
अनुच्छेद 30 का सीधा उल्लंघन है मीलॉर्ड... दिल्ली हाई कोर्ट में फीस कानून को लेकर पहुंचे अल्पसंख्यक स्कूल
दिल्ली में स्कूल फीस को लेकर कानूनी संग्राम तेज हो गया है। हाईकोर्ट में अल्पसंख्यक स्कूल बनाम सरकार की बड़ी टक्कर सामने आई है। अब अदालत के फैसले का इंतजार है।
दिल्ली में निजी स्कूलों की फीस को लेकर सरकार और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के बीच छिड़ी कानूनी जंग अब हाईकोर्ट तक पहुंच चुकी है। फीस बढ़ोतरी पर सरकारी मंजूरी को अनिवार्य करने वाले नए राज्य कानून को अल्पसंख्यक स्कूलों ने संविधान के खिलाफ बताते हुए चुनौती दी है, जिस पर दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार और उपराज्यपाल को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
क्या है पूरा मामला
दिल्ली हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया वाली खंडपीठ ने शुक्रवार को अल्पसंख्यक स्कूलों की ओर से दायर याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई करते हुए दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल को नोटिस जारी किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि इन सभी मामलों की अगली सुनवाई मार्च 2026 में की जाएगी। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि वह सभी याचिकाओं के लिए एक साझा जवाबी हलफनामा दाखिल करे और उसकी प्रति याचिकाकर्ता स्कूलों को भी उपलब्ध कराए। इसके लिए सरकार को छह सप्ताह का समय दिया गया है।
स्कूलों को मिली समय सीमा में राहत
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्कूलों को अंतरिम राहत देते हुए फीस नियमन से जुड़ी समय सीमाओं में भी बदलाव किया। अदालत ने कहा कि स्कूल अब 20 जनवरी तक स्कूल स्तरीय फीस नियमन समिति का गठन कर सकते हैं। पहले इसके लिए 10 जनवरी की अंतिम तिथि तय की गई थी। इसके अलावा, स्कूल प्रबंधन द्वारा प्रस्तावित फीस को समिति के समक्ष जमा करने की अंतिम तारीख भी बढ़ाकर 5 फरवरी कर दी गई है। पहले यह समय सीमा 25 जनवरी निर्धारित थी।
किस कानून को दी गई चुनौती
अल्पसंख्यक स्कूलों ने दिल्ली स्कूल शिक्षा (फीस निर्धारण और विनियमन में पारदर्शिता) अधिनियम 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। इस कानून के तहत निजी स्कूलों में किसी भी तरह की फीस बढ़ोतरी के लिए तीन स्तरीय समिति से मंजूरी लेना अनिवार्य किया गया है। इस समिति प्रणाली में अभिभावकों, स्कूल प्रबंधन और सरकारी प्रतिनिधियों की भागीदारी तय की गई है, ताकि फीस तय करने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जा सके।
शिक्षा निदेशालय की अधिसूचना भी सवालों के घेरे में
याचिकाओं में 24 दिसंबर 2025 को दिल्ली शिक्षा निदेशालय द्वारा जारी अधिसूचना को भी चुनौती दी गई है। इस अधिसूचना के तहत निजी गैर सहायता प्राप्त स्कूलों को स्कूल स्तरीय फीस नियमन समिति बनाने का निर्देश दिया गया था। इस समिति में अध्यक्ष, स्कूल के प्रधानाचार्य, पांच अभिभावक, तीन शिक्षक और शिक्षा निदेशालय का एक प्रतिनिधि शामिल होना अनिवार्य किया गया है।
अल्पसंख्यक स्कूलों की दलील
अल्पसंख्यक स्कूलों की ओर से पेश वकील ने अदालत में दलील दी कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 30 का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यक संस्थानों को अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन चलाने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। उनका तर्क था कि सरकार केवल यह देख सकती है कि फीस वसूली मुनाफाखोरी में न बदले, लेकिन फीस तय करने के लिए पहले से सरकारी मंजूरी लेना पूरी तरह असंवैधानिक है।
सरकार का पक्ष
वहीं दिल्ली सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कानून का बचाव करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि अनुच्छेद 30 के तहत भी सरकार को नियामक कदम उठाने का अधिकार है। सरकार का कहना है कि यह कानून छात्रों और अभिभावकों के हितों की रक्षा के लिए लाया गया है।

लेखक के बारे में
Himanshu Tiwariशॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।
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