कानून का किला नहीं, जनता की खुली चौपाल बनिए, कानून के विद्यार्थियों से बोले CJI सूर्यकांत
सीजेआई सूर्यकांत ने युवा वकीलों से कहा कि कानून को किले जैसा बंद ढांचा नहीं बल्कि जनता की खुली चौपाल बनाना होगा, जहां अधिकार, बहस और न्याय सबके लिए सुलभ हों।

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने युवा कानून विद्यार्थियों को एक गहरी और जिम्मेदारी भरी सीख देते हुए कहा कि कानून को अब “किले” की तरह नहीं बल्कि “जनता के खुले मंच” की तरह काम करना होगा। उनका कहना था कि अगर कानून केवल किताबों, कठिन शब्दों और चुनिंदा लोगों तक सीमित रह गया, तो वह अपने असली मकसद से दूर चला जाएगा। वे दीक्षांत समारोह में छात्रों को संबोधित कर रहे थे, जहां उन्होंने कानून की भूमिका, उसके बदलते स्वरूप और युवा वकीलों की जिम्मेदारी पर विस्तार से बात की। यह आयोजन नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में हुआ, जहां देशभर से आए विद्यार्थियों ने अपनी पढ़ाई पूरी कर पेशेवर जीवन में कदम रखा।
मेहरानगढ़ फोर्ट की तुलना
मुख्य न्यायाधीश ने अपने भाषण में कानून की तुलना मेहरानगढ़ फोर्ट से की। उन्होंने समझाया कि जैसे पुराने समय में किले बाहरी खतरों से सुरक्षा के लिए बनाए जाते थे, वैसे ही कानून का प्रारंभिक स्वरूप भी समाज को अराजकता और मनमानी से बचाने के लिए बना था। उस दौर में कानून का उद्देश्य व्यवस्था बनाए रखना था। वह एक रक्षक की तरह खड़ा था। लेकिन उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून केवल रक्षा करने वाला ढांचा बनकर नहीं रह सकता।
लोकतंत्र में कानून को बदलना ही होगा
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि संविधान वाले लोकतंत्र में कानून को ऐसा स्थान बनना चाहिए जहां लोग अपने मतभेद रखें, सवाल पूछें, अपने अधिकारों को समझें और सत्ता से जवाब मांग सकें। उनके अनुसार, कानून अगर लोगों से दूर हो जाए तो न्याय केवल कागजों तक सीमित रह जाता है। उन्होंने युवाओं से कहा कि वे कानून को बंद दरवाजों वाली व्यवस्था न बनने दें, बल्कि उसे ऐसा माध्यम बनाएं जहां आम आदमी भी अपनी बात कह सके।
कानून कोई अंतिम सच नहीं, यह लगातार बदलता है
उन्होंने विद्यार्थियों को यह भी समझाया कि कानून कोई स्थायी या अंतिम चीज नहीं है। विज्ञान की तरह इसमें अंतिम निष्कर्ष नहीं होते। समाज बदलता है, इसलिए कानून भी बदलता है। न्याय की विश्वसनीयता इसी बात पर निर्भर करती है कि वह समय के साथ चल सके और नई चुनौतियों का जवाब दे सके। उन्होंने इतिहास का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे शुरुआती अधिकारों की छोटी पहलें आगे चलकर समानता, गरिमा और न्याय के बड़े सिद्धांतों में बदल गईं।
भारत में समानता का विचार भी विकसित हुआ
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि भारत में भी समानता का सिद्धांत केवल औपचारिक घोषणा नहीं रहा। समय के साथ अदालतों ने इसे वास्तविक न्याय का साधन बनाया, ताकि कानून केवल शब्दों में नहीं बल्कि जीवन में दिखे। उनका संकेत था कि संविधान का अर्थ तभी जीवित रहता है जब न्याय व्यवस्था समाज की वास्तविक जरूरतों को समझे।
कठिन भाषा और जटिलता से दूर रखने की चेतावनी
उन्होंने एक अहम चेतावनी भी दी। कहा कि कई बार कानून लोगों को आजाद करने के बाद फिर उनसे दूर हो जाता है, क्योंकि उसे इतनी कठिन भाषा और प्रक्रियाओं में बांध दिया जाता है कि आम नागरिक उससे जुड़ ही नहीं पाता। युवा वकीलों से उन्होंने आग्रह किया कि वे कानून को फिर से “विशेषज्ञों का किला” न बनने दें।
कानून की भाषा ऐसी होनी चाहिए जिसे लोग समझ सकें। न्याय ऐसा होना चाहिए जो दिखाई दे, महसूस हो और सबके लिए उपलब्ध हो।
नई पीढ़ी की भूमिका सबसे निर्णायक
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि आज स्नातक हो रहे विद्यार्थी केवल डिग्री लेकर नहीं जा रहे हैं, बल्कि वे उस व्यवस्था के वाहक बन रहे हैं जो तय करेगी कि कानून लोगों के करीब रहेगा या उनसे दूर। उन्होंने जोर देकर कहा कि उत्कृष्टता जरूरी है, लेकिन उत्कृष्टता का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि व्यवस्था केवल कुछ लोगों तक सीमित हो जाए। न्याय की असली ताकत उसकी पहुंच में है, न कि उसकी जटिलता में।
कानून को लोगों के बीच ले जाने की जरूरत
अपने संबोधन में उन्होंने यह स्पष्ट किया कि देश अभी भी एक अधूरी यात्रा पर है। न्याय व्यवस्था को लगातार बेहतर बनाना होगा, ताकि समाज के हर वर्ग को लगे कि कानून उसका है। युवा वकीलों से उन्होंने कहा कि वे अदालतों, समाज और लोगों के बीच पुल बनें। कानून को डर का प्रतीक नहीं, भरोसे का माध्यम बनाना ही उनकी असली परीक्षा होगी।
लेखक के बारे में
Himanshu Tiwariशॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।
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हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।
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