सबसे लंबी पारी, नीट विवाद... स्मृति, जावड़ेकर, निशंक की तुलना में कैसे रहा धर्मेंद्र प्रधान का रिपोर्ट कार्ड
नीट-यूजी पेपर लीक और छात्रों के भारी विरोध के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपना इस्तीफा दिया है। इसके साथ ही मोदी सरकार में शिक्षा मंत्री के तौर पर उनकी सबसे लंबी पारी का भी अंत हो गया।

नीट यूजी 2026 (NEET UG 2026) पेपर लीक का जो बवंडर उठा उसने आखिरकार मोदी सरकार के सबसे मजबूत और टिके हुए शिक्षा मंत्री की कुर्सी को भी हिला कर रख दिया। दिल्ली के जंतर-मंतर पर उमड़े छात्रों के गुस्से और लगातार बढ़ती सियासी तपिश के आगे आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान को अपना पद छोड़ना पड़ा। शनिवार को उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया। इसके साथ ही साल 2014 के बाद से शिक्षा मंत्रालय में चली आ रही सबसे लंबी और स्थिर पारी का अंत हो गया। जिस महकमे में पिछले एक दशक में कई चेहरे बदले, वहां धर्मेंद्र प्रधान ने सबसे लंबा वक्त गुजारा, लेकिन नीट विवाद का दाग उनके पूरे रिपोर्ट कार्ड पर भारी पड़ गया। आइए समझते हैं कि मोदी सरकार के तीनों कार्यकालों में शिक्षा मंत्रियों का सफर कैसा रहा और उनके मुकाबले धर्मेंद्र प्रधान कहां ठहरते हैं।
जंतर-मंतर का गुस्सा बना सियासी दबाव?
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपने इस्तीफे का ऐलान करते हुए प्रधान ने बड़ी साफगोई से अपनी बात रखी। उन्होंने लिखा कि पिछले 10 दिनों में जो भी घटनाक्रम हुआ, उससे उनका दिल काफी दुखी है। हालांकि, उन्होंने इसे अपनी निजी साख या ईगो का मसला नहीं बनने दिया। उनका कहना था कि जंतर-मंतर से लेकर देश भर में जो भी हालात बने हैं, उसका फायदा देश-विरोधी ताकतें न उठा लें। मुल्क की एकता हर हाल में बरकरार रहनी चाहिए और सबसे बड़ी बात, किसी भी बेगुनाह छात्र का भविष्य कानूनी पेचीदगियों में न उलझे।
इन तमाम बातों को तवज्जो देते हुए उन्होंने कुर्सी छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने साफ किया कि पहले ही दिन से उन्होंने इस पूरी गड़बड़ी की जिम्मेदारी ली थी और कभी हालात से मुंह मोड़ने की कोशिश नहीं की। इस इस्तीफे के पीछे का सियासी सच यह भी है कि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के दिल्ली में चल रहे जबरदस्त आंदोलन ने सरकार पर भारी दबाव बना दिया था। परीक्षा के सिस्टम में सुधार, नीट पेपर लीक की मुकम्मल जवाबदेही और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर सीजेपी पिछले कई दिनों से सड़कों पर डेरा डाले बैठी थी। सरकार को भी लगने लगा था कि छात्रों के इस उबलते गुस्से को अब और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मोदी सरकार के शिक्षा मंत्रियों का फ्लैशबैक
धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल को समझने के लिए उनके पूर्ववर्तियों के सफर पर नजर डालना जरूरी है। इसमें मोदी सरकार में सबसे पहले स्मृति ईरानी को शिक्षा मंत्रालय (तब मानव संसाधन विकास मंत्रालय) दिया गया। इसके बाद प्रकाश जावड़ेकर, रमेश पोखरियाल 'निशंक' और उसके बाद धर्मेंद्र प्रधान इस मंत्रालय की कुर्सी पर काबिज होते हैं।
स्मृति ईरानी
मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में, 26 मई 2014 को स्मृति ईरानी को मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्री की अहम जिम्मेदारी सौंपी गई। टीवी की दुनिया से सियासत में कदम रखने वाली ईरानी उस वक्त मंत्रिपरिषद की सबसे युवा महिला चेहरों में से एक थीं। उनका करीब दो साल और एक महीने का कार्यकाल खासा हंगामेदार रहा। अपनी शैक्षणिक योग्यता को लेकर वह लगातार विपक्ष के निशाने पर रहीं और विवादों का साया उनके मंत्रालय पर मंडराता रहा। आखिरकार, 5 जुलाई 2016 को एक बड़े फेरबदल के तहत उनसे यह महकमा लेकर उन्हें कपड़ा मंत्रालय भेज दिया गया।
प्रकाश जावड़ेकर
स्मृति ईरानी के बाद प्रकाश जावड़ेकर ने इस मंत्रालय की कमान संभाली। पुणे से ताल्लुक रखने वाले जावड़ेकर का सियासी सफर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की जमीन से शुरू हुआ था। इमरजेंसी के दौर में छात्र आंदोलनों में हिस्सा लेने की वजह से उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। 2016 के कैबिनेट फेरबदल में वह इकलौते ऐसे नेता थे जिन्हें राज्यमंत्री से सीधे कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला था। करीब पौने तीन साल तक उन्होंने बिना किसी बड़े विवाद के इस मंत्रालय को चलाया। 2019 में जब मोदी सरकार दोबारा सत्ता में आई, तो उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का जिम्मा दे दिया गया।
रमेश पोखरियाल 'निशंक'
मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में उत्तराखंड के कद्दावर नेता और जाने-माने लेखक रमेश पोखरियाल 'निशंक' को शिक्षा मंत्री बनाया गया। निशंक का कार्यकाल ऐतिहासिक रहा क्योंकि उनके समय में ही 29 जुलाई 2020 को बहुप्रतीक्षित 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति' (NEP 2020) को मंजूरी मिली। इतना ही नहीं, 'मानव संसाधन विकास मंत्रालय' का नाम बदलकर फिर से 'शिक्षा मंत्रालय' उन्हीं के दौर में किया गया। उनके सामने कोविड महामारी की सबसे बड़ी चुनौती भी आई, जब स्कूलों पर ताले लग गए और ऑनलाइन शिक्षा के नए मॉडल को जमीन पर उतारना पड़ा। जुलाई 2021 में करीब दो साल एक महीने बाद उनकी जगह धर्मेंद्र प्रधान ने ली।
क्या कहता है कि धर्मेंद्र प्रधान का रिपोर्ट कार्ड?
धर्मेंद्र प्रधान ने जुलाई 2021 में पद संभाला और पूरे पांच साल तक इस कुर्सी पर टिके रहे। इस लिहाज से वह पिछले एक दशक में इस मंत्रालय को चलाने वाले सबसे टिकाऊ और प्रभावशाली नेता साबित हुए। उनके कार्यकाल में नई शिक्षा नीति को जमीन पर उतारने जैसे कई अहम और बड़े फैसले लिए गए, जिसने शिक्षा जगत में कई नए रास्ते खोले। लेकिन विडंबना देखिए, जिस नी परीक्षा के जरिए देश को होनहार डॉक्टर मिलते हैं, उसी के पेपर लीक विवाद ने इस सबसे लंबी पारी का अंत कर दिया। बीते कुछ दिनों से लाखों छात्रों की रातों की नींद उड़ने और सड़कों पर उतरे नौजवानों के चेहरों पर छाए खौफ ने इस पूरे महकमे की साख पर सवाल खड़े कर दिए। जिसके आगे झुकते हुए धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है।


