परीक्षाओं से जुड़ी सही और समय पर जानकारी लाखों युवाओं के भविष्य को दिशा दे सकती है, इसलिए वह इस बीट को सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।
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हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।
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काम से इतर हिमांशु की गहरी रुचि समकालीन इतिहास, समानांतर सिनेमा और दर्शन में रही है। राजनीति और विदेश नीति पर पढ़ना-लिखना उन्हें विशेष रूप से पसंद है। इसी रुचि के चलते उन्होंने दो लोकसभा चुनावों और दर्जनों विधानसभा चुनावों की कवरेज की, जहां राजनीति को उन्होंने बेहद नजदीक से देखा और समझा। चुनावी आंकड़ों की बारीकियां, नेताओं के भाषण, जमीनी मुद्दे और जनता की प्रतिक्रियाएं, इन सभी पहलुओं को समेटते हुए उन्होंने सैकड़ों खबरें और विश्लेषण तैयार किए, जो राजनीतिक प्रक्रिया की गहरी समझ को दर्शाते हैं।
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