Hindi Newsकरियर न्यूज़difference between police vs judicial custody crpc 167 explained
पुलिस हिरासत और ज्यूडिशियल कस्टडी में क्या अंतर होता है?

पुलिस हिरासत और ज्यूडिशियल कस्टडी में क्या अंतर होता है?

संक्षेप:

भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 41 से 60 के तहत गिरफ्तारी और हिरासत का प्रावधान है। पुलिस हिरासत और ज्यूडिशियल कस्टडी दो अलग-अलग प्रकार की हिरासत हैं, जो अपराध जांच और न्याय प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

Mon, 20 Oct 2025 11:31 PMNavaneet Rathaur लाइव हिन्दुस्तान
share Share
Follow Us on

भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 41 से 60 के तहत गिरफ्तारी और हिरासत का प्रावधान है। पुलिस हिरासत और ज्यूडिशियल कस्टडी दो अलग-अलग प्रकार की हिरासत हैं, जो अपराध जांच और न्याय प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। CrPC की धारा 167 के अनुसार, गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना अनिवार्य है। आइए, इन दोनों में अंतर विस्तार से समझें।

LiveHindustan को अपना पसंदीदा Google न्यूज़ सोर्स बनाएं – यहां क्लिक करें।

1. पुलिस हिरासत क्या है?

पुलिस हिरासत में आरोपी पुलिस के नियंत्रण में रहता है। यह जांच के प्रारंभिक चरण में होती है, जहां पुलिस अपराध के सबूत इकट्ठा करती है। अधिकतम अवधि 15 दिन होती है, जो मजिस्ट्रेट द्वारा स्वीकृत होती है। उदाहरण: चोरी के मामले में पुलिस पूछताछ, हथियार बरामदगी के लिए आरोपी को 7 दिन की पुलिस हिरासत ले सकती है।

विशेषताएं:

स्थान: पुलिस स्टेशन या लॉक-अप।

उद्देश्य: पूछताछ, बयान दर्ज करना।

अधिकार: पुलिस पूर्ण नियंत्रण रखती है।

2. ज्यूडिशियल कस्टडी क्या है?

ज्यूडिशियल कस्टडी में आरोपी जेल या न्यायिक हिरासत में भेजा जाता है। यह पुलिस हिरासत की समाप्ति के बाद होती है। अधिकतम अवधि 60-90 दिन (अपराध के प्रकार पर निर्भर), लेकिन मजिस्ट्रेट हर 15 दिन में रिमांड बढ़ा सकता है। उदाहरण: हत्या के मामले में 15 दिन पुलिस हिरासत के बाद आरोपी को जेल भेजा जाता है।

विशेषताएं:

स्थान: सरकारी जेल (जैसे तिहाड़ जेल)।

उद्देश्य: जांच पूरी होने तक आरोपी को सुरक्षित रखना।

अधिकार: जेल प्रशासन नियंत्रण रखता है; पुलिस बिना अनुमति पूछताछ नहीं कर सकती।

3. दोनों हिरासतों में मुख्य अंतर

दोनों हिरासतों में सबसे बड़ा अंतर उनकी अवधि, स्थान और नियंत्रण में है। पुलिस हिरासत सिर्फ 15 दिन तक सीमित रहती है, जबकि ज्यूडिशियल कस्टडी 60-90 दिन या इससे ज्यादा चल सकती है। पुलिस हिरासत में आरोपी पुलिस स्टेशन या लॉक-अप में रहता है, लेकिन ज्यूडिशियल कस्टडी में सरकारी जेल होती है।

पुलिस हिरासत में पुलिस का पूरा अधिकार होता है, जबकि ज्यूडिशियल कस्टडी में जेल प्रशासन संभालता है। बता दें कि पुलिस हिरासत जांच और पूछताछ के लिए है, वहीं ज्यूडिशियल कस्टडी आरोपी को फरार होने से रोकने के लिए। पुलिस हिरासत में पुलिस को आसानी से आरोपी से मिलना होता है, लेकिन ज्यूडिशियल कस्टडी में यह सीमित और अनुमति से ही संभव है। बेल की बात करें तो पुलिस हिरासत में यह मुश्किल है, जबकि ज्यूडिशियल कस्टडी में आसान।

4. कानूनी महत्व और सावधानियां

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, पुलिस हिरासत में यातना बर्दाश्त नहीं होगी। ज्यूडिशियल कस्टडी में आरोपी को वकील से मिलने, परिवार से बात करने का पूर्ण अधिकार है। अगर 90 दिनों में चार्जशीट न दाखिल हो तो आरोपी को डिफॉल्ट बेल मिल जाती है। गलत हिरासत पर कोर्ट से मुआवजा भी ले सकते हैं। इसलिए गिरफ्तारी होते ही CrPC के अधिकारों का इस्तेमाल करें।

पुलिस हिरासत जांच पर केंद्रित है, जबकि ज्यूडिशियल कस्टडी न्याय पर होती है। दोनों कानून व्यवस्था के लिए जरूरी हैं।

Navaneet Rathaur

लेखक के बारे में

Navaneet Rathaur
नवनीत राठौर को मीडिया के अलग-अलग संस्थानों में काम करने का 6 साल से ज्यादा का अनुभव है। इन्हें डिजिटल के साथ ही टीवी मीडिया में भी काम करने का तजुर्बा है। नवनीत फीचर लेखन के तौर पर कई सालों से काम कर रहे हैं और हेल्थ से जुड़ी खबरों को लिखने-पढ़ने का शौक है। और पढ़ें
लेटेस्ट एजुकेशन न्यूज़ अपडेट हिंदी में हिंदुस्तान पर, Hindi News, क्रिकेट न्यूज पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।