ना IIT का ठप्पा, ना कोई बड़ी पहचान... 6 लाख के पैकेज से अमेरिका में कैसे मिला करोड़ों का ऑफर
पुणे के एक टियर-3 कॉलेज से 6 लाख के पैकेज से शुरुआत कर अमेरिका में हाई-पेइंग जॉब हासिल करने वाली देवश्री भरतिया ने अपनी कामयाबी का सीक्रेट शेयर किया है।

हर नौजवान का एक सपना होता है कि एक बेहतरीन करियर, शानदार सैलरी और अगर मौका मिले तो विदेश में काम करने का शानदार तजुर्बा हो। लेकिन अगर आप किसी टियर-3 कॉलेज से पढ़े हैं, तो शुरुआत में यह सफर थोड़ा मुश्किल और धुंधला सा लगता है। अक्सर लोगों को लगता है कि बिना किसी बड़े आईआईटी या एनआईटी के ठप्पे के, बड़ी टेक कंपनियों में जगह बनाना नामुमकिन है। पुणे से अपनी पढ़ाई पूरी करने वाली देवश्री भरतिया ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है, जो इस पुरानी सोच को पूरी तरह से गलत साबित करता है। उनकी कहानी उन सभी युवाओं के लिए एक बड़ी मिसाल है, जो बड़े सपने तो देखते हैं लेकिन सही रास्ते की तलाश में भटक जाते हैं।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर देवश्री का एक पोस्ट इन दिनों खूब वायरल हो रहा है। इस पोस्ट में उन्होंने पुणे के एक आम कॉलेज से लेकर अमेरिका में एक हाई-पेइंग टेक जॉब तक पहुंचने की अपनी कहानी बड़े ही तफसील से बताई है। उनका कहना है कि इस पोस्ट को लिखने का मकसद बहुत सीधा और साफ है कि वो उन हजारों युवाओं की मदद करना चाहती हैं, जो अभी उसी जद्दोजहद और 'ट्रायल एंड एरर' वाले दौर से गुजर रहे हैं, जिसका सामना देवश्री ने सालों तक किया था।
देवश्री ने अपनी पुरानी यादों को ताजा करते हुए लिखा, "मैंने पुणे के एक टियर-3 कॉलेज से अपना ग्रेजुएशन पूरा किया था और जब मैंने अपने करियर की शुरुआत की, तो मेरी पहली सैलरी 6 लाख रुपये एलपीए थी।" वो आगे कहती हैं कि आज वो जिस मुकाम पर हैं और अमेरिका में जो जिंदगी जी रही हैं, उसकी कल्पना उन्होंने अपने सबसे अच्छे सपनों में भी नहीं की थी।
क्या है 3 महीने वाला कामयाब फॉर्मूला?
देवश्री ने अपने इस लंबे और बेहद काम के पोस्ट में बताया है कि कैसे उन्होंने कदम-दर-कदम अपना करियर ग्राफ ऊपर की तरफ खींचा। वो मानती हैं कि जो चीजें सीखने, समझने और सही तरीके से लागू करने में उन्हें पूरे तीन साल लग गए, अगर सही तरीके से उन्हें आजमाया जाए, तो कोई भी शख्स सिर्फ 3 महीने में इसके शानदार नतीजे देख सकता है। उन्होंने हवा-हवाई बातें करने के बजाय कुछ बेहद ठोस और जमीनी रणनीतियां शेयर की हैं।
रिक्रूटर्स की नजरों में आना है जरूरी
नौकरी ढूंढने का पुराना तरीका अब काम नहीं आता। देवश्री की रणनीति का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस बात पर टिका है कि रिक्रूटर्स यानी एचआर खुद आपको ढूंढें, न कि आप सिर्फ जॉब पोर्टल्स पर अपनी किस्मत आजमाते रहें। वो कहती हैं कि सिर्फ नौकरी के लिए अप्लाई करके हाथ पर हाथ धरे बैठ जाना काफी नहीं है। खासकर उन लोगों के लिए जो सर्विस-बेस्ड कंपनियों से निकलकर प्रोडक्ट-बेस्ड कंपनियों में जाने का सपना देख रहे हैं। उन्होंने बड़ी बेबाकी से समझाया, "हर कोई आपसे कहेगा कि लिंक्डइन के जरिए सैकड़ों नौकरियों के लिए अप्लाई करो, और आपको ऐसा करना भी चाहिए। लेकिन असली खेल तब बदलता है जब रिक्रूटर्स खुद आपसे संपर्क करते हैं। इससे आपको बाकी उम्मीदवारों के मुकाबले एक बहुत बड़ा फायदा मिलता है।"
अब सवाल ये है कि रिक्रूटर्स की नजरों में आएं कैसे? देवश्री इसके लिए लिंक्डइन पर लगातार पोस्ट करने की सलाह देती हैं। हालांकि, उन्होंने इस बात को भी साफ किया कि इसका मतलब ये कतई नहीं है कि आप अपनी पढ़ाई या जॉब छोड़कर फुल-टाइम कंटेंट क्रिएटर बन जाएं। आप चाहें तो एक ही दिन बैठकर अपने पूरे महीने का कंटेंट शेड्यूल कर सकते हैं। असल मकसद अपनी एक पहचान और क्रेडिबिलिटी बनाना है, न कि सिर्फ फालतू के फॉलोअर्स बटोरना।
घोस्ट जॉब्स की कड़वी सच्चाई
नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं को देवश्री ने एक ऐसी सच्चाई से भी रूबरू कराया है, जो अक्सर डिप्रेशन का कारण बन जाती है। इसे उन्होंने 'घोस्ट जॉब्स' का नाम दिया है। वो बताती हैं, "आप जिन नौकरियों के लिए अप्लाई करते हैं, उनमें से लगभग 30% नौकरियां असल में होती ही नहीं हैं, वो सिर्फ दिखावे के लिए पोस्ट की जाती हैं।" कई बार उम्मीदवार जब जवाब नहीं पाते तो उन्हें लगता है कि उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया है, जबकि हकीकत ये होती है कि वो जॉब रोल कभी एक्टिव था ही नहीं। इस बात को समझकर युवा खुद को बेवजह की निराशा से बचा सकते हैं।
रेज्यूमे और इंटरव्यू की पक्की तैयारी
एक और बड़ी गलती जो ज्यादातर उम्मीदवार करते हैं, वो है एक ही 'जेनेरिक' रेज्यूमे को हर जगह भेज देना। देवश्री ने साफ कहा कि यह तरीका अब काम नहीं करता। अपने करियर के शुरुआती दौर में हैकथॉन, अच्छे प्रोजेक्ट्स और रिसर्च वर्क पर जोर देना बेहद जरूरी है। उन्होंने लिखा, "हर जॉब रोल के लिए अपने रेज्यूमे में बदलाव करें। जॉब डिस्क्रिप्शन (JD) में जो बातें मांगी गई हैं, उनके हिसाब से अपने रेज्यूमे को अलाइन करें।" उन्होंने एटीएस (ATS) फ्रेंडली रेज्यूमे बनाने और उसकी सही फॉर्मेटिंग को भी शॉर्टलिस्ट होने की एक अहम चाबी बताया है।
इंटरव्यू की तैयारी को लेकर भी उन्होंने अपने तजुर्बे बांटे। डेटा स्ट्रक्चर एंड एल्गोरिदम (DSA) और सिस्टम डिजाइन के सवालों से लेकर बिजनेस केस-बेस्ड राउंड्स तक, हर चीज की अहमियत पर उन्होंने जोर दिया। उनका मानना है कि अगर आप जिस कंपनी में इंटरव्यू दे रहे हैं, उसके प्रोडक्ट और उसकी दिक्कतों को गहराई से समझते हैं, तो आप इंटरव्यू लेने वाले के सवालों का पहले से ही अंदाजा लगा सकते हैं और एक बेहतरीन जवाब तैयार रख सकते हैं।


