भरोसा उठ गया है, बच्चों को इंटरनेशनल बोर्ड में पढ़ाएं; CBSE के OSM सिस्टम पर भड़के मशहूर डॉक्टर

Himanshu Tiwari हिन्दुस्तान टाइम्स, भव्या सुकेजा
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सीबीएसई के ऑन स्क्रीन मार्किंग विवाद पर मशहूर चिकित्सक द लिवर डॉक ने भारतीय शिक्षा प्रणाली पर नाराजगी जताते हुए अभिभावकों को बच्चों को इंटरनेशनल बोर्ड में भेजने की सलाह दी।

भरोसा उठ गया है, बच्चों को इंटरनेशनल बोर्ड में पढ़ाएं; CBSE के OSM सिस्टम पर भड़के मशहूर डॉक्टर

सीबीएसई के डिजिटल मूल्यांकन यानी ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) सिस्टम को लेकर मचा घमासान अब थमता नजर नहीं आ रहा है। छात्रों और अभिभावकों के बढ़ते गुस्से के बीच अब देश के जाने-माने डॉक्टर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर डॉ. साइिएक एबी फिलिप्स ने भी इस पूरे सिस्टम पर तीखा हमला बोला है। सोशल मीडिया पर डॉक्टर फिलिप्स को 'द लिवर डॉक' के नाम से जानते हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि इस नए विवाद के बाद देश की शिक्षा व्यवस्था से उनका भरोसा पूरी तरह उठ चुका है। डॉ. फिलिप्स ने पैरेंट्स को एक बेहद चौंकाने वाली सलाह दे डाली है। उन्होंने कहा कि अपने बच्चों को सीबीएसई स्कूलों में भेजना बंद करें और इसके बजाय इंटरनेशनल बोर्ड (IB) या कैंब्रिज सिलेबस की तरफ रुख करें।

लिवर डॉक का सोशल मीडिया पर फूटा गुस्सा

डॉ. साइिएक एबी फिलिप्स ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए लिखा, "मैं भी इस बारे में गहराई से सोच रहा हूं। बच्चों को सीबीएसई में भेजना बंद कर दीजिए। भारतीय स्कूलों में आईबी (IB) या कैंब्रिज पाठ्यक्रम को तलाशना शुरू करें।" उन्होंने आगे कहा कि जो बच्चे आगे चलकर डॉक्टर बनना चाहते हैं या मेडिकल के क्षेत्र में अपना करियर देख रहे हैं, उनके लिए इंटरनेशनल सिलेबस और परीक्षाएं कहीं ज्यादा मददगार साबित हो सकती हैं। डॉ. फिलिप्स के मुताबिक, यूकैट (UCAT) और बीमैट (BMAT) जैसी परीक्षाएं बच्चों को विदेशी विश्वविद्यालयों में आसानी से दाखिला दिलाने में मदद करेंगी। उन्होंने अपने पोस्ट में यह भी जोड़ा, "मेरा इस देश और इसके छद्म विज्ञान (pseudoscience) से प्रभावित हो चुके एजुकेशन सिस्टम से पूरी तरह विश्वास उठ गया है।" इसके साथ ही उन्होंने दूसरे लोगों से भी इस बड़े बदलाव पर अपने अनुभव साझा करने को कहा।

आखिर क्यों भड़का है सीबीएसई पर यह पूरा विवाद?

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब सीबीएसई ने इस साल कक्षा 12वीं की परीक्षाओं के मूल्यांकन के लिए बड़े पैमाने पर ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) सिस्टम को लागू किया। इस नई व्यवस्था में कॉपियों को शारीरिक रूप से जांचने के बजाय कंप्यूटर स्क्रीन पर डिजिटल तरीके से आंका गया। नतीजे आने के बाद जब छात्रों ने अपनी आंसर-शीट की स्कैन की हुई कॉपियां देखीं, तो उनके होश उड़ गए। कई छात्रों का सीधा आरोप है कि जो कॉपियां पोर्टल पर अपलोड की गई हैं, उनमें लिखावट उनकी है ही नहीं। कुछ छात्रों ने शिकायत की है कि पन्ने पूरी तरह धुंधले हैं, स्कैनिंग अधूरी है और कई सही जवाबों को तो जांचा ही नहीं गया है। वेदांत श्रीवास्तव नाम के एक छात्र के भाई ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि सीबीएसई ने अपनी गलती मान ली है, लेकिन इस पूरे चक्कर में छात्रों का भारी मानसिक उत्पीड़न हुआ है। कई माता-पिता ने यह भी शिकायत की कि आंसर-शीट डाउनलोड करने के दौरान पोर्टल बार-बार क्रैश हो रहा था और पेमेंट फेल होने जैसी दिक्कतें भी सामने आईं।

सीबीएसई का इस पूरे मामले पर क्या है कहना?

विवाद को बढ़ता देख CBSE ने इस ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम का पुरजोर बचाव किया है। बोर्ड का दावा है कि यह व्यवस्था पूरी तरह से निष्पक्ष, पारदर्शी और न्यायसंगत है। इससे नंबरों को जोड़ने में होने वाली गलतियां कम होती हैं। हालांकि, छात्रों और अभिभावकों के भारी विरोध को देखते हुए सीबीएसई ने स्कैन की गई कॉपियों के लिए आवेदन करने की आखिरी तारीख को थोड़ा आगे बढ़ा दिया है। बोर्ड ने छात्रों से परेशान न होने की अपील की है और भरोसा दिलाया है कि उनकी जायज शिकायतों की जांच सब्जेक्ट एक्सपर्ट्स यानी विषय विशेषज्ञों से कराई जाएगी। बोर्ड ने यह भी माना कि सिस्टम में शुरुआत में कुछ कमियां थीं, जिन्हें अब ठीक कर लिया गया है और बाकी कमजोरियों की भी बारीकी से जांच की जा रही है।

वहीं डॉ. फिलिप्स की इस सलाह ने इंटरनेट पर एक नई और गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। लोग अब इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि क्या भारत के आम परिवारों के लिए आईबी या कैंब्रिज जैसे इंटरनेशनल बोर्ड का खर्च उठाना मुमकिन भी है? डॉक्टर के पोस्ट पर कमेंट करते हुए एक यूजर ने लिखा, "आपकी यह सलाह भारत के बेहद कम प्रतिशत बच्चों के लिए ही काम की है। जो रईस और सुविधा संपन्न लोग हैं, वे पहले से ही अपने बच्चों को आईबी बोर्ड में भेज रहे हैं। असल जरूरत इस देश के पूरे राजनीतिक और प्रशासनिक सिस्टम को सुधारने की है।"

एक अन्य यूजर ने चेन्नई का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां पांचवीं क्लास के लिए ही आईबी स्कूल सालाना 6 से 10 लाख रुपये तक की भारी-भरकम फीस वसूलते हैं। ऐसे में एक आम हिंदुस्तानी परिवार के लिए यह सिर्फ एक दूर का सपना बनकर रह जाता है, खासकर तब जब आगे चलकर मेडिकल की पढ़ाई का खर्च भी आसमान छू रहा हो।

Himanshu Tiwari

लेखक के बारे में

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शॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।

परिचय एवं अनुभव
हिमांशु तिवारी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। बीते 10 सालों से वह लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस वक्त लाइव हिन्दुस्तान में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और बीते 3 साल से वह इस संस्थान से जुड़े हैं। शिक्षा, करियर, नौकरियों, नीट, जेईई, बैंकिंग, एसएससी और यूपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी और आरपीएससी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी खास पकड़ मानी जाती है। हिमांशु ने साल 2016 में पत्रकारिता की शुरुआत एबीपी न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म से किया। इसके बाद वह इंडिया टीवी और जी न्यूज (डीएनए) जैसे बड़े न्यूज चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी हिस्सा रह चुके हैं। हिमांशु तिवारी सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक सजग पाठक और आजीवन विद्यार्थी हैं, उनकी यही खूबी उनके कार्य में परिलक्षित होती है। उनका मानना है कि इन परीक्षाओं से जुड़ी सही और समय पर जानकारी लाखों युवाओं के भविष्य को दिशा दे सकती है, इसलिए वह इस बीट को सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।

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हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।

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