दिल्ली में स्कूल फीस पर बड़ा अपडेट, हाईकोर्ट ने सरकार की नई व्यवस्था पर लगाई रोक
दिल्ली हाईकोर्ट ने निजी स्कूलों की फीस तय करने वाली समितियों पर रोक लगाई। 2026-27 सत्र में स्कूल पुरानी फीस ही लेंगे। जानिए क्या है पूरा मामला।

राजधानी दिल्ली में स्कूल फीस को लेकर चल रही खींचतान के बीच बड़ा कानूनी मोड़ आ गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार की उस अधिसूचना पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें निजी स्कूलों को फीस तय करने के लिए विशेष शुल्क विनियमन समितियां बनाने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने साफ कहा है कि अगली सुनवाई तक स्कूलों को ऐसी समितियां बनाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इस आदेश का सीधा असर लाखों अभिभावकों और करीब 1,700 निजी स्कूलों पर पड़ा है, क्योंकि अब नए शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए फीस बढ़ाने का रास्ता फिलहाल बंद हो गया है।
क्या कहा अदालत ने
अदालत ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि जब तक मामले की अगली सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक पुरानी व्यवस्था ही लागू रहेगी। यानी स्कूलों को अभी नई फीस तय करने की प्रक्रिया अपनाने की जरूरत नहीं है।
मामले की अगली सुनवाई 12 मार्च को तय की गई है। इसका मतलब यह हुआ कि 2026-27 सत्र में भी वही फीस ली जाएगी जो स्कूलों ने 2025-26 में ली थी। इससे अचानक फीस बढ़ने की आशंका पर फिलहाल ब्रेक लग गया है।
सरकार क्या चाहती थी
दिल्ली सरकार ने निजी स्कूलों की मनमानी फीस वृद्धि पर नियंत्रण लगाने के उद्देश्य से "दिल्ली स्कूल शिक्षा (शुल्क निर्धारण और विनियमन में पारदर्शिता) अधिनियम, 2025" लागू किया था। सरकार का कहना था कि कई स्कूल बिना स्पष्ट आधार के फीस बढ़ा देते हैं, जिससे अभिभावकों पर आर्थिक दबाव पड़ता है। नई व्यवस्था के तहत हर स्कूल में एक समिति बननी थी, जो यह तय करती कि फीस बढ़ोतरी उचित है या नहीं। सरकार का दावा था कि यह कानून शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता लाने और अभिभावकों को राहत देने के लिए बनाया गया है।
नया कानून कितना बड़ा बदलाव था
इस अधिनियम को 8 अगस्त को दिल्ली विधानसभा में लंबी बहस के बाद पारित किया गया था। सरकार के मुताबिक, यह कानून 1973 के पुराने नियमों से कहीं ज्यादा व्यापक है। पुराना कानून लगभग 300 स्कूलों तक सीमित था, जबकि नया कानून राजधानी के लगभग सभी 1,700 निजी स्कूलों को अपने दायरे में लाता है। यानी पहली बार इतने बड़े स्तर पर फीस व्यवस्था को नियंत्रित करने की कोशिश की गई।
मुख्यमंत्री ने क्या कहा था
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में इस कानून को शिक्षा क्षेत्र में बड़ा सुधार बताया था। उन्होंने कहा था कि यह कदम अभिभावकों और छात्रों के हित में लिया गया है और इससे फीस निर्धारण की प्रक्रिया अधिक जवाबदेह बनेगी। उनके अनुसार, सरकार का उद्देश्य शिक्षा को व्यवसाय बनने से रोकना और संतुलित व्यवस्था बनाना था।
शिक्षा मंत्री का बयान
शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने भी कानून का समर्थन करते हुए कहा था कि यह विधेयक सभी पक्षों की चिंताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। उन्होंने यह भी कहा था कि जो निजी स्कूल इस कानून से असहज हैं, वे चाहें तो अपनी सरकारी मान्यता छोड़ सकते हैं। यह बयान अपने आप में काफी सख्त माना गया था और उसी के बाद से स्कूल प्रबंधन और सरकार के बीच विवाद तेज हो गया था।
अब अभिभावकों और स्कूलों के लिए क्या मायने
अदालत के इस फैसले से सबसे बड़ी राहत अभिभावकों को मिली है, क्योंकि नए सत्र से पहले संभावित फीस वृद्धि पर फिलहाल रोक लग गई है। स्कूलों के लिए भी यह एक अस्थायी राहत है, क्योंकि उन्हें नई प्रशासनिक व्यवस्था लागू करने की जल्दी नहीं रहेगी। लेकिन यह मामला अभी खत्म नहीं हुआ है। 12 मार्च की सुनवाई में अदालत यह तय करेगी कि सरकार का कानून लागू रहेगा या उसमें बदलाव होगा या फिर उसे निरस्त किया जाएगा।
क्यों अहम है यह मामला
दिल्ली जैसे बड़े शिक्षा केंद्र में निजी स्कूलों की फीस लंबे समय से बहस का मुद्दा रही है। हर साल फीस बढ़ोतरी को लेकर अभिभावकों के विरोध, स्कूलों की दलीलें और सरकार की दखल की मांग सामने आती रही है। अब यह विवाद सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि कानूनी लड़ाई बन चुका है, जिसका असर आने वाले वर्षों की शिक्षा नीति पर भी पड़ सकता है।



